राजनीतिक अनिश्चितता के भंवर में बांग्लादेश

बांग्लादेश में आगामी पांच जनवरी को चुनाव होने हैं, लेकिन इस चुनाव का विपक्ष विरोध कर रहा है. इसके चलते देश में नयी तरह की हिंसा और अनिश्चितता का माहौल बन गया है. हाल के दिनों में हिंसक प्रदर्शनों और सड़क जाम के चलते सबकुछ ठप पड़ा हुआ है.

बांग्लादेश की मुख्य विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने प्रधानमंत्री शेख हसीना की अंतरिम सरकार को गिराने के लिए देश भर में विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया है.

देश में चुनाव पांच जनवरी को कराने का फ़ैसला चुनाव आयोग ने लिया है. यह संवैधानिक रूप से ज़रूरी भी था, क्योंकि 24 जनवरी को मौजूदा संसद का कार्यकाल पूरा हो रहा है.

2007 में इसी तरह की चुनौती देखने को मिली थी, जिसके बाद सेना को दखल देना पड़ा था. तब एक कार्यवाहक सरकार बनी जिसके सामने राजनीतिक सुधार के साथ साथ भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की चुनौती थी.

हालांकि वह सरकार उसमें कामयाब नहीं हुई लेकिन उसने देश में काफ़ी हद तक संवैधानिक व्यवस्थाओं को लागू कर दिया जिसके चलते निष्पक्ष चुनाव संभव हो पाया.

इसी चुनाव में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग ज़ोरदार जीत के साथ 2009 में बहुमत में आई.

शेख हसीना का विरोध

इस बार भी मुख्य विपक्षी दल बीएनपी और उसके मुख्य साझीदार जमात-ए-इस्लामी भी चुनाव से पहले एक निष्पक्ष कार्यवाहक सरकार चाहते हैं. उनकी दलील है कि शेख हसीना की सरकार के रहते निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है.

आम लोगों की राय भी यही है कि मौजूदा स्थिति के लिए देश की प्रधानमंत्री ज़िम्मेदार हैं और उनके पद से हटने के बाद स्थिति में सुधार संभव है.

हालांकि बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के विरोध प्रदर्शन के तौर तरीक़ों पर भी चिंता जताई जा रही है. 25 अक्टूबर से उन्होंने देश भर में हड़ताल और सड़क-रेल बंद अभियान चलाया हुआ है. इससे देश को काफ़ी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है और हिंसा भी हुई है.

हिंसा की घटनाओं में चट्टगाँव को ढाका से जोड़ने वाली सड़क पर दर्जनों वाहन जला दिए गए या क्षतिग्रस्त किए गए.

सबसे बड़ा नुकसान कपड़ा उद्योग को हुआ है. बांग्लादेश के कुल निर्यात में 80 फ़ीसदी हिस्सा कपड़ा उद्योग का ही है और बीते एक सप्ताह के दौरान कपड़ों का निर्यात नहीं हो पाया है.

ठप पड़ा है निर्यात

प्रमुख कपड़ा निर्यातक समूह मोहम्मदी समूह की प्रबंध निदेशक रुबाना हक़ ने बीबीसी से बताया, "अगर मौजूदा स्थिति एक महीने तक और जारी रही तो पूरी अर्थव्यवस्था ठहर जाएगी और उसे पटरी पर लाना इतना आसान नहीं होगा."

पिछली बार के राजनीतिक आंदोलनों की तरह इस बार राजधानी और देश के दूसरे शहरों में आम लोगों का प्रदर्शन या रैली नज़र नहीं आती.

लेकिन देश की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग गुरिल्ला पद्धति से निशाना बना रहे हैं. सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का इस्तेमाल आम लोग करते हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक़ यह एक ख़तरनाक चलन है.

ढाका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर और कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता एमएम आकाश ने कहा, "लोकतांत्रिक तरीक़ों के विरोध प्रदर्शन की जगह अलोकतांत्रिक तरीक़ों ने ले ली है. इस आंदोलन के जरिए आतंक फैलाने की कोशिश हो रही है."

26 नवंबर के बाद देश में जारी हिंसा के दौरान कम से कम 40 लोगों की मौत हुई है. इसमें कुछ लोग विरोध प्रदर्शन करने वालों के शिकार हुए हैं तो कुछ को पुलिस ने शिकार बनाया है.

कई जगहों पर रेल की पटरियों का उखाड़ा गया है जिसके चलते रेलगाड़ियां पलटी हैं और इसके चलते तीन लोगों की मौत हुई है जबकि सैकड़ों लोग घायल हुए हैं.

बीएनपी की मुखिया खालिदा जिया ने अपनी पार्टी को हिंसक कार्रवाईयों से दूर रहने को कहा है जिसमें, सवारियों से भरी बसों में आग लगाना जैसी कार्रवाईयां शामिल हैं.

लेकिन उनकी पार्टी के दूसरे नेता इतनी समझदारी नहीं दिखा रहे हैं.

युद्ध जैसे हालात

सेना के पूर्व अधिकारी और राजनयिक मोबिन चौधरी खालिदा जिया के प्रमुख सलाहकार हैं, वो मौजूदा स्थिति की तुलना युद्ध से कर रहे हैं.

उन्होंने बीबीसी की बंगाली सर्विस से एक इंटरव्यू में कहा, "दुनिया भर में आपने साफ सुथरा युद्ध कहां देखा है? क्या पश्चिमी देशों की शक्तियों ने युद्ध के दौरान अफ़गानिस्तान में निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की हत्याएं नहीं की हैं?"

मोबिन चौधरी के मुताबिक़ मौजूदा संकट की असली वजह सरकार का आम लोगों पर अस्वीकार्य चुनावी शर्तें थोपना है.

बांग्लादेश के विकास में अहम साझीदार अमरीका और यूरोपियन यूनियन ने चिंता जताई है कि बीएनपी की ग़ैरमौजूदगी में होने वाले चुनाव से स्थिति और बदतर होगी.

इन लोगों ने दोनों राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे आपस में बात करके देश में सर्वमान्य चुनाव का रास्ता खोजें.

1996 के संविधान के मुताबिक़ इस बात की व्यवस्था हो सकती है कि एक सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में निष्पक्ष कार्यवाहक सरकार का गठन हो जो संसद का कार्यकाल पूरा होने के तीन महीने के अंदर चुनाव कराए.

बाक़ी है उम्मीद

हालांकि अवामी लीग का कहना है कि इस प्रावधान को हाईकोर्ट ने 2010 में दिए एक फ़ैसले में निरस्त कर दिया था, इसलिए चुनाव वर्तमान सरकार के अंतरिम प्रशासन में होना चाहिए.

यही वजह है कि सरकार कम से कम सार्वजनिक तौर पर निर्धारित तिथि पर चुनाव कराने को तैयार दिख रही है.

इससे हिंसक घटनाओं के बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. लेकिन परदे के पीछे सरकार चुनाव के कार्यक्रम में फेरबदल कर सकती है या फिर देश में आपातकाल लागू कर सकती है.

अगर सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी और सेना को क़ानून व्यवस्था संभालने का ज़िम्मा मिल गया तो चुनाव अनिश्चित काल तक के लिए टल जाएंगे.

मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों के तहत शेख हसीना अगले चुनाव तक प्रधानमंत्री बनी रहेंगी. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या तब सेना के बड़े अधिकारी उस तरह से शेख हसीना का समर्थन जारी रखेंगे जैसा वे अभी कर रहे हैं.

अगर चुनाव के दौरान व्यापक हिंसा देखने को मिली, या फिर आपातकाल लगाने से हालात पर काबू नहीं पाया गया तो फिर सेना के सत्ता संभालने की मांग बढ़ने लगेगी.

हालांकि ढाका में मौजूद आशावादियों का मानना है कि बांग्लादेश के मित्र भारत और संयुक्त राष्ट्र के दखल के चलते देश में जनवरी में पूर्ण चुनाव संभव होगा. लेकिन इतनी उम्मीद कम ही लोगों में नज़र आती है.

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