ब्रिटेन: विदेशी यौन अपराधी हर्जाने का हक़दार

ओल्ड बेली अदालत, लंदन
Image caption जुमा सालेह 2004 में 16 साल की उम्र में ब्रिटेन आए थे.

ब्रिटेन में रह रहे एक विदेशी यौन अपराधी ने हर्जाना मिलने का मामला जीत लिया है. हर्जाना मिलने की वजह ये है कि सरकार के उसे निर्वासित करने की कोशिशों के नाकाम होने के बाद उसे लंबे समय तक हिरासत में रखा गया था.

सूडान के 25 वर्षीय जुमा कातेर सालेह को चार साल की सज़ा काटने के बाद निर्वासन की प्रक्रिया पूरी होने के दौरान दो साल तक हिरासत में रखा गया.

सालेह उस पांच सदस्यीय गुट का हिस्सा थे, जिन्हें नाबालिग लड़कियों को यौन संबंध बनाने के लिए बरगलाने का दोषी पाया गया था.

अपने फ़ैसले में अदालत ने कहा कि जुमा सालेह की हिरासत की अवधि में से आठ महीने ग़ैर-क़ानूनी थे.

जजों के मुताबिक गृह मंत्रालय की ओर से हुई प्रशासनिक देरी की वजह से सालेह हर्जाने के हक़दार थे. मंत्रालय ने बाद में ये फ़ैसला लिया कि सालेह को मानवाधिकार कारणों से निर्वासित नहीं किया जा सकता.

जजों ने कहा कि प्रशासनिक देरी की कोई वजह नहीं दी गई थी और इसलिए हिरासत की अवधि को सही ठहराने की बात मानना मुश्किल हो जाती है.

मामला

जेल से छूटने के बाद जुमा सालेह लेस्टर में रह रहे थे. उनके हर्जाने के दावे को इस साल जनवरी में हाई कोर्ट के उप जज फिलिप मौट ने खारिज कर दिया था. सालेह ने इसके खिलाफ़ अपील की.

लेकिन अपील सुन रहे तीनों जजों ने सर्वसम्मति से फ़ैसला दिया कि उनकी अपील सही थी और उनका हर्जाना तय होना चाहिए.

जुमा सालेह नवंबर 2004 में 16 साल की उम्र में एक लौरी में छिपकर ब्रिटेन पहुंचे थे. उन्होंने ब्रिटेन में इस आधार पर शरण मांगी कि वे दारफुर के ज़घावा जनजाति के सदस्य थे और उनके परिवार को उस इलाके की बहुसंख्यकों ने असहनीय यातना दी थी.

Image caption सालेह को बच्चों के खिलाफ़ गंभीर यौन अपराधों का दोषी पाया गया था.

हालांकि सालेह की शरण की अपील खारिज हो गई थी लेकिन उन्हें अपने 18वें जन्मदिन तक ब्रिटेन में रहने की विवेकाधीन छूट मिल गई.

सालेह को पांच मई 2007 को गिरफ़्तार किया गया और उन पर बच्चों के खिलाफ़ गंभीर यौन अपराधों का आरोप लगा. आठ मई 2008 को उन्हें 13 साल की एक स्कूल छात्रा के साथ यौन क्रियाकलाप के अपराध का दोषी पाया गया और चार साल की सज़ा हुई जिसमें उन्हें युवा अपराधियों की एक संस्था में भेजा गया.

'अनुचित देरी'

सज़ा की वजह से जुमा सालेह को यूके बॉर्डर्स एक्ट 2007 के तहत बतौर विदेशी अपराधी निर्वासन के लिए सीधे तौर पर उपयुक्त पाया गया.

सालेह को जेल से आठ मई 2009 को रिहा कर दिया गया लेकिन उनके निर्वासन पर फैसला लेने की प्रक्रिया के दौरान वे अगले दो साल हिरासत में रहे.

फ़रवरी 2011 में एक आप्रवासन पंचाट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि इस बात के ज़बरदस्त सुबूत थे कि सालेह दारफ़ुर प्रांत के ज़घावा जनजाति के सदस्य हैं और अपने निर्वासन के खिलाफ़ उनकी अपील मानवाधिकार कारणों से सही थी.

अगस्त 2009 से अगस्त 2010 तक एक साल की अवधि में जब सालेह की निर्वासन टालने की अपील पर विचार हो रहा था, उस दौरान मामले में ''प्रशासनिक गतिविधि'' की ''वजह साफ़ नहीं थी''.

जुमा सालेह की हर्जाने की अपील की सुनवाई कर रहे जज का कहना था कि निर्वासन का सामना कर रहे लोगों को आप्रवासन क़ानूनों के तहत हिरासत में रखना तभी सही था जब उनके निर्वासन की सचमुच संभावना हो. जज ने ये भी कहा कि ऐसे लोगों के मामलों को निपटाने में अनुचित देरी की वजह से उन्हें हिरासत में रखे रहना ग़ैर क़ानूनी था.

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