'चीनी लेबर कैंप की वो खौफ़नाक यातनाएं'

  • 29 नवंबर 2013
लियू हुआ की डायरी

50 साल की लियू हुआ के ज़हन में लेबर कैंप की यातनाएं अब भी ताज़ा हैं.

अपने गाँव की ज़मीन पर सरकारी कब्ज़े का विरोध करने के आरोप में पिछले सात सालों में उन्हें तीन बार लेबर कैंप भेजा जा चुका है. उन्हें 'लेबर कैंप के ज़रिए दोबारा शिक्षा' योजना के तहत लेबर कैंप भेजा गया था.

लेकिन पिछली बार जब उन्हें लेबर कैंप भेजा गया तो उन्होंने कुछ ऐसा किया जिसने लेबर कैंप में मज़दूरों को दी जाने वाली यातनाओं की पोल खोल दी. इस बार उन्होंने एक गुप्त डायरी में लेबर कैंप की गतिविधियाँ दर्ज़ की.

लेबर कैंप में उन्हें रोज़ाना 11 घंटे काम करना पड़ता था. एक बच्चे की माँ हुआ को चीनी सेना के सिपाहियों के लिए जैकेट बनाने के काम में लगाया गया था.

सुरक्षाकर्मियों की निगरानी से बचकर वे कपड़े चुराती और उसी पर अपनी डायरी लिखती.

बीजिंग के अपने छोटे से अपार्टमेंट में उन्होंने मेरे सामने मेज़ पर एक ऐसा कपड़ा रखा जो देखने में रजाई जैसा लग रहा था. लेकिन ध्यान से देखने पर पता चला कि ये दो साल के दौरान लिखी गई डायरी का हिस्सा है.

इस असाधारण दस्तावेज़ में लेबर कैंप में कामगारों के शोषण की कहानी थी. 13 सितंबर 2011 की घटना को दर्ज करते हुए उन्होंने सुरक्षाकर्मियों द्वारा एक साथी कामगार के शोषण के बारे में लिखा है. कामगार को डंडे से पीटा गया था. हुआ लिखती हैं, "मार के बाद उसका पूरा चेहरा नीला पड़ गया था."

जानवरों जैसा सलूक

Image caption गाँव की ज़मीन पर सरकारी कब्ज़े का विरोध करने के आरोप में हुआ को लेबर कैंप भेजा गया था.

हुआ ने मुझे लाल रंग की एक छोटी-सी थैली दिखाई. इसके अंदर नीले रंग का एक पैन और रिफ़िल रखी थी. वे इसी से अपनी डायरी लिखा करती थीं.

हुआ इस थैली को अपनी बगल में छुपाकर लेबर कैंप में ले जाती थी. किस्मत से सुरक्षाकर्मियों की नज़र में ये थैली कभी भी नहीं आई.

जब उनकी कोई साथी लेबर कैंप से रिहा होती तो वे उन्हें कपड़ों पर लिखे अपने दस्तावेज़ बाहर ले जाने के लिए दे देतीं. जब वे बाहर निकली तो उन्होंने अपने साथियों के ज़रिए बाहर भेजे गए डायरी के हिस्से इकट्ठा किए.

साल 2010 में बीज़िग की सड़क से उन्हें उठा लिया गया था. उन्हें गाँव की ज़मीन पर सरकारी कब्ज़े का विरोध करने के आरोप में हिरासत में रखा गया. उनके मामले की कोई सुनवाई नहीं हुईं, क्योंकि उन्होंने कोई ग़ुनाह ही नहीं किया था.

हुआ के मुताबिक़ लेबर कैंप में क़ैद के दौरान उन्हें मारा-पीटा जाता था. कैंप में करीब 400 औरतों को रखा गया था. वे कहती हैं, "हमारे साथ ग़ुलामों जैसा व्यवहार किया जाता था. हम कम्युनिस्ट पार्टी के ग़ुलाम थे."

पाबंदी

इसी महीने चीन ने लेबर कैंपों को बंद करने की घोषणा की है. चीन में इनके प्रति गुस्सा बढ़ रहा था. ये ऐसे ही हैं जैसे कि रूस में गुलाग के कैंप हुआ करते थे.

छोटे-मोटे अपराधियों, विरोध प्रदर्शन करने वालों और सरकार से असंतुष्ट लोगों को चार साल के लिए बिना सुनवाई के लेबर कैंपों में भेज दिया जाता है.

लेबर कैंप के बुरे अनुभवों के बाद अब हुआ फिर से ज़िंदगी को पटरी पर लाने की कोशिशें कर रही हैं. लेकिन जो उनके साथ हुआ, उसे भूलना मुश्किल है.

वे कहती हैं, "हमें जानवरों की तरह रखा जाता था. हम सिर्फ आम नागरिकों की तरह रहना चाहते थे, इससे ज़्यादा हमें कुछ नहीं चाहिए था."

कैंपों के बंद होने की ख़बर से उन्हें थोड़ी राहत पहुँची हैं. वे कैंपों में भेजे जाने से इतना निराश थीं कि एक बार अपनी जान लेने की कोशिश तक कर चुकी थीं.

उन्हें लगता है कि भले ही कैंप बंद हो गए हैं, लेकिन फिर भी कम्युनिस्ट पार्टी को उन्हें बंद करने का कोई न कोई बहाना मिल ही जाएगा.

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