ढाई करोड़ प्लेटें और ब्रिटेन में बेज़ायका होती करी

  • 14 दिसंबर 2013
ब्रितानी करी अवार्ड्स, प्रधानमंत्री डेविड कैमरन

लंदन में हाल ही में नौंवें करी अवार्ड्स का आयोजन किया गया जिसमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन समेत कई नामी-गिरामी लोग पहुंचे.

हालांकि इस आयोजन का मकसद तो था यहां भारतीय ज़ायके को बेहतरीन ढंग से परोसने वालों का सम्मान करना. लेकिन यहां एक और मुद्दा छाया रहा. दरअसल, ब्रिटेन में करी उद्योग में अच्छे ट्रेन्ड स्टाफ की कमी है और इसकी एक बड़ी वजह है ब्रिटेन की वीज़ा पॉलिसी. ब्रिटेन में भारतीय खाना बेहद लोकप्रिय है.

(रिश्ते सुधारना है, तो करी खाओ)

एक अनुमान के मुताबिक यहाँ के लोग हर हफ़्ते 2.5 करोड़ प्लेट भारतीय व्यंजन खाते हैं. यहां भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी खाने को मोटे तौर पर 'करी' कहा जाता है. करी उद्योग बहुत हद तक भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले लोगों पर निर्भर है जो दक्षिण एशियाई खाना पकाने के तौर-तरीके, मसालों और ज़ायकों से अच्छी तरह से परिचित होते हैं.

2011 में ब्रिटेन की वीज़ा पॉलिसी में किए गए बदलावों के बाद यूरोपीय संघ के बाहर से रसोईये बुलाने के लिए न्यूनतम तन्ख्वाह में बड़ा इजाफ़ा किया गया. इस बढ़े हुए ख़र्च को कई रेस्तराँ मालिक नहीं उठा सके. साथ ही अब ज़रूरी है कि बाहर से आने वाले रसोईये के पास कम से कम पाँच साल का अनुभव हो. अंग्रेज़ी भाषा की जानकारी का स्तर भी बढ़ा दिया गया है.

करी उद्योग की शिकायत है कि कि वीज़ा नियमों में सख़्ती के कारण अब ब्रिटेन या यूरोपीय संघ के बाहर से लोगों को बुलाना बहुत मुश्किल हो रहा है.

लंदन में 'ले राज' रेस्तराँ के मालिक इनाम अली बताते हैं, "इस वक्त सौ से ज्यादा रेस्तराँ बंद हो चुके हैं. कई रेस्तराँ बिक चुके हैं. पहले अगर काबिल शेफ़ नहीं, तो मामूली बावर्ची तो मिल ही जाते थे. लेकिन अब स्टाफ़ की बेहद कमी है."

कारोबार

इनाम अली के मुताबिक दक्षिण एशियाई खाना बनाना सीखने में वक्त लगता है क्योंकि सैकड़ों मसाले हैं और जो लोग दक्षिण एशिया से नहीं हैं, उन्हें सही मसालों और पकाने के सही तरीकों को सीखने में वक्त लगता है.

केंट के तंदूरी पैलेस रेस्तराँ की डायरेक्टर सबरीना भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. वो बताती हैं कि लगभग सभी रेस्तराँ स्टाफ़ की कमी से जूझ रहे हैं और वो ब्रिटेन की इमिग्रेशन पॉलिसी को ही ज़िम्मेदार मानती हैं.

(भारत ब्रिटेन का दोस्ताना)

समस्या की गंभीरता से प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भी वाकिफ़ हैं. करी अवार्ड्स के दौरान उन्होंने कहा, "मुझे पता है कि इमिग्रेशन और अनुभवी शेफ़्स की कमी पर सवाल खड़े होते रहें है. हम इस पर साथ साथ काम करेंगे. हम अनुभवी एशियाई शेफ़्स उपलब्ध कराने में आपकी मदद करते रहेंगे. साथ ही यहां के लोगों को प्रशिक्षित करने में भी मदद करेंगे."

असल में भारतीय ज़ायके का कारोबार इतना बड़ा है कि प्रधानमंत्री भी उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. करी इंडस्ट्री हर साल पांच अरब डॉलर से अधिक का कारोबार करती है. ब्रिटेन में 9,500 करी रेस्तराँ हैं, जिनमें लगभग 80,000 लोग काम करते हैं.

सरकार की सख़्ती

इमिग्रेशन वकील बॉबी कारिया बताते हैं कि पहले सिस्टम का बहुत दुरुपयोग होता था. उनके मुताबिक कई ऐसे मामले सामने आए जिनमें छात्र नकली या फ़र्जी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर ब्रिटेन आते थे, सिर्फ़ पैसा कमाने के मकसद से, न कि पढ़ने के लिए.

('अर्थव्यवस्था सुधार रहे हैं आप्रवासी')

वो बताते हैं कि "माइग्रेंट कामगारों की संख्या इतनी बढ़ गई थी कि ब्रिटेन में आधारभूत सुविधाओं पर असर पड़ रहा था. इससे सिस्टम ख़राब हुआ और सरकार को सख़्ती दिखानी पड़ी. लेकिन इसका सीधा असर पड़ा करी उद्योग पर."

वो बताते हैं कि 2010 में वो ब्रिटेन आकर इस उद्योग में काम करने को इच्छुक लोगों के सालाना करीब तीन हज़ार आवेदन पर काम करते थे. अब वो सिर्फ चार-पांच सौ आवेदन पर ही काम कर सकते हैं.

हालांकि अब ब्रितानी और यूरोपीय लोगों को भारतीय पाक कला सिखाने की कोशिश की जा रही है ताकि किसी तरह ये कमी दूर की जाए लेकिन फ़िलहाल स्टाफ़ कमी के कारण करी उद्योग का ज़ायका ख़राब हो रहा है.

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