क्या गुलामों को आज़ाद करा पाया है ब्राजील ?

आधुनिक समय की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए ब्राजील ने अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक काम किया है. पिछले 30 सालों में 45 हज़ार से अधिक लोगों को गुलामी से मुक्त करवाया गया है.

हालांकि ब्राजील में गुलामी की परिभाषा थोड़ी अलग है और सभी इससे सहमत भी नहीं है. काम करने की परिस्थित खराब होना भी गुलामी के तहत आता है, भले ही इसमें किसी तरह की कोई जोर-जबर्दस्ती शामिल नहीं हो.

स्थिति की वास्तविकता को जानने के लिए एक बार बीबीसी की टीम ने श्रम मंत्रालय के निरीक्षकों के साथ उत्तरी-पूर्वी परैबा राज्य की पहाड़ियों का दौरा किया. दरअसल, यह ब्राजील की एंटी स्लेवरी मोबाइल यूनिट थी और वह गुलामों के बारे जानकारी मिलने के बाद जांच करने पहुंची थी.

हथियारों से लैस जांच टीम सेरा ब्रैंका शहर के बाहर रूकी और एक स्थानीय व्यक्ति के मार्गदर्शन में पहाड़ियों की चढ़ाई कर ग्रेनाइट की खदान तक पहुंची.

यहां की स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी क्योंकि ऐसी छापामारी हिंसक हो सकती है. पांच मिनट में पुलिस ने श्रम निरीक्षक को आगे बढ़ने की अनुमति दे दी और वह मजदूरों के रहने के लिए प्लास्टिक के बने आश्रय स्थलों तक पहुंचे.

गुलाम शब्द का इतिहास

ब्राजील में गुलाम शब्द का इतिहास ही कुछ अलग है. दरअसल दशकों पहले अफ्रीका से लाखों की संख्या में दास यहां लाए गए थे. उनकी संख्या उत्तरी अमरीका के किसी अन्य देश में लाए गए गुलामों से अधिक थी. अमरीकी महाद्वीप में ब्राजील गुलामी को खत्म करने वाल अंतिम देश था.

मौके पर पहुंची ''एंटी स्लेवरी'' टीम ने पाया कि गुलाम लोग खुरदुरे और पुराने कपड़े के साथ छिद्रदार बूट पहने हुए हैं. इन लोगों के पास अपनी रक्षा के लिए कोई अन्य चीज नहीं थी.

इनके लिए शौचालय और स्वच्छ जल की सुविधा भी नहीं थी. इनमें से कोई भी पंजीकृत कर्मचारी नहीं था.

इसी तरह की एक दूसरी छापेमारी के दौरान भी ऐसी ही कहानी सामने आई. यहां पर प्लास्टिक के बैग में विस्फोटकों को एक खूंटी के लटकाया गया था. यहां पर निरीक्षकों को यह तय करना था कि काम की ऐसी स्थिति को क्या गुलामी कानून के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं.

ब्राजील के कानून के मुताबिक गुलामी की परिभाषा में दबाव और जबर्दस्ती शामिल नहीं है. खराब या अमानवीय परिस्थित का होना नियोक्ता के खिलाफ कार्रवाई के लिए पर्याप्त है.

परिभाषा का समर्थन

ब्राजील की कैथोलिक चैरिटी के लिए काम करने वाले एक फ्रेंच डोमिनिकन रोमन कैथोलिक पादरी जेवियर प्लासट गुलामी की इस परिभाषा का समर्थन करते हैं.

उन्होंने कहा कि किसी को अपने अधीन करने के लिए ये ज़रूरी नहीं कि आप उसे स्वतंत्रता से ही वंचित कर दें. आप अन्य तरीकों से भी उसे अपने अधीन कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि हो सकता है कि उसके पास भागने के रास्ते न हों तो आप उसे जंगल में किसी खेत में अकेले छोड़ दें, क्योंकि वह आपका कैदी है.

इस तरह किसी कार्यस्थल पर जीवन के लिए जरूरी न्यूनतम ज़रूरतें जैसे पानी, भोजन, रहने की व्यवस्था आदि न हो तो यह श्रम अधिकारों की धज्जियां उड़ाना है.

यह चैरिटी मुख्यरूप से अमैज़न इलाके में काम करता है. यहां के बड़े-बड़े खेतों में गुलामों के होने की आशंका ज्यादा रहती है.

श्रम क़ानून

अमैज़न क्षेत्र के एक खेती-बाड़ी वाले शहर एकैलैंडिया के स्थानीय सेंटर फॉर डिफेंस ऑफ लाइफ एंड ह्यूमन राइट्स के पास हर माह कम से कम गुलामी की तीन शिकायतें आती हैं.

इस सेंटर के सामाजिक कार्यकर्ता ब्रिगिडा रोचा ने कहा कि अधिकतर मामले श्रम कानूनों में अनियमितता से जुड़े होते हैं. लेकिन इस साल अक्टूबर तक 13 ऐसे मामले सामने आए, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि वे गुलामी से जुड़े हो सकते हैं.

एंटी-स्लेवरी मोबाइट यूनिट ने एक व्यक्ति को मुक्त करवाया, जिसके बारे में कहा गया कि उन्हें पानी तक नहीं दिया जा रहा था. वे पानी पीने और नहाने के लिए नदी पर निर्भर थे.

लेकिन, वह जिस रैंच पर काम करता था वह पहले की तुलना में बेहतर था. उन्होंने कहा, ''हमें भूखे रहना पड़ता था. कभी-कभी मालिक भुगतान करना नहीं चाहता था. मैंने हिंसा देखी है. मैंने बिना सोए रातें गुजारी है. इस भय में कि कोई घटना न घट जाए.''

मालिक सहमत नहीं

लेकिन, स्थानीय मालिक ये नहीं मानते की काम की खराब स्थित से गुलामी पैदा होती है.

एकैलांडिया में एक फार्म के मालिक जेल्टन एल्वीस डी ओलिवेरा ने कहा कि यहां पर गुलाम मजदूर नहीं हैं.

कुछ खेतों पर अमानवीय व्यवहार की बात सामने आ सकती है लेकिन यह गुलामी नहीं है.

उनका कहा, ''गुलामी तब होती है जब उन्हें कुछ करने के लिए मजबूर किया जाए. हमारे मजदूर पूरी तरह से आजाद हैं, वे यहां अपनी मर्जी से आ और जा सकते हैं.''

और कड़ा कानून

ऐसी संभावना देखी जा रही है कि आगे इस कानून को और कड़ा किया जाएगा. ब्रासिलिया में नेशनल कांग्रेस इस बारे में चर्चा करने वाली है.

सत्ताधारी पार्टी के क्लाउडी पुटी का कहना है, ''जब हम खराब स्थिति के बारे में बात करते हैं तो हम इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी में कारखानों में काम की स्थिति के बारे में बात कर रहे होते हैं जिसके कारण मौतें होती थीं. ये पूरी तरह से अस्वीकार्य है.'' उनका कहना है कि उत्पीड़न कई तरीके से किया जाता है.

उन्होंने कहा कि एक बार वह एक खेत पर गए जहां के मजदूरों को न्यूतम मजदूरी देने की बात कही गई थी लेकिन तीन माह में उन्हें केवल 10 रियाल (करीब 4.25 अमरीकी डॉलर) दिया गया.

वे वहां से नहीं जा सकते क्योंकि उनके पास जीने का कोई दूसरा साधन नहीं है. यह एक उत्पीड़न है.

इस तरह इस मामले में निरीक्षकों ने मजदूरों से बात की. एक मजदूर डामिआओ ओलिवेरो अकेले हैं और लेकिन वह अपनी बहन की सहायता करते हैं.

गुलामी के खिलाफ छापेमारी को लेकर उनकी प्रतिक्रिया मिलीजुली है. उनका कहना है कि ये अच्छी बात है कि यहां इस्पेक्टर आ रहे हैं, लेकिन उन्हें पैसे कमाने की जरूरत है.

उनका कहना है, ''नहीं... हमें समय पर पैसा मिल जाता है, हम काम की पाली तय कर सकते हैं और अगर हमें एडवांस में पैसे की जरूरत है तो हम मालिक से मांग लेते हैं.''

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