क्या तालिबान के साथ सुलह हो सकती है?

  • 11 नवंबर 2013
हकीमुल्लाह मेहसूद

पाकिस्तान सरकार ने अमरीका पर आरोप लगाया है कि उसने जानबूझकर तालिबान नेता हकीमुल्लाह मेहसूद को मारकर देश में शांति प्रक्रिया की संभावनाओं को ख़त्म कर दिया है.

हकीमुल्लाह की एक नवंबर को ड्रोन हमले में मौत हो गई थी. लेकिन वास्तविकता यह है कि इस हिंसा को समाप्त करने के लिए न तो कभी कोई त्वरित समाधान था और न कभी होगा.

पाकिस्तान सरकार चाहे कुछ भी दावा करे, लेकिन हकीमुल्लाह मेहसूद शांति के दूत नहीं थे.

इस बात को कतई नहीं भूला जाना चाहिए कि उनके बम हमलों ने पाकिस्तान में सैकड़ों जवानों और आम नागरिकों को मौत के घाट उतारा है. उन्होंने चर्चों और मस्जिदों में आत्मघाती हमले कराए और यहां तक कि महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख़्शा.

इस संवेदनहीन हिंसा और देशभर में बने असुरक्षा के माहौल से पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय तंग आ चुकी है. उन्हें लगता है कि पाकिस्तान सरकार एक बेतुका तर्क दे रही है जिसका मक़सद देश के राजनीतिक परिदृश्य में भ्रम फैलाना और उसका धुव्रीकरण करना है. इससे भविष्य में चरमपंथ की जड़ें ही मज़बूत होंगी.

पाकिस्तानी सरकार का दावा है कि हकीमुल्लाह मेहसूद की मौत से देश में शांति प्रक्रिया पटरी से उतर गई है, लेकिन इसकी संभावना नहीं है कि पाकिस्तान तालिबान बातचीत के लिए तैयार था.

इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस दिन तालिबान नेता की मौत हुई थी, उसी दिन तालिबान प्रवक्ता शहीदुल्लाह शाहिद ने कहा था कि सरकार के किसी भी नुमाइंदे ने उनसे संपर्क नहीं साधा है.

बेमेल विचार

तालिबान प्रवक्ता शाहिद ने कहा था, "सरकार केवल मीडिया के ज़रिए घोषणाएं कर रही है. अभी कोई शांति प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई है."

ऐसा लगता है कि पाकिस्तान सरकार की बातचीत की अवधारणा तालिबान के विचारों से मेल नहीं खाती हैं.

पाकिस्तान के कई लोगों का सवाल है कि आख़िर तालिबान से बातचीत किस बारे में होनी है.

तालिबान की मांग है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को समाप्त कर देश में शरिया लागू किया जाए. इसके अलावा उसके पास सरकार को देने के लिए कुछ नहीं है जबकि सरकार संविधान या लोकतंत्र के साथ कोई समझौता नहीं कर सकती.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) नेता इमरान ख़ान ने ख़ैबर दर्रे से कराची को जोड़ने वाली सड़क को बंद करने की धमकी दी है. अफ़ग़ानिस्तान से अपना कामकाज समेट रहे अमरीका का साजोसामान इसी रास्ते जा रहा है. अमरीका ने अगले साल तक अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने सैनिकों को हटाने का लक्ष्य रखा है.

इमरान ने एक क़दम आगे जाकर अमरीका और नेटो की भी निंदा की है. उन्होंने अपने आलोचकों को अमरीकापरस्त, उदारवादी और पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों का एजेंट बताया है. वह उसी भाषा और तेवर का इस्तेमाल कर रहे हैं जो चरमपंथी करते हैं.

दूसरी तरफ़, प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने इस पूरे मामले में नपी-तुली प्रतिक्रिया व्यक्त की है क्योंकि वह अमरीका के साथ संबंधों को बरक़रार रखने की कोशिश कर रहे हैं.

आर्थिक मदद

वह अमरीका से मिल रही आर्थिक मदद को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. अमरीका ने हाल ही में 1.6 अरब डॉलर की मदद का रास्ता साफ किया है और साथ ही एक अरब डॉलर और देने का वादा किया है.

यही नहीं, अमरीका ने पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से 6.7 अरब डॉलर का ऋण दिलाने में भी मदद की है, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है.

इमरान की पार्टी के शासन वाले ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह के विकास बजट का एक तिहाई हिस्सा अमरीका की मदद से आता है.

शरीफ़ ने हाल ही में अमरीका का दौरा किया था और राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मिलकर दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम देने की कोशिश की है. पिछले कुछ सालों से दोनों देशों के संबंधों पर बर्फ पड़ी थी.

अमरीका का मक़सद कराची जाने वाली सड़क को खुला रखना है ताकि अगली गर्मियों तक अफ़ग़ानिस्तान से ज़्यादातर साजोसामान निकाला जा सके. हालांकि अमरीका के पास विकल्प के तौर पर मध्य एशिया का रास्ता है. अहम सैन्य साजोसामान को मज़ार-ए-शरीफ़ से हवाई मार्ग से ले जाया जा रहा है.

इमरान ख़ान का बयान विरोधाभासी है. वह लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सेना को हटाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब उसी सड़क को बंद करने की धमकी दे रहे हैं जहां से अमरीकी सेना आख़िरकार अपना बोरिया-बिस्तर बांध रही है.

यही विरोधाभास है जो पाकिस्तान को पड़ोसी देशों, मित्र देशों और पश्चिमी देशों से दूर कर रहा है.

तालमेल की कमी

इस्लामाबाद में एक पश्चिमी राजदूत ने कहा है कि उनके साथी पाकिस्तानी राजनेताओं, उनकी लगातार बदलती नीतियों और उनके बीच चरमपंथियों से लड़ने के लिए तालमेल की कमी से आजिज़ आ चुके हैं.

राजदूत ने कहा, "उनकी सोच ऐसी नहीं है जिससे लगे कि वो पाकिस्तान का हित चाहते हैं."

ऐसे में आगे का रास्ता क्या है?

इस बात की संभावना नहीं है कि इमरान ख़ान ख़ैबर दर्रे से कराची जाने वाली सड़क को बंद कराने में सफल होंगे क्योंकि प्रांतीय सरकार के पास यह अधिकार नहीं है. साथ ही सरकार और सेना की तरफ़ से ऐसा नहीं करने का दबाव होगा.

पूर्व क्रिकेटर इमरान चाहते हैं कि सरकार तालिबान के साथ बातचीत करे और उनकी इस मांग में कोई बदलाव नहीं आया है जबकि तालिबान का नया नेतृत्व हकीमुल्लाह मेहसूद की मौत का बदला लेने के लिए आने वाले दिनों में कई हमले कर सकता है.

लेकिन बावजूद इसके पांच नवंबर को इमरान और अन्य विपक्षी नेताओं ने सरकार से अनुरोध किया कि वह तालिबान से बात करने के प्रयास जारी रखे.

इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि शरीफ़ सरकार मौक़े की नज़ाकत देखते हुए फ़िलहाल तालिबान से बातचीत की दिशा में आगे नहीं बढ़ेगी.

हिंसा में बढ़ोतरी

यह इसलिए भी अहम होगा क्योंकि शियाओं के पवित्र महीने मुहर्रम के अवसर पर देश में हिंसा बढ़ने के आसार हैं. सांप्रदायिक संघर्ष पहले ही शुरू हो चुका है. मुहर्रम के पहले दिन पांच नवंबर को कराची में सुन्नी चरमपंथियों ने दो डॉक्टरों समेत सात शियाओं को गोली मारकर हत्या कर दी थी.

सरकार और सेना को चरमपंथियों से लड़ने के लिए ठोस व्यापक नीति बनाने की ज़रूरत है, जिसमें चरमपंथियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई, चुनिंदा चरमपंथी संगठनों से बातचीत, आर्थिक विकास और शिक्षा के प्रसार के उपाय शामिल हों.

साथ ही पाकिस्तान में केंद्रीय आतंकवाद निरोधी सचिवालय की भी ज़रूरत है, जहां सेना और असैन्य एजेंसियां एक साझा नीति पर काम कर सकें.

यह आम धारणा है कि 1970 के दशक में पाकिस्तान में शुरू हुई इस समस्या को तालिबान से बात करके तुरत-फुरत सुलझाया जा सकता है. लेकिन इस धारणा को ख़त्म करने के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही.

संवेदनहीन हिंसा पर उतारू चरमपंथियों से निपटने के लिए कोई फ़ौरी समाधान नहीं है. बल्कि सरकार को इसके लिए एक दीर्घकालिक नीति बनानी चाहिए, यही एकमात्र रास्ता है.

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