-30 और 5,000 किमी पदयात्रा

  • 28 नवंबर 2013

एक इंसान, नवंबर का महीना, बर्फ़, कंटीले रास्ते, चीन की दीवार, और 5000 किलोमीटर. अब इसे जुनून कहिए या दुस्साहस भूविज्ञान का एक अध्यापक मंगोलिया और हाँगकाँग के एक रोचक सफ़र पर निकल पड़ता है.

वो दुस्साहसी व्यक्ति हैं ब्रिटेन के रौब लिलवॉल. उनकी ये अनूठी पैदल यात्रा नवंबर की ठिठुरती हुई सर्दी में मंगोलिया के गोबी मरुस्थल से शुरू होती है और चीन के ख़ूबसूरत ठिकानों से गुज़रती हुई हाँगकाँग पहुंचती है.

रौब लिलवॉल ने अपने इस दुस्साहसी अभियान पर एक किताब 'वॉकिंग होम फ्रॉम मंगोलिया' लिखी है. बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने अपनी अनोखी पैदल यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभव साझा किए.

रौब लिलवॉल के ज़ेहन में जब कुछ एकदम अलग हट के करने का ख़्याल आया तो उन्होंने इस सफ़र की योजना बनाई. इस सफ़र के लिए उन्होंने मंगोलिया से हाँगकाँग का रास्ता चुना.

रौब बताते हैं, "मेरी पत्नी चीनी हैं. मैं चीन को नज़दीक से देखना पहचानना चाहता था. इसलिए मैंने चीन जाने का फ़ैसला किया."

ऐडवेंचर पसंद है

लिलवॉल अपनी इस पैदल यात्रा से पहले ऐसा ही एक और अभियान पूरा कर चुके हैं. वह अभियान लंदन से साइबेरिया की साइकिल यात्रा थी.

मगर वो अपने इन अभियानों से आख़िर क्या साबित करना चाहते हैं?

रौब ने बताया, "मुझे एडवेंचर पसंद हैं. मैं भूगोल का अध्यापक भी रह चुका हूं. मैं सोचता हूं कि अलग-अलग जगहों पर इस तरह के अभियान पर निकलने से भूगोल के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिलती है. इसके अलावा ज़रूरतमंद छात्रों के लिए चंदा जुटाने का यह एक अच्छा साधन भी हो सकता है."

सफ़र की शुरुआत उन्होंने मंगोलिया के गोबी मरुस्थल से की. तब आधा नवंबर बीत चुका था. वहां तापमान शून्य से भी 10 डिग्री नीचे था.

रेत पर बर्फ़ की चादर

रौब बताते हैं, "नीले आसमान के नीचे चलना शुरू करने के एक हफ़्ते बाद ही बर्फ़ गिरने लगी थी. सारा मरुस्थल सफ़ेद बर्फ़ की चादर तले ढक चुका था. हमें मॉली को चलाने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी."

'मॉली' उस गाड़ी का नाम था जिस पर रौब सफ़र के दौरान इस्तेमाल आने वाले भोजन, पानी जैसी बेहद ज़रूरी चीज़ों को ले कर चलते थे. मॉली 100 किलो के वज़न का सामान ढोती रही.

शुरू-शुरू में इतने सामान के साथ वो एक घंटे में केवल दो मील ही चल पाते थे. रफ़्तार बहुत धीमी हो जाती थी.

सफ़र के दौरान उन्हें निर्जन, बर्फ़ीले, पथरीले, पहाड़ी रास्तों से गुज़रना पड़ा. इन रास्तों पर दिन रात चलना बेहद चुनौती भरा था. धीरे-धीरे शरीर थकने लगा था.

लिलवॉल कहते हैं, "साइकिल यात्रा इतनी मुश्किल नहीं थी. लगातार चलने से पीठ और घुटनों पर काफ़ी दबाव पड़ने लगा."

चीन की सीमा में पहुंचते ही रौब ने रफ़्तार तेज़ करने के लिए गाड़ी छोड़ दी और सारा सामान पीठ पर लाद लिया.

गुफाओं में घर

गोबी मरुस्थल से चलते हुए रौब चीन की सरहदों में पहुंचे. सफ़र के दौरान चीन की दीवार से गुज़रने का मौक़ा मिला.

लिलवॉल बताते हैं कि सफ़र का ये हिस्सा उनके लिए सबसे ख़ूबसूरत था. वो बताते हैं कि उस हिस्से में लोगों ने गुफ़ाओं में घर बना रखे थे. पहाड़ों पर पूरा गांव बसा हुआ था.

गांव में चलते-चलते कई बार पैरों के नीचे चिमनी आ जाती थी.

लिलवॉल ने बताया, "सफ़र का सबसे अच्छा पहलू ये रहा कि राह चलते हुए जो लोग मिलते थे वे मिलकर बेहद ख़ुशी ज़ाहिर करते थे. उनका व्यवहार काफ़ी दोस्ताना था. वे बड़े कौतूहल से हमें देखते थे."

धुएं में डूबा शहर

लोगों ने उनकी आवभगत करने में भी कोई कोर कसर नहीं रखी. इससे जुड़ा एक वाक़या बताते हैं.

"हम लोग एक बार एक गांव में रात को पहुंचे. हमें रात में रुकने के लिए कहा गया. वो जनवरी का महीना था. सर्द हवाएं चल रही थीं. तापमान शून्य से 20 डिग्री नीचे था."

"हमें एक गुफ़ा वाले घर में ले जाया गया. उन लोगों ने ख़ूब स्वागत किया. रात कैसे बीत गई पता ही नहीं चला."

लिलवॉल को अपनी पैदल यात्रा के दौरान कई ऐसे औद्योगिक इलाक़ों से गुज़रना पड़ा जहां की ज़मीन पर कहीं-कहीं तो पांव रखना तक मुश्किल हो रहा था.

लिलवॉल ने कहा, "चीन और मंगोलिया में बहुत सारे नए उद्योग सीमा से सटे इलाक़ों में स्थित हैं. कहीं कहीं तो पूरा शहर बसा हुआ है. मिल है, कारख़ाने हैं. कहीं तो पूरा इलाक़ा कारख़ानों से निकलने वाले धुएं में डूबा हुआ था."

गोबी मरुस्थल में एक बार ऐसी ही बहुत बड़ी मिलों और चिमनियों को शूट कर हाँगकाँग भेज रहे थे. फ़िल्म बना रहे थे. बड़ा झटका लगा. चेतावनी दी गई.

12 दिन तक बिना नहाए

सफ़र के दौरान कई दूसरी तरह की मुश्किलें भी पेश आती रहीं. जैसे चोट लगना, रास्ता भटक जाना, कैमरा टूट जाना, कंटीले रास्ते, इंफेक्शन आदि.

लिलवॉल बताते हैं, "मुझे मंगोलिया से हाँगकाँग तक की पैदल यात्रा में 193 दिन यानी लगभग छह महीने से ज़्यादा दिन लगे. मैं इस बीच सप्ताह में एक दिन या 5-6 हफ़्ते में चार दिन का ही विश्राम ले पाता था."

लगभग 25 किलो वज़न का सामान उठाए चलना पड़ता था. एक दिन में 25 मील चलते थे. एक दिन में 10-12 घंटे चलते रहे. इसलिए समय समय पर रुक कर आराम करना मजबूरी थी.

सफ़र के दौरान खाने के लिए लिलवॉल ने बड़ा बजट नहीं होने के कारण अपने पास कुछ सस्ती चीज़ों को रखा जो फटाफट बन जाती हो. जैसे इंस्टेंट नूडल. इसके अलावा कभी-कभी वो चीन के शहर या गांवों के रेस्तरां और होटलों में जाकर भी खाते रहे.

सफ़र के दौरान अपने नहाने के बारे में लिलवॉल कहते हैं, "एक बार तो 12 दिन तक मुझे बिना नहाए रह जाना पड़ा. तब मैं गोबी मरुस्थल में था. सफ़र के दौरान अभियान चलाते चलाते वक़्त की काफ़ी कमी पड़ जाती थी."

193 दिन के बाद उनका सफ़र अपनी मंज़िल पर पहुंचता है और हाँगकाँग में वो पत्नी से गले मिलते हैं.

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