कुवैतः तेल के कुओं पर रेत के तूफ़ान का ख़तरा

  • 26 दिसंबर 2013
रेगिस्तान में रेत का तूफान

खाड़ी के मुल्कों में तेज़ उड़ती हुई रेत और मिट्टी एक बेहद संगीन मसला है. इसकी वजह से विमानों की उड़ान से लेकर तेल उद्योग तक में दिक्कतें पैदा होती हैं. ये समस्या अब और गंभीर बनती जा रही है. खासतौर पर कुवैत में. लेकिन सवाल उठता है कि वहां इससे निपटने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं.

रेगिस्तान के इलाक़ो में कभी-कभी तो हवा की रफ्तार 150 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच जाती है और इसका असर ये होता है कि गर्मी के मौसम में इलाके में मौजूद तेल और गैस के संयंत्रों की कई दफ़ा बड़े वैक्यूम क्लीनर से सफ़ाई करवाया जाना निहायत जरूरी हो जाता है.

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जानकारों का मानना है कि रेगिस्तान में कैंपों की भरमार और पड़ोसी मुल्क इराक़ में कृषि की ज़मीन छोड़कर लोगों के चले जाने की वजह से इन रेत के तूफानों की तादाद और उनकी तेज़ी में इजाफा हुआ है.

कुवैत ऑयल कंपनी के उमर सादिक कहते हैं, "जब यहां रेत जमा हो जाती है तो रास्ते साफ करने पड़ते हैं और इसकी वजह से हमें बहुत नुकसान बर्दाश्त करना पड़ रहा है. हमें छोटे ठेकेदारों को काम में लगाना होता है, मशीन लानी होती है, सबको पैसे देने होते हैं ताकि इन तमाम चीज़ों को साफ़ कराया जा सके."

कभी नहीं रुकता

सादिक ने बताया, "इन कुओं में से कई को बंद करना पड़ता है. यहां तेल और पानी के कई कुएं हैं और ऑपरेशन जारी रखने के लिए इन कुओं को साफ करवाना ज़रूरी होता है. इन संयंत्रों में चौबीस घंटे काम जारी रहता है. चौबीस घंटे सातों दिन. ये कभी नहीं रुकता. ये ऐसा ही है जैसे लहरों का मुकाबला किया जाए. पानी की लहरों का नहीं बल्कि रेत की लहरों का."

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साल 2011 में इसी तरह के रेत के भयंकर तूफान की वजह से कुछ इमारतों और होटलों को भी खाली करवाना पड़ा था. इनकी वजह से कई बार तो एयरपोर्ट भी बंद करने पड़ते हैं. उड़ाने तो खैर रद्द होती ही रहती हैं. चूंकि बंदरगाह भी इनके असर से अछूते नहीं रह पाते हैं तो इससे कच्चे तेल की आवाजाही पर असर पड़ता है.

मौसम विशेषज्ञ लैला मुसावी कहती हैं, "यहां साफ दिन तो कभी-कभी ही देखने में आता है. मेरा मतलब है, आज के दिन को साफ होना था लेकिन आप समुद्री पट्टी की दूसरी तरफ भी नहीं देख सकते हैं. पूरे साल हालात ऐसे ही रहते हैं. एक वक्त था जब इस तरह के हालात कुछ मौसम में पैदा हुआ करते थे, जैसे बसंत में चंद दिन, गर्मियों में एक दो दिन और सर्दियों में तो तूफान आते ही नहीं थे."

वो आगे कहती हैं, "लेकिन अब यही हाल साल भर रहता है, इससे लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है. जब भी तूफान आता है सांस की बीमारियों की शिकायत बढ़ जाती है और जब तूफान तेज़ होता है तो लोग घरों से निकल भी नहीं पाते."

तूफान का फायदा?

तो इस मसले से निपटने के लिए क्या किया जा रहा है?

कुवैत शहर से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर छोटे पौधे लगाये गए हैं जिन पर रिसर्च किया जा रहा है. यहां 10 साल पहले दूर-दूर तक फैली एक शिकारगाह थी लेकिन उसे ख़त्म कर दिया गया. बाद में इस बात का एहसास हुआ कि इससे शहर में रेत और मिट्टी के तूफान रूक जाते थे लेकिन अब वैज्ञानिकों ने यहां पौधे लगाए हैं.

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इन पौधों को ज्य़ादा पानी की जरूरत नहीं होती है. अली एक वैज्ञानिक हैं और वो इस अध्ययन दल के प्रमुख हैं. लेकिन उन्हें अपने प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने में खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि पौधों को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम की दरकार है.

अली कहते हैं, "एक पौधे पर साढ़े तीन हजार डॉलर का खर्च होगा. ताकि वो तीन बरस तक मौजूद रह सके. उसके बाद वो अपने बल बूते पर बढ़ सकेगा. इसमें शुरू में तो खर्चा है लेकिन इससे रेत को रोक पाने में मदद मिलेगी. दूसरी तरफ इस बात की भी जांच की जा रही है कि क्या रेत के तूफान से भी किसी किस्म का फायदा उठाया जा सकता है."

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