अकाल से मौतें या स्टालिन राज का नरसंहार?

युक्रेन में होलोदोमोर का स्मारक

अस्सी साल पहले लाखों यूक्रेनवासी अकाल में भुखमरी से मारे गए थे. माना जाता है कि ये लोग जोसेफ़ स्टालिन के सोवियत राज में जानबूझकर मौत के मुंह में झोंके गए.

यूक्रेनवासी हर साल इसकी याद में स्मृति दिवस मनाते हैं. बीबीसी के डेविड स्टर्न ने पाया कि उस दौर की धुंधली यादें अब भी कई लोगों के ज़ेहन में ताजा हैं.

80 साल की ऊर्जा से भरपूर नीना केरपेंको बताती हैं कि होलोदोमोर यानी अकाल के उस तांडव के दौरान वे कैसे ज़िंदा रहीं.

उस भयानक जाड़े में उन्होंने और उनके परिवार ने कुछ सस्ते भुट्टे के दाने, गेहूं की भूसी, सूखी पत्तियां और दूसरा घासफूस खाकर जीवन बचाया था. ये 1932-33 के डरावने जाड़े थे.

जब केरपेंको अपनी कहानी बता रही थीं तो वे इस सामग्री को गूंथकर पानी और नमक मिलाकर दिखा भी रही थीं.

उन्होंने जो बनाकर दिखाया, वह उनके अनुसार ब्रेड थी. हालांकि यह उसके मानकों में शायद ही फ़िट हो. इसके बाद उन्होंने पैन में बचा-खुचा मोम फैलाया ताकि इसे भून सकें और फिर ओवन में डाल सकें.

केरपेंको के पिता की मौत उन्हीं दिनों बहुत जल्दी हो गई थी. उनके पैर फूल गए थे. वह कम खाना खाने की कोशिश करते थे- यह लक्षण उन सभी में पाया जाता था, जो भुखमरी के बेहद क़रीब थे.

उनकी मां नौ मील चलकर पास के कस्बे में जातीं कि खाने की कोई चीज मिल जाए, जिससे वह और उनके भाई-बहन ज़िंदा रह सकें. उन्होंने दो किलो आटे के लिए अपनी संचित पूंजी और गले में पहना सोने का क्रॉस बेच दिया था.

ओवन में ब्रेड तैयार हो चुकी है. केरपेंको उसे निकालती हैं. यह कड़ी और घास सरीखे स्वाद वाली है, लेकिन घासफूस की इसी तरह की पावरोटी ने उनके परिवार का जीवन बचाया था.

इसके साथ उनकी मां घोड़े की खाल को कई टुकड़ों में काटकर सूप बनाती थीं. इस तरह उस वसंत में केरपेंको परिवार ज़िंदा रह पाया. वो चारे की तलाश में लगातार पास के जंगलों में जाते थे.

मध्य यूक्रेन के उनके गांव मातस्विस्ति में दूसरे लोग शायद इतने भाग्यशाली नहीं थे.

मरघटी सन्नाटा

वह बताती हैं कि गांव में उन दिनों मरघटी सन्नाटा रहता था. लोग होशोहवास में नहीं थे. वो न तो कुछ बोलना चाहते थे और न कुछ देखना.

वो यही सोचते कि आज इस शख़्स की मौत हो गई, हो सकता है कि कल मेरा नंबर आ जाए. हर कोई बस मौत के बारे में सोचता रहता था.

यूक्रेन हर साल इस त्रासदी की याद में होलोदोमोर स्मृति दिवस मनाता है, जो नवंबर के चौथे शनिवार को मनाया जाता है.

क्या यह इरादतन था

येल यूनिवर्सिटी के इतिहासकार टिमोथी सिंडर की तरह कुछ इतिहासकारों ने यूक्रेन के इस हादसे पर सघन शोध किया है.

उनका मानना है कि इस त्रासदी में करीब 33 लाख लोग मारे गए थे. मगर कुछ लोगों का कहना है कि यह संख्या कहीं ज़्यादा थी और 45 लाख तक हो सकती है.

इस अकाल में गांव के गांव साफ़ हो गए. कुछ इलाक़ों में मौत की दर एक-तिहाई तक पहुंच गई. दुनियाभर में सबसे उर्वर यूक्रेन का देहाती इलाक़ा सन्नाटे भरी बंजर भूमि में बदल गया था.

शहरें और सड़कें उन लोगों से पटी दिखाई पड़ती थीं, जिन्होंने खाने की तलाश में अपने गांव छोड़ दिए थे. कुछ लोग सड़क किनारे मरे दिखाई पड़ते थे. तब व्यापक तौर पर नरभक्षण की ख़बरें मिला करती थीं.

केरपेंको जब दोबारा स्कूल खुलने के बाद वहां गईं, तो दो-तिहाई सीटें खाली पड़ी थीं.

होलोदोमोर का दर्द केवल इसलिए नहीं था कि बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हुई थी. बहुत से लोग मानते थे कि ये सब मानव सृजित और इरादतन किया गया संहार था.

उनका कहना था कि स्टालिन चाहते थे कि विद्रोही यूक्रेनियन किसान भूखमरी से मर जाएं और उन्हें सामूहिक खेती के लिए बाध्य किया जाए.

तब क्रेमलिन ने किसानों द्वारा उपलब्ध कराए अनाज से कहीं ज़्यादा की मांग की थी. विरोध करने पर कम्यूनिस्ट पार्टी कार्यकर्ता गांवों में आ गए और जो खाने लायक था, सब उठा ले गए.

केरपेंको कहती हैं कि ब्रिगेड सारा गेहूं उठा ले गई. शायद ही कुछ हमारे लिए बचा हो. यहां तक कि लोगों ने जो बीज रखे थे, वो भी नहीं बचे.

उन्होंने बताया, ''ब्रिगेड के लोग हर ओर फैले थे और सब कुछ ले जा रहे थे. वो चाहते थे कि लोगों के पास कुछ न बचे और उनके पास मरने के अलावा कोई चारा न रहे.''

संहार पर विवाद

विशेषज्ञों का कहना है कि जब भुखमरी बढ़ी तो सोवियत अधिकारियों ने अतिरिक्त कदम उठाए. उन्होंने यूक्रेन की सीमाएं बंद कर दीं ताकि किसान कहीं जा न सकें और न खाना पा सकें. ये मौत की सज़ा की तरह था.

कीएव होलोदोमोर मेमोरियल म्यूज़ियम की ओलेकसांद्रा मोनेतोवा कहती हैं, ''अधिकारियों का इरादा साफ़ था. मेरे लिहाज़ से तो ये नरसंहार था. इसमें मुझे कोई शक नहीं.''

मगर दूसरों के लिए यह सवाल अभी अनुत्तरित है. रूस ने इसे नरसंहार कहे जाने पर हमेशा आपत्ति जताई और कहा कि यह अकाल की आपदा थी.

क्रेमलिन अधिकारी जोर देते हैं कि होलोदोमोर केवल एक त्रासदी थी. यह इरादतन नहीं थी. तब सोवियत संघ के दूसरे इलाक़ों का भी यही हाल था.

यूक्रेन के वर्तमान नेता विक्टर यानुकोविच क्रेमलिन की बातों को ग़लत ठहराते हैं. वे इसे तयशुदा तौर पर नरसंहार ही मानते हैं.

विर्को बाली अमरीकी संगीतज्ञ हैं, जो यूक्रेन में पैदा हुए. वह चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय तौर पर होलोदोमोर त्रासदी को मान्यता मिले. वह इसके लिए प्रयास में लगे हैं.

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