मुश्किल डगर पर भारत-ब्रिटेन का दोस्ताना

मनमोहन सिंह, डेविड कैमरन

साल की शुरुआत में दिल्ली सहित भारत के कई शहरों में सड़क किनारे लगने वाले होर्डिंग्स पर ब्रिटेन की ज़िंदगी की आकर्षक तस्वीरें दिखाई जा रही थीं.

बसों, टैक्सियों और होर्डिंग्स के ज़रिए चलाए गए इस प्रचार अभियान का उद्देश्य 'ग्रेट ब्रिटेन' को प्रमोट करना था और और इसे दुनिया भर में दिखाया गया. ये विज्ञापन बेहद सतही तौर पर जारी किए गए थे और नए दौर के भारत के भारी-भरकम विरोधाभासों के उलट ये आश्चर्यजनक रूप से बेमेल भी थे.

वीसा बॉण्ड नियमों के विरोध में सांसद

जैसे कि इस 'महान' अभियान के पीछे मौजूद लोगों को ये पता ही नहीं था कि वे यहाँ किनसे बात कर रहे हैं और किस बारे में. कुछ ऐसी ही ग़लतियाँ ब्रिटेन में भारत के साथ रिश्तों को लेकर भी हुई हैं.

उत्साही मिज़ाज वाले प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की अगुवाई वाली सरकार की पेशकश ऊपर से तो आकर्षित करती है. लेकिन भारत के नज़रिए से देखें तो इस पैकेज को खोलने पर ये वैसा नहीं लगता जैसा कि विज्ञापन में दिखता था. इसके पीछे वजह भी है.

ज्यादातर लोग ये मानने लगे हैं कि ब्रिटेन बाहर से आए लोगों के लिए अपने दरवाज़े बंद कर रहा है. हालांकि ब्रिटेन की कूटनीति से जुड़े लोग इस सोच को ग़लत क़रार देते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री कैमरन बाहर से आए लोगों को रोकने के घरेलू दबाव पर अगर कुछ करते हैं तो बाहर उनकी मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं.

और कैमरन की बदली हुई भूमिका में भारतीय उन्हें एक ऐसे बेकरार व्यक्ति के तौर पर देख रहे हैं जोकि ब्रिटेन के एक पूर्व उपनिवेश को एक बार फिर से मौक़ा देने के लिए समझाने की कोशिश कर रहा है.

तीसरी यात्रा

ब्रितानी अधिकारी कहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद कैमरन की तीसरी यात्रा इस बात का सबूत है कि वे भारत के साथ दीर्घकालिक रिश्तों के लिए प्रतिबद्ध हैं. लेकिन भारत में अख़बारों ने इस बात को उठाया है कि मनमोहन सिंह उनसे मिलने ब्रिटेन एक बार भी नहीं गए.

और निजी बातचीत में भारतीय अधिकारी कैमरन के वापस लौटने पर हैरत जताते हैं. ख़ासकर उन स्थितियों में जबकि भारत में कुछ ही महीनों में चुनाव होने हैं और मौजूदा सरकार के भी कुछ ही दिन रह गए हैं.

अब भारत में पढ़ने आएंगे अमरीकी छात्र

एक वरिष्ठ अफ़सर ने बताया, "बातचीत के एजेंडे में कोई भारी-भरकम मुद्दा नहीं होगा. लेकिन हम उनकी यात्रा को दोनों मुल्कों के बीच बढ़ी हुई खटास को कम करने के लिए दोस्ताना रैवये के तौर पर देखते हैं."

दोनों देशों के बीच जो भी मुश्किलें हैं वह अप्रवासन के मुद्दे से जुड़ी हुई है. पिछले साल की तुलना में इस बरस ब्रिटेन जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में एक चौथाई की कमी आई है और इसके लिए ब्रिटेन की वीज़ा नीति को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

ब्रिटिश वीज़ा पाने में नाकाम हो गए एक भारतीय कारोबारी ने बताया, "हमेशा से ही लोग अच्छी शिक्षा पाने के लिए ब्रिटेन जाते रहे हैं. अब हमें कहीं और जाना होगा."

ब्रितानी अधिकारी कहते हैं कि ऐसी कहानियाँ पूरी तस्वीर बयान नहीं करती हैं और वीज़ा के लिए आवेदन करने वाले 80 फ़ीसदी भारतीय छात्रों को ये मिल जाता है. एक वरिष्ठ कूटनयिक कहते हैं, "सबसे बेहतर और संभावना भरे लोगों के लिए दरवाज़े हमेशा खुले हुए हैं."

अप्रवासन नीति

लेकिन वे ये भी स्वीकार करते हैं, "हमारी नीतियों को लेकर ग़लतफ़हमियाँ हैं." भारतीय वीज़ा आवेदकों से तीन हज़ार पाउंड माँगने के विवादास्पद विचार को छोड़ देने के बावजूद ब्रिटेन की स्थिति में मामूली ही बदलाव हुआ है.

अप्रवासियों की संख्या में भारी कटौती

दिल्ली की एक कंसल्टेंसी फ़र्म 'सन्नम एस4' से जुड़े एड्रायन मटन कहते हैं कि लोगों के विचार तब तक नहीं बदलेंगे जब तक कि ब्रिटेन अपनी अप्रवासन नीति की भाषा में बदलाव नहीं करता.

वे कहते हैं, "ब्रिटेन के नारे 'वी वेलकम दी ब्राइटेस्ट एंड दी बेस्ट' कई छात्रों को वीज़ा की रेस से बाहर कर देता है. इनमें से कई अच्छे विद्यार्थी हैं और 'वीज़ा के लिए ईमानदार आवेदक' भी. ये लाखों रूपए ब्रिटेन में कोर्स फ़ी और रहने के ख़र्च के तौर पर निवेश करने के लिए इच्छुक हैं."

इस बीच कई अन्य पश्चिमी देश भारतीय छात्रों को अपनी ओर लुभाने के लिए कोशिश कर रहे हैं. भारतीय कंपनियाँ ब्रिटेन के कारोबारी जगत में अपना दख़ल लगातार बढ़ा रही हैं और जब बात ठेके जीतने की आती है तो ब्रितानी कंपनियाँ उनसे पिछड़ जाती हैं.

अभी भी दक्षिण एशिया के बाहर किसी अन्य देश की तुलना में भारत के रिश्ते ब्रिटेन के साथ सबसे ज्यादा गहरे हैं. भारत ब्रिटेन को पसंद तो करना चाहता है लेकिन वह डेविड कैमरन के तीसरी बार भारत आने से ज्यादा की उम्मीद रखता है.

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