सीरियाः लाचारी में जीने को मजबूर शरणार्थी

  • 19 दिसंबर 2013

सीरिया में संघर्ष की कीमत वहाँ के नागरिकों को चुकानी पड़ रही है. बच्चे, महिलाएं, पुरुष सभी शरणार्थी शिविरों में बुरे हालातों में रहने को मजबूर हैं.

इन लोगों तक कोई राहत सामग्री भी नहीं पहुंच रही है और बर्फीले तूफान ने इसकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.

इन्हीं हालातों का जायजा लिया बीबीसी संवाददाता जिम म्योर ने, लेबनान की बेक्का घाटी में लगे एक शरणार्थी शिविर में.

मजीद को उसकी मां ने इस सप्ताह बुधवार को बर्फीले तूफान के दौरान जन्म कठिन परिस्थितियों में जन्म दिया है.

मजीद की माँ ईमान पूर्वोत्तर सीरिया से आईं एक शरणार्थी हैं, बर्फीले तूफान से होकर अपने बेटे को जन्म देने के लिए अस्पताल पहुँचना पड़ा था.

मजीद को गोद में लिए हुई ईमान दो दिन बाद बताती हैं कि उन्हें क्यों अपना घर छोड़ना पड़ा. फिलहाल वो सीरिया की सीमा के निकट एक अवैध गंदे कैंप में दूसरे परिवारों के साथ रह रही हैं.

बर्फीला तूफान

Image caption बर्फीले तूफान ने सीरियाई शरणार्थियों के जीवन में नई मुश्किलें पैदा कर दी हैं.

उन्होंने कहा, "जमीन से उठता हुआ पानी, सब कुछ अपने आप में समेटते हुए छत को पार कर गया. इसके बाद जीवित रहने के लिए हमें हर चीज़ पड़ोसियों से उधार लेनी पड़ी. हमें ओढ़ने के लिए कंबल भी मांगने पड़े क्योंकि ये भी पूरी तरह पानी से तरबतर हो चुके थे.''

ईमान के पति ज़कारिया कहते हैं, ''सिर्फ पड़ोसियों की उदारता के कारण ही मैं मजीद के जन्म के लिए अस्पताल को दी जाने वाली बारह हजार रुपये फीस जुटा सका.''

वो कहते हैं, ''मेरे पास बिल्कुल भी पैसे नहीं है. हमारे पास न तो रोटी और चीनी है और न ही जलाने के लिए लकड़ी. हमें अपने बच्चों को मरते हुए देखना पड़ रहा है और इसके अलावा हम कुछ नहीं सकते.''

सीरियाई शरणार्थियों पर सर्दी का सितम

वो कहते हैं, ''जब मजीद थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो वो इन परिस्थितियों के थोड़ा अनुकूल हो जाएगा जिनमें उसने जन्म लिया है और जिन हालातों में वो बड़ा होगा.''

यहाँ परिवार मौसम से बचने के लिए प्लास्टिक से बनी तारों के चादर की फ्रेम से बने कामचलाऊ घरों में रह रहे हैं.

वे फर्श पर सस्ते स्पंज गद्दों पर कृत्रिम फ़ाइबर से बनी रजाइयों को ओढ़कर सोते हैं.

सर्दी के मौसम में ठण्ड की पहली लहर में जब बाहर तापमान नीचे चला जाता है तो ये लोग स्टोव जलाते हैं जिसमें ईधन के रूप में सब कुछ जैसे प्लास्टिक के डिब्बे, पुराने जूते, और दूसरे रासायनिक पदार्थ जलता है, जिस वजह से इनकी झोपड़ियां विषाक्त धुंए से भर जाती हैं.

राहत के निशान भी नहीं

प्लास्टिक की चादर बरसात के पानी और बर्फ से बचाव करती है. हर चीज में नमी होती है और जमीन से भी सीलन आती रहती है. यहाँ न तो टंकियों में पानी है और न ही स्वच्छता की कोई व्यवस्था. शौंचालय भी बाहर बहुत दूरी पर है.

बर्फीली हवा और जमीन पर बर्फ के बीच, कई बच्चे गर्मियों के मौसम के कपड़े पहने हुए झोंपड़ियों के बीच इधर से उधर दौड़ते हैं. अपने नंगे पैरों में ये बच्चे प्लास्टिक के सैंडल पहने हुए हैं.

ऐसा लगता है कि बेक्का घाटी और लेबनान के दूसरे कई हिस्सों की तरह ही, बेरुत-दमिश्क हाइवे के पास स्थित इस तात्कालिक बस्ती को भी सहायता समूहों द्वारा नजरअंदाज किया गया है.

बड़े अंतरराष्ट्रीय राहत संगठनों में से भी किसी की कोई मदद के कोई निशान यहां नहीं है.

लगभग एक साल पहले रक्का से यहाँ आए मोहम्मद कहते हैं, ''एक चैरिटेबल संगठन द्वारा इन झोंपड़ियों को बनाने के लिए हमें कुछ लकड़ी और प्लास्टिक चादर दी गई थी.''

बड़े सरकारी शिविर नहीं

ये एक तथ्य है कि कुछ शरणार्थी समूहों की अनदेखी की गई और ऐसा लेबनान की सरकार द्वारा जॉर्डन, तुर्की और इराक की तरह बड़े सरकारी शिविरों के निर्माण की अनुमति न देने के कारण हुआ. बड़े सरकारी शिविरों के निर्माण से आंशिक रूप से सहायता सामग्री का वितरण बहुत आसान हो जाता.

सहायता के लिए लेबनान किसी भी तरह का कोई मार्ग अपनाने का इच्छुक नहीं है, क्योंकि लेबनान की स्थापना के 65 साल बाद भी फिलिस्तीनी कैंप अभी तक यहां है जो कि लेबनान की राजनीति के लिए बड़े पैमाने पर एक संवेदनशील मुद्दा है.

सीरिया में उम्मीद से ज़्यादा जैविक हमलेः संयुक्त राष्ट्र

बेक्का घाटी के उत्तर में स्थित शात गांव में भी सड़क किनारे लगे कैंप में भी अब तक कोई सहायता नहीं पहुंची है.

पुराने गद्दे, कम्बलों, लकड़ी और प्लास्टिक चादरों से भरा हुआ लेबनानी सेना के एक ट्रक द्वारा मुख्य सड़क पर सहायता सामग्री का वितरण शुरु किया गया.

दान सामग्री

Image caption सीरियाई शरणार्थियों ने पड़ोसी देशों में शरण ले रखी है.

ये दान सामग्री संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों की तरफ़ से उन्हें दी गई थी. स्थानीय नगर पालिका के साथ एक समन्वित ऑपरेशन में ये राहत सामग्री लोगों तक पहुंचाई गई. ये पहली बार था जब सेना ने इस तरह के किसी काम में हिस्सा लिया.

यूएनएचसीआर यानी संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार शाखा की लीजा अबू खालिद ने कहा, ''सही मायनों में तो ये आपातकाल की स्थिति है. तूफ़ान में कई संसाधनों को जुटाए जाने की जरूरत थी और सेना के लिए इन जगहों तक राहत सामग्री ले जाना आसान है. इसलिए सामाजिक मामलों के मंत्री के साथ संयोजन कर सेना का जाना निश्चित किया गया.''

यूएनएचसीआर के अधिकारियों ने स्वीकार किया कि वे और संयुक्त राष्ट्र की अन्य एजेंसियों को अपने वितरण कार्य में कटौती करनी पड़ी है.

इसका कारण यह है जून में लेबनान की मदद के लिए की गई आखिरी अंतरराष्ट्रीय संयुक्त अपील में सिर्फ पचास प्रतिशत लगभग 1.7 बिलियन डॉलर ही इकट्ठा हो सके.

अगले साल जनवरी से जून तक की अवधि को कवर करने के लिए (राहत सामग्री पहुंताने के लिए), सोमवार को मदद की एक और अपील को शुरू किया जाना है .

इस अपील से उन दानदाताओं को अपने वादों को अच्छे से पूरा करने का एक और अवसर मिलेगा, जिनकी दान देने की इच्छा अधूरी रह गई थी.

इस समय किसी अन्य की तुलना में सीरिया के अधिकतर छोटे और नाजुक पड़ोसी देशों जैसे तुर्की, जॉर्डन और इराक पर इसका बोझ पड़ रहा है.

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