'अमरीका के सब्र की परीक्षा ले रहा है अफ़ग़ानिस्तान'

  • 11 दिसंबर 2013
जेम्स डॉबिंस
Image caption अमरीका के ख़ास दूत जेम्स डॉबिंस ने कहा है कि इस दोतरफ़ा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने में जितनी देर हो रही है उससे अफ़गानिस्तान का भारी नुकसान हो रहा है.

अमरीका ने उम्मीद जताई है कि शायद भारत हामिद करज़ई को उस समझौते पर दस्तखत करने के लिए राज़ी कर ले जिसकी बदौलत अमरीकी फ़ौज 2014 के बाद भी अफ़गानिस्तान में मौजूद रह सकेगी.

अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के लिए अमरीका के ख़ास दूत जेम्स डॉबिंस ने कहा है कि इस दोतरफ़ा सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने में जितनी देर हो रही है उससे अफ़गानिस्तान का भारी नुकसान हो रहा है.

अमरीकी कांग्रेस की विदेश मामलों की समिति के सवालों का जवाब देते हुए जेम्स डॉबिंस ने उम्मीद जताई कि संभव है कि साल के अंत से पहले करज़ई इस पर दस्तखत कर दें लेकिन इसमें जितनी देर होगी उससे लोगों की चिंताएं बढ़ेंगी.

दस्तखत करने के लिए प्रोत्साहित

उनका कहना था कि ईरान के अलावा क्षेत्र के सभी देश—भारत, पाकिस्तान, रूस और चीन ने करज़ई को इस समझौते पर दस्तखत करने के लिए प्रोत्साहित किया है.

उनका कहना था, “उनका आगामी भारत दौरा काफ़ी असरदायक हो सकता है क्योंकि वो भारत की इज़्ज़त भी करते हैं और भारत सरकार के साथ उनके काफ़ी अच्छे संबंध हैं.”

डॉबिंस का कहना था ऐसा नहीं है कि इलाके के सभी देश अफ़गानिस्तान में हमेशा के लिए अमरीकी फ़ौज की मौजूदगी के बहुत बड़े समर्थक हों लेकिन वो जानते हैं कि अगर अभी वहां से अंतरराष्ट्रीय सेना हट गई तो वहां गृहयुद्ध की नौबत आ सकती है.

उन्होंने कहा कि ऐसे हालात में फिर से चरमपंथियों का राज हो जाएगा, अफ़गान नागरिक शरणार्थी बनकर पड़ोस के देशों में भागेंगे, व्यापार ठप्प हो जाएगा और इन सबका मिला-जुला असर पूरे क्षेत्र पर होगा.

भारत ने अफ़गानिस्तान के पुनर्निमाण में दो अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया है और अफ़गानिस्तान में अमरीकी फ़ौज की मौजूदगी का समर्थक है.

जिरगा की मंज़ूरी भी

Image caption हामिद करज़ई के समझ़ौते पर हस्ताक्षर नहीं करने के कारण अफ़गानिस्तान और अमरीका के संबंध बिगड़े हैं.

डॉबिंस का कहना है कि अगर अमरीकी फ़ौज पूरी तरह से अफ़गानिस्तान से निकल गई तो क्षेत्र के सभी देश अपने फ़ायदे के हिसाब से फ़ैसला करेंगे और वो बहुत अच्छी स्थिति नहीं रहेगी.

अमरीका और अफ़गानिस्तान के बीच इस समझौते के दस्तावेज़ पर करज़ई तैयार हो चुके थे और फिर इसे अफ़गानिस्तान के महापंचायत या लोया जिरगा की मंज़ूरी भी मिल गई.

लेकिन राष्ट्रपति करज़ई ने अब उसमें दो और नई शर्तें जोड़ दी हैं और कहा है कि अगले अप्रैल में होनेवाले चुनावों से पहले वो इसपर दस्तखत नहीं करेंगे.

करज़ई के फ़ैसले ने अमरीका में काफ़ी नाराज़गी पैदा की है और अमरीकी कांग्रेस का कहना है कि वो अमरीका के “सब्र की परीक्षा” ले रहे हैं.

अमरीकी मीडिया और कांग्रेस में भी आवाज़ें उठ रही हैं कि अमरीका ज़ीरो ऑप्शन यानि 2014 के दिसंबर के बाद एक भी फौजी अफ़गानिस्तान में नहीं रखने पर गंभीरता से सोचना शुरू कर दे.

लेकिन जेम्स डॉबिंस और ओबामा प्रशासन के दूसरे अधिकारियों का भी कहना है कि ऐसा करना आत्मघाती होगा और जो अब तक हासिल हो पाया है सब बर्बाद हो जाएगा.

करज़ई की शर्त

डॉबिंस का कहना था, “अगर अमरीकी फ़ौज पूरी तरह से वापस हो जाती है तो आम अफ़गान नागिरक पर असर तो होगा ही, सबसे ज़्यादा बुरा असर होगा औरतों की ज़िंदगी पर.”

उनका कहना था कि अभी जो अनिश्चितता का माहौल है उस वजह से मकानों की कीमत गिरने लगी है और निवेशक अपना पैसा बाहर खीच रहे हैं.

करज़ई की पहली शर्त है कि अमरीका तालिबान के साथ बातचीत की प्रक्रिया की शुरूआत करा दे और दूसरी शर्त ये कि अमरीकी फ़ौज किसी हाल में अफ़गान नागरिकों के घर में नहीं प्रवेश करेगी.

इस समझौते के तहत अंदाज़ा है कि अमरीका 10 से 15 हज़ार फौज अफ़गानिस्तान में छोड़ देगा जो मुख्य रूप से आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में अफ़गान सुरक्षा बलों की मदद करेंगे.

अमरीकी अधिकारियो का कहना है कि अगर ये समझौता नहीं हुआ तो अमरीकी कांग्रेस से अफ़गानिस्तान के लिए जो मदद की राशि मिलती है उसमें भी रूकावट पैदा हो सकती है.

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