अमरीका में क्यों डरा हुआ है सैंटा?

साल ख़त्म होने को आया. क्रिसमस क़रीब है. अपने लाल-सफ़ेद लिबास में सैंटा क्लॉज़ एक बार फिर अपनी बूढ़ी पोपली हँसी बिखेरता हुआ अमरीका को खुश करने की कोशिश में जुट गया है.

लेकिन पिछले चार-पांच सालों से अमरीकी सैंटा की ये हँसी पोपली से ज़्यादा खोखली होती जा रही है. संफ़ेद दाढ़ी और मूछों के मुखौटे चिंता की लकीरों को छिपा नहीं पा रहे. हो क्या गया है इस देश को?

आई-पैड, आई-फ़ोन, बार्बी डॉल और सुपरमैन की मांग करने वाले बच्चे तो अभी भी हैं लेकिन न जाने कहां से एक और पौध आ खड़ी हुई है. किसी को अपनी अकेली मां के लिए गर्म कोट चाहिए, कोई बहन अपने चार साल के भाई के लिए जूते मांग रही है--पुराने भी हों तो चलेंगे, एक और कह रहा है मेरे लिए कुछ मत लाना, बस कुछ खाने को ले आना.

इस तरह की लिस्ट तो पहले तीसरी दुनिया से आती थीं. अपने लिए नहीं किसी और के लिए मांगने वाले बच्चे, बच्चे कहां रह जाते हैं --- वो तो बड़े हो जाते हैं. प्रेमचंद के हामिद की तरह -- जो ईदगाह के मेले में दिन भर मुठ्ठी में तीन पैसे दबा कर घूमता रहा, अपने अमीर दोस्तों को मिठाईयां खाते देख ललचाता रहा, खूबसूरत खिलौनों को निहारता रहा और दिन ढलने पर खरीदा तो अपनी बूढ़ी दादी अमीना के लिए लोहे का एक चिमटा. क्यों? क्योंकि तवे से रोटी उतारते वक्त दादी की उंगलियां जल जाती थीं. वो हामिद बच्चा कहां था, वो तो अपनी बुढ़िया दादी से भी बड़ा था.

वजूद की चिंता

अमरीकी सैंटा डरा हुआ है, उसे अपने वजूद के खोने का डर सता रहा है. वैसे भी बच्चे अब बहुत जल्द बड़े हो रहे हैं. उन्हें अब बहुत जल्द पता चल जाता है कि सैंटा कुछ नहीं लाता. क्रिसमस के तोहफ़े चिमनी के रास्ते नहीं अमेज़न डॉट कॉम और डैडी के क्रेडिट कार्ड से आते हैं.

अब तो उन चिठ्ठियों की भी तादाद बढ़ती जा रही है जिसमें बच्चे कहते हैं सैंटा, मेरे डैडी को जल्द से जल्द अफ़गानिस्तान से वापस ले आओ. पिछले क्रिसमस पर भी वो घर नहीं आए, इस क्रिसमस की सुबह मैं उनकी गोद में बैठना चाहता हूं.

अब रूलाएगा क्या पगले? अमरीकी सैंटा तो ये भी नहीं कह सकता.....उसने हिंदी फ़िल्में कहां देखी हैं. वो तो बस कोस रहा है कभी मंदी को तो कभी जंग को.

अच्छा भला चलने लगा था सब कुछ. सैंटा का ब्रांड हर क्रिसमस के साथ और मज़बूत हो रहा था. लाल-सफ़ेद टोपी और लिबास की बिक्री तो हो ही रही थी सेक्सी अंडरवीयर और क्रिसमस पार्टियों पर भी सैंटा का ठप्पा लग रहा था.

उम्मीदों भरी एक सोच को, मासूम सपनों को, कल्पना की उड़ान को जब एक शक्ल दी गई तो वो बना था सैंटा. बर्फीले पहाड़ों से स्लेज पर फ़िसलता हुआ हो-हो करता हुआ सैंटा.

और अमरीका में इस स्क्रिप्ट में तो बस हँसी और खुशी की जगह थी, आंसूओं को कभी-कभार जगह मिल जाती थी. सब कुछ आसान सा था. लेकिन अब उसे डर सता रहा है. उम्मीदों पर खरा न उतरने का डर. मासूमों की ख़्वाहिशों को न पूरा कर पाने का डर. अमरीका में भी अपने इर्ररेलेवेंट हो जाने का डर.

और इसी डर के साथ उसे अभी हर रोज़ शॉपिंग मॉल के बाहर दस से बारह घंटे खड़ा रहना है, तस्वीरें खिंचवानी हैं, खुश दिखना है, हो-हो करके हंसना है.

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