क्या विदेशी पत्रकार चीन से निकाले जाएंगे?

चीन में विदेशी मीडिया
Image caption चीन में मौजूद विदेशी पत्रकारों को हर साल अपने प्रेस कार्ड का नवीनीकरण कराना पड़ता है.

क्या चीन बड़े पैमाने पर अपने यहाँ मौजूद विदेशी पत्रकारों को देश से बाहर निकालने की कोई योजना बना रहा है? सुनने में ये सवाल एकदम ही बेतुका सा लगता है.

खासकर ऐसे वक्त में जब इंटरनेट और दुनिया भर को एक दूसरे से जोड़ने वाली तमाम संचार सुविधाएँ उपलब्ध हैं, क्या ऐसा हो सकता है. और फिर सवाल उठता है कि पहली बार खुल कर बाकी दुनिया के साथ रूबरू हो रहे आत्मविश्वास से लबरेज चीन को ऐसा कदम उठाकर क्या हासिल होगा?

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लेकिन ये एक गंभीर सवाल है. यहाँ मौजूद कई पत्रकार इस बात पर हैरत जता रहे हैं कि क्या सचमुच अमरीका के दो बड़े समाचार संगठनों को चीन में अपनी गतिविधियाँ बंद करने के लिए कहा जाने वाला है.

हर साल इस वक़्त चीन में मौजूद विदेशी पत्रकारों को सबसे पहले तो अपने प्रेस कार्ड को विदेश मंत्रालय से और फिर पुलिस से अपने वीज़ा का नवीनीकरण कराना होता है.

एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए चीन के सरकारी अधिकारियों ने कारोबारी ख़बर देने वाली समाचार एजेंसी ब्लूमबर्ग और अमरीकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के वहाँ मौजूद तकरीबन दो दर्जन पत्रकारों का वीज़ा रोक रखा है. ये पत्रकार चीन में ही रह रहे थे. कारण साफ है, दोनों संगठन चीनी नेताओं से जु़ड़ी खबरें उजागर करते रहे हैं.

दोनों समाचार संगठनों ने चीन के बड़े नेताओं की विशाल संपत्तियों से जुड़ी खबरें विस्तार से की गई खोजबीन के बाद प्रकाशित की. इन नेताओं में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे ताकतवर माने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग जैसी कद्दावर शख्सियतें और उनसे जुड़े लोग थे.

चीन की नापसंदगी

Image caption ब्लूमबर्ग ने शी जिनपिंग के परिवार पर एक पिछले साल एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की थी.

जिस रकम के बारे में हम लोग बात कर रहे हैं, वो बहुत बड़ी हो सकती है, करोड़ों डॉलर और कुछ मामलों में अरबों डॉलर भी हो सकती है. मुठ्ठी भर गिने चुने लोगों के नियंत्रण वाली व्यवस्था में ये सब कुछ सियासी तौर पर रसूखदार एक छोटे से समूह के हाथों हो रहा है. इनके हित एक दूसरे से जुड़े हुए हैं.

लेकिन ये एक विषय है जिस पर चीन में ज़्यादा बातचीत नहीं की जाती है. इसके बदले कम्युनिस्ट पार्टी और उसके नेता खुद को जनता के सेवक के तौर पर पेश करते हैं. सरकार से जुड़े लोगों का रवैया ऐसा रहता है मानो वे निस्वार्थ भाव से व्यापक हित के लिए काम कर रहे हों.

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चीन के अपने समाचार माध्यम भी चीनी राजनीतिज्ञों की इस अकूत जायदाद के बारे में कुछ लिखने में असमर्थ दिखाई देते हैं या शायद ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते. और अब ऐसा लग रहा है कि कम्युनिस्ट पार्टी विदेशी मीडिया की भी जुबान खामोश कर देना चाहती है.

न्यूयॉर्क टाइम्स और ब्लूमबर्ग को चीन की नापसंदगी के संकेत मिल चुके हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने जिन नए संवाददाताओं को चीन लाने की कोशिश की थी, उनका वीज़ा आवेदन साल भर या उससे ज़्यादा अर्से से रोक रखा गया है. महीनों से चीन ने दोनों संगठनों की वेबसाइट ब्लॉक कर रखी है.

इससे ब्लूमबर्ग के कारोबारी हितों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है. लेकिन इसके बावजूद भी दोनों ने अपनी खोजबीन जारी रखी. इसलिए ऐसे आसार हैं कि चीन कोई कड़ा कदम उठा सकता है.

प्रेस कार्ड

न्यूयॉर्क टाइम्स ने साल 2012 के अक्टूबर में खोजबीन के बाद ये दावा किया कि वेन जियाबाओ के बेटे, बेटी, छोटे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदारों के पास 2.7 अरब डॉलर की जायदाद है. चीन ने इस खबर को कीचड़ उछालने वाली हरकत करार दिया.

पिछले महीने वेन जियाबाओ की बेटी और अमरीकी बैंक जेपी मॉर्गन चेज़ के रिश्तों पर एक रिपोर्ट न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित की गई. इसके ठीक बाद चीन के विदेश मंत्रालय ने अपने यहाँ न्यूयॉर्क टाइम्स के सभी पत्रकारों के प्रेस कार्ड के नवीनीकरण की प्रक्रिया रोक दी.

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वैसे पत्रकार जिनके प्रेस कार्ड जारी किए जा चुके थे, उनके पासपोर्ट बिना वीज़ा के वापस कर दिए गए. इन्होंने वीज़ा के लिए पुलिस के पास अपने आवेदन दे रखे थे. अगर ये प्रक्रिया दोबारा नहीं शुरू की गई तो इन पत्रकारों को दिसंबर के आखिर तक चीन छोड़ना पड़ेगा.

ब्लूमबर्ग ने 2012 के जून में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया कि शी जिनपिंग के रिश्तेदारों के कारोबारी हित कई कंपनियों में हैं और इसका मूल्यांकन 376 मिलियन डॉलर या तकरीबन 23 अरब रुपये के करीब किया.

हालांकि इस बात का कोई साक्ष्य नहीं था कि शी जिनपिंग या उनकी पत्नी या बेटी की इन संपत्तियों में कोई हिस्सेदारी थी. पिछले महीने ब्लूमबर्ग के संवाददाताओं ने दो लंबी रिपोर्ट तैयार की जिनमें से एक में चीन के सबसे धनी व्यक्ति और बड़े नेताओं के परिवारों के रिश्तों पर रोशनी डाली गई थी.

भरोसे के काबिल?

दूसरी रिपोर्ट उन समृद्ध चीनी नागरिकों के बेटों-बेटियों के बारे में थी जो चीन में कारोबार कर रहे विदेशी बैंकों के कर्मचारी हैं. रिपोर्ट में इस ओर इशारा किया गया था कि हो सकता है कि इन्हें चीन की सरकार से बड़े कारोबारी फायदों के लिए उपकृत किया गया हो. ब्लूमबर्ग के प्रबंधकों ने इन दोनों रिपोर्टों को तुरंत रोक दिया था.

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ऐसा दावा किया गया कि ब्लूमबर्ग चीन में मौजूद अपने पत्रकारों के वीज़ा सुनिश्चित कराना चाहती थी. उनके पत्रकारों के वीज़ा आवेदन भी रोक लिए गए हैं. मुमकिन है कि चीन अपने यहाँ मौजूद विदेशी पत्रकारों को चेतावनी देना चाहता हो और चुपचाप दोनों कंपनियों को वीज़ा जारी कर दे.

यह भी मुमकिन है कि चीन दुनिया के एक बड़े अख़बार और कारोबारी ख़बरें देने वाली एक समाचार एजेंसी को अपने यहाँ से काम करने की इजाज़त देने से इनकार करने की तैयारी कर रहा हो. अगर सचमुच ऐसा किया जाता है तो वैश्वीकरण और सूचना के इस नए दौर में ये एक असाधारण कदम होगा.

इससे कई गंभीर सवाल पैदा होंगे. क्या चीन अपने यहाँ ऐसे संगठनों को आज़ादी से काम करने की इजाज़त न देकर एक आधुनिक आर्थिक और राजनीतिक ताकत के तौर पर भरोसे के काबिल रहेगा? या फिर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं की अकूत जायदाद को छुपाना ज्यादा अहम है?

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