'सऊदी अरब के लिए तैयार है पाकिस्तानी परमाणु बम'

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Image caption पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को सऊदी अरब की तरफ़ से वित्तीय मदद मिलने की ख़बरें हैं.

पाकिस्तान के परमाणु बम प्रोजेक्ट में सऊदी अरब ने पैसा लगा रखा है और कई स्रोतों ने बीबीसी को बताया है कि वह जब चाहे पाकिस्तान से परमाणु हथियार हासिल कर सकता है.

परमाणु हथियारों को लेकर सऊदी अरब की ख़्वाहिश को ईरान के परमाणु कार्यक्रम के काट के संदर्भ में ही लिया जाता है. अब यह मुमकिन हो गया है कि सऊदी अरब ईरान की अपेक्षा ज्यादा तेज़ी से परमाणु हथियार तैनात कर सकता है.

इसराइली सैन्य ख़ुफ़िया विभाग के मुखिया आमोस याल्दिन ने स्वीडन में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि अगर ईरान परमाणु बम हासिल कर लेता है, तो सऊदी एक महीने का भी इंतज़ार नहीं करेंगे. उन्होंने बम के लिए पहले ही पैसा दे दिया है. वे पाकिस्तान जाएंगे और जो चाहते हैं, ले आएंगे.

'सऊदी अरब का पैसा'

इस वर्ष की शुरुआत में नेटो के एक वरिष्ठ नीति निर्धारक ने मुझे ऐसी ख़ुफ़िया रिपोर्टों के बारे में बताया था जिनमें कहा गया था कि पाकिस्तान में सऊदी अरब के पैसे से बने परमाणु हथियार सऊदी अरब को दिए जाने को तैयार हैं.

2009 में सऊदी अरब के शासक शाह अब्दुल्लाह ने मध्य पूर्व मामलों के अमरीकी दूत डेनिस रॉस को चेतावनी दी थी कि यदि ईरान ने हदें पार कीं, तो वे भी परमाणु हथियार तैनात करेंगे.

Image caption गैरी सेमोर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के सलाहकार रह चुके हैं.

तबसे अब तक सऊदी अरब ने अपनी मंशा के बारे में अमरीकियों को कई बार चेताया है.

2013 तक अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के परमाणु हथियार अप्रसार मामलों के सलाहकार रह चुके गैरी सेमोर ने न्यूज़ नाइट को बताया था, ''मुझे नहीं लगता कि सऊदी मानते हैं कि पाकिस्तान के साथ उनकी इतनी रब्त-ज़ब्त है कि आपात स्थिति में वे परमाणु हथियार हासिल कर लेंगे.''

पुरानी योजना

सऊदी अरब के परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइलें हासिल करने की ख़बरें काफ़ी पुरानी हैं. 1980 के दशक के अंत में सऊदी ने चीन से दर्जनों सीएसएस-2 मिसाइलें ख़रीदीं थीं. इन्हें 20 साल पहले तैनात किया गया था.

लेकिन इनके बारे में विशेषज्ञों की राय थी कि ये इस लायक़ नहीं थीं कि उन्हें तैनात किया जा सके.

हाल ही में रक्षा जर्नल 'जेन' में विशेषज्ञों ने इसराइल और ईरान से लगी सीमा में लॉन्चिंग से लैस नए सीएसएस-2 बेस बनाए जाने का दावा किया था.

कई साल से यह साफ़ है कि पाकिस्तान के रक्षा क्षेत्र को सऊदी अरब सरकार की ओर से खुले दिल से आर्थिक मदद मिल रही है.

पश्चिमी विशेषज्ञों का आरोप है कि सऊदी अरब, पाकिस्तानी मिसाइल और परमाणु प्रयोगशालाओं के लिए भी धन मुहैया कराता रहा है.

सऊदी अरब के तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रिंस सुल्तान बिन अब्दुल अज़ीज की 1999 और 2002 में पाकिस्तान यात्रा बताती है कि दोनों देशों के बीच गहरे रक्षा सहयोग हैं.

भारत के ख़िलाफ़ रणनीतिक प्रतिरक्षा की तलाश में पाकिस्तान, चीन से क़रीबी रिश्ते बनाए हुए है.

चीन ने पाकिस्तान को कई मिसाइलों की आपूर्ति की है और परमाणु बम ले जाने में सक्षम हथियार के डिज़ाइन मुहैया कराए हैं.

चीनी हथियारों के ब्लूप्रिंट

पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों का आरोप है कि पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल क़दीर ख़ान, लीबिया और उत्तरी कोरिया को परमाणु बम की जानकारी और संवर्धित यूरेनियम के सेंट्रीफ्यूज़ बेचने में संलिप्त रहे हैं.

Image caption रियाद से 200 किमी दूर सऊदी अरब के तीसरे मिसाइल बेस की तस्वीरें. यहां से मध्य दूरी के रॉकेट दागे जा सकते हैं.

ख़ान पर चीनी परमाणु हथियारों के ब्लूप्रिंट को इन देशों तक पहुंचाने के भी आरोप हैं.

यह ब्लूप्रिंट सीएसएस-2 मिसाइल में फ़िट होने वाले बम का डिज़ाइन था. ऐसा ही डिज़ाइन सऊदी अरब को भी बेचा गया.

हालांकि इन ख़बरों को सऊदी अधिकारियों ने यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि उन्होंने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर दिया है और वे मध्यपूर्व को परमाणु हथियार मुक्त देखना चाहते हैं.

मगर वास्तविकता यह है कि विदेशी सरकारों को परमाणु बम मुहैया कराना पाकिस्तान के लिए राजनीतिक रूप से एक बड़ी मुश्किल खड़ी कर सकता है क्योंकि विश्व बैंक और दूसरे देशों में इन ख़बरों से संदेह तो पैदा हो ही गया.

तीन संभावनाएं

'ईटींग द ग्रास' में पाकिस्तानी मेजर जनरल फ़िरोज़ हसन ख़ान ने इन ख़बरों को ख़ारिज किया है. उन्होंने कहा है कि सऊदी अरब के राजकुमार के पाकिस्तानी परमाणु प्रयोगशालाओं के दौरे से यह नहीं कहा जा सकता कि दोनों देशों के बीच कोई समझौता हुआ है.

लेकिन उन्होंने दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को स्वीकार किया है.

सच्चाई जो भी हो, 2003 से ही सऊदी अरब बदलते रक्षा परिवेश और परमाणु अप्रसार को लेकर इस पर गंभीरता से विचार करने लगा है.

इसी साल एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी की तरफ़ से लीक दस्तावेज़ों में तीन संभावनाएं बताई गईं थीं. ख़ुद अपना परमाणु बम हासिल करना, परमाणुशक्ति संपन्न किसी देश से रक्षात्मक सहयोग लेना या फिर मध्यपूर्व क्षेत्र को परमाणु हथियार मुक्त बनाना.

यह वही समय है जब इराक़ में अमरीका ने सैन्य कार्रवाई शुरू की. इसे लेकर सऊदी अरब और अमरीका के बीच तनाव रहा क्योंकि सद्दाम हुसैन को हटाए जाने से वह नाख़ुश था. इसके अलावा इसराइल के प्रति अमरीकी नीति और ईरानी परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी वह पहले से तनावग्रस्त चल रहा था.

विकीलीक्स के ख़ुलासे से भी पता चलता है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच परमाणु कार्यक्रम पर कुछ चल रहा था.

खुली चेतावनी

सालों तक निजी तौर पर अमरीका को चेताने के बाद अब सऊदी अरब ने स्पष्ट सार्वजनिक चेतावनी देनी शुरू कर दी है कि अगर ईरान बम रख सकता है तो वह क्यों नहीं?

हालांकि इस चेतावनी को ईरान पर अमरीकी नीति के समर्थन में ही देखा जा रहा है. सवाल है कि क्या यह सऊदी अरब की परमाणु बम हासिल करने की लंबी परियोजना का हिस्सा है?

एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने दोनों देशों के बीच एक अलिखित लेकिन विस्तृत समझौते की पुष्टि की है.

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