सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानवाधिकार हनन: यूएन

  • 12 दिसंबर 2013

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को 'क़ानूनी तौर पर ग़लत' बताते हुए वयस्क समलैंगिकों के बीच सहमति से बनाए गए यौन संबंध को ग़ैर-क़ानूनी करार दिया था.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़ गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई ने इसकी आलोचना करते हुए कहा, ''भारत के सुप्रीम कोर्ट का वयस्क समलैंगिकों के बीच यौन संबंधों को ग़ैर-क़ानूनी करार देना भारत को पीछे की ओर धकेलता है और यह फैसला अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन भी है.''

उन्होंने इस मामले की दोबारा सुनवाई करने की सलाह भी दी.

जिनेवा में पिल्लई ने अपने बयान में कहा, ''निजी और आम सहमति से यौन आचरण को अपराध करार देना निजता का हनन है.''

उन्होंने कहा, ''इस मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट दिया गया फैसला भारत को पीछे की तरफ ले जाने वाला है और मानवाधिकारों के लिए ये फैसला एक बड़ा झटका है.''

'अफ़सोसजनक फैसला'

शीर्ष अदालत ने गुरुवार को धारा 377 को दोबारा वैध करार देते हुए कहा था कि सिर्फ भारत सरकार ही नियमों में बदलाव कर सकती है और चार साल पहले 2009 में दिल्ली हाइकोर्ट ने अपनी शक्तियों का उल्लंघन किया था.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का व्यापक विरोध

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत 'अप्राकृतिक यौन संबंध' गैर कानूनी है. इसमें व्यापक रूप से समलैंगिक संबंधों की व्याख्या की गई है.

पिल्लई ने कहा, ''भारत के सुप्रीम कोर्ट के मानवाधिकारों की रक्षा और उनको बढ़ावा देने का एक लंबा इतिहास रहा है. यह निर्णय इस परंपरा के उलट एक अफ़सोसजनक फैसला है.''

उन्होंने आशा जताई कि अदालत अपने निर्णय की समीक्षा करेगी और जजों के एक बड़े पैनल के सामने इस मामले की फिर से सुनवाई होगी.

उन्होंने कहा, ''इससे जजों को इस बात का पुनर्विचार करने का अवसर मिलेगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में सभी जरूरी तर्कों को परखा गया था.''

ह्यूमन राइट वॉच

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी भारतीय सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बड़ा झटका कहा है.

ह्यूमन राइट्स वॉच ने कहा, ''भारत के सुप्रीम कोर्ट के 11 दिसंबर 2013 द्वारा वयस्क समलैंगिकों की निजी सहमति से यौन आचरण को गैर कानूनी करार देने वाला फैसला लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल और ट्रांसजेडर लोगों के अधिकारों के लिए एक बड़ा झटका है.''

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक भारत सरकार को तुरंत आम सहमति से यौन संबंध बनाने वाले वयस्क समलैंगिकों को अपराधमुक्त करना चाहिए.

ह्यूमन राइट वॉच के एलजीबीटी अधिकार कर्यक्रम के प्रमुख ग्रेमी रीड ने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निजता, समानता और गैर-भेदभाव के मौलिक अधिकारों के लिए तगड़ा झटका है. अब भारत सरकार को इस पर आवश्यक कदम उठाना चाहिए और आम सहमति से यौन संबंध बनाने वाले वयस्क समलैंगिकों को अपराधमुक्त करना चाहिए.''

रीड ने कहा, ''धारा 377 भारत में ब्रिटिश शासन की देन है और अब ये भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में परेशानी का सबब बन रही है. भारत को ब्रिटिश शासन में बने मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाली ऐसी धाराओं को खत्म करना होगा.''

रीड ने कहा, ''भारत को औपनिवेशिक काल काल में बने ऐसे दादागिरी और असमानता को बढ़ावा देने वाले नियमों को खत्म कर आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की श्रेणी में शामिल होना चाहिए.''

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