जलवायु समझौते पर मतभेदों के बाद सहमति

वारसा में जलवायु वार्ता

पोलैंड के वारसा में चल रही संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ता में आए प्रतिनिधियों के बीच 'ग्लोबल वार्मिंग' से लड़ने के तौर-तरीकों को लेकर सहमति बन गई है. इसी के साथ वार्ता खत्म हो गई है.

तीस घंटे के गतिरोध के बाद पेरिस 2015 के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाली नई विश्व जलवायु संधि पर मंजूरी प्रदान कर दी. इस समझौते को लेकर आखिरी लम्हों में सहमति बन पाई. हालांकि इससे पहले मसौदे पर एक एक शब्द के लिए गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी.

बातचीत में ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहे विश्व में विकासशील देशों के नुकसान और उसकी भरपाई के विवादास्पद मुद्दे पर भी प्रगति हुई. ग्रीन ग्रुप ने आर्थिक पहलू को लेकर विशेष प्रतिबद्धता की कमी पर नाराजगी जताई. तूफान हेयान के साये में 'द कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज'(सीओपी) की दो हफ्ते पहले शुरुआत हुई थी.

कांफ्रेंस के दौरान ही ऑडिटोरियम में बोलते हुए फिलिपींस प्रतिनिधि दल के प्रमुख येब सानो की आंखों से आंसू निकल पड़े. उन्होंने मार्मिक अपील की, ''इस जलवायु पागलपन को रोका जाए.'' लेकिन तमाम अच्छे इरादे उन राजनीतिक और आर्थिक हकीकतों की उस जटिल प्रक्रिया पर आधारित थे, जिसमें समझौते के लिए सर्वानुमति बनाई जानी थी.

वहाँ बने माहौल में जापान सरकार की इस घोषणा ने भी रंग में भंग डाला कि वह साल 2020 के लिए तय उत्सर्जन उद्देश्यों को पूरा करने की स्थिति में नहीं है. इस कांफ्रेंस की अध्यक्षता पोलैंड कर रहा था. कोयले उद्योग की ओर बढ़ती दिलचस्पी के लिए पोलैंड की आलोचना भी हुई.

वास्तविकता में कम

तभी एक और खबर आई कि मीटिंग की अगुवाई कर रहे पर्यावरण मंत्री को पोलिस सरकार के फेरबदल में हटा दिया गया है. कुल मिलाकर शिरकत करने वाले तमाम प्रतिनिधियों ने माना कि मीटिंग से कम हासिल हुआ है.

समस्याएं कई थीं-वित्त, नुकसान की भरपाई और एक तय रूपरेखा विकसित करने की दिशा में काम ताकि पेरिस 2015 में नए विश्व समझौते के लिए समय सीमा तय की जा सके. मुश्किल काम था रूपरेखा के लिए खाका तैयार करना. ये समझौते का सबसे मुश्किल पहलू साबित हुआ क्योंकि बैठक शुक्रवार रात से आगे जारी रही और फिर शनिवार शाम तक जा पहुंची.

क्योतो प्रोटोकोल से उलट धनी देश सबकुछ सभी पर लागू करना चाहते हैं, खासकर उभरते हुए 'जाएंट्स' भारत और चीन पर. हालांकि बहुत से और उभरते हुए देश इस दृष्टिकोण समझौते में मतभेदों की आग को भी बरकरार रखना चाहते थे. इसमें वेनेजुएला भी शामिल है.

लड़ाई मार्ग प्रशस्त करने वाले दस्तावेज में इकलौते शब्द पर केंद्रीत रही. पैराग्राफ 2बी में मूलरूप से सभी देशों की जब 'प्रतिबद्धता' की बात की गई तो चीन और भारत के प्रतिनिधियों ने इसे तुरंत खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वो इस भाषा को स्वीकार नहीं कर सकते.

चीन के मुख्य समझौताकार सु वेई ने कहा, ''प्रतिबद्धता केवल विकसित देशों की होनी चाहिए. उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं से केवल कार्रवाई में तेजी की अपेक्षा की जानी चाहिए.''

समय बीतता जा रहा था, निराश मंत्री और उनके सलाहकार किसी समझौते पर पहुंचने के लिए हॉल के कोने में इकट्ठा हो गए. एक घंटे के बाद वो लोग 'प्रतिबद्धता' शब्द को बदलकर इसे 'सहयोग ' करने पर राजी हो गए. इस कहीं ज्यादा लचीले शब्द पर सभी सहमत दिखे.

नुकसान

अमरीका और यूरोपीय यूनियन को लगा सभी एक धरातल पर हैं तो चीन और भारत को लगा कि उनके बारे में माना गया है कि वो धनी देशों से इतर कुछ अलग कर रहे हैं. यूरोपीय यूनियन के जलवायु आयुक्त कॉनी हेगॉर्ड ने राहत की सांस ली कि मुख्य बात पर सहमति बन गई है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''ये वाकई चुनौतीभरा है लेकिन हमने आगे बढ़ने का रास्ता पा लिया है. पेरिस के और सुंदर और तेज रास्ते हैं लेकिन यहां महत्वपूर्ण ये है कि निष्कर्ष अच्छा निकला है, मैं सोचती हूं कि मैने जो कुछ देखा, उसके बाद ये क्रियान्वित किए जाने योग्य है.''

नुकसान और उसकी भरपाई का मुद्दा एक और अहम लड़ाई का बिंदु था. ये विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण था. उनका कहना था कि मौसम से बदलावोंसे निपटने के लिए उन्हें दिया जा रहा धन तो ठीक है लेकिन हेयान तूफान सरीखी बातों से निपटने के लिए कुछ अतिरिक्त किए जाने की जरूरत है.

उनका तर्क था कि मौसम बदलावों का असर होता है और इसके आर्थिक पहलुओं के मद्देनजर एक ऐसी संस्था बनाई जाए जो नुकसान का जायजा ले सके. मसौदे में इस पर कहा गया कि नई मशीनरी संयुक्त राष्ट्र के 'तहत' होगी, संयुक्त राष्ट्र पहले से ही ऐसी बातों से निपटता रहा है.

हर कोई खुश नहीं

इस 'तहत' शब्द ने विकसित देशों के प्रतिनिधियों को बेचैन कर दिया. इसमें येब सानों भी शामिल थे. उन्होंने इस पर हस्तक्षेप भी किया. उन्होंने कहा, "इतनी अहम बात को केवल एक शब्द में निपटा दिया गया और मैं कहना चाहूंगा कि ये वो क्षण है जब प्रक्रिया को स्पष्ट तौर पर पारिभाषित किया जाए. हमें साहसिक कदम उठाने की जरूरत है."

इसके बाद फिर कुछ लोग इकट्ठा हुए और इस शब्द को बदला गया और इस पर भी सहमति बनी. लेकिन हर कोई खुश नहीं था. एक्शन एड के हरजीत सिंह ने कहा कि नई मशीनरी पिछले साल से किया गया महज एक वादा भर है.

उन्होंने कहा कि वारसा में नुकसान के जिस न्यूनतम स्थिति तक हम पहुंचे थे, हम अभी भी वहीं खड़े हैं. कुछ धनी देश इसमें रोड़ा अटका रहे हैं जिसमें अमरीका भी शामिल है.

हालांकि संस्था 'यूनियन ऑफ कंसंर्ड साइंटिस्ट' के एल्देन मेयर ने कहा, ''लुढकते हुए पत्थर के साथ हम हमेशा वांछित चीज नहीं पा सकते.लेकिन कई बार कड़े प्रयासों से आप जो चाहते हैं वो पा भी लेते हैं.''

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