जब ताजिकिस्तान के गांव में पहुंचे थे आमिर ख़ान

  • 30 दिसंबर 2013
Image caption आमिर खान की फ़िल्म मंगल पांडे के कुछ हिस्से की शूटिंग ताजिकिस्तान के एक गांव में हुई थी.

मध्य एशिया के सबसे ग़रीब देश ताजिकिस्तान में दूरदराज के एक गांव में कुछ साल पहले हुई एक अनोखी घटना ने वहां के लोगों में उत्साह भर दिया था, जिसकी यादें अब भी उनके ज़ेहन में ताज़ा हैं.

वर्ष 2004 में बॉलीवुड स्टार आमिर ख़ान ने अपनी फ़िल्म 'द राइजिंग' (मंगल पांडे) के एक हिस्से की शूटिंग अफ़गानिस्तान सीमा के पास ताजिकिस्तान में की थी.

उस क्षेत्र के लिए यह एक बहुत बड़ी घटना थी जहां रोजगार का सारा दारोमदार कृषि पर ही निर्भर है.

इस फ़िल्म में दर्जनों स्थानीय घुड़सवारों को एक्स्ट्रा के रूप में काम दिया गया.

इस बात को एक दशक होने को हैं, मैं सोचता हूं कि अब वे कैसे होंगे? बॉलीवुड के साथ इस संक्षिप्त परिचय ने उस समुदाय पर क्या असर डाला होगा?

मेरे सामने पहली चुनौती थी इस जगह को ढूंढ निकालना.

ताज़िक गांव अयाची

Image caption ताजिकिस्तान में कृषि ही रोज़गार का मुख्य साधन है.

ताज़िक राजधानी दुशांबे से करीब एक घंटे की दूरी पर बसे आयाची गांव से मेरे बीबीसी सहकर्मियों ने इस शूटिंग की रिपोर्ट भेजी थी.

लेकिन यह बात वर्ष 2006 के पहले की बात थी, जब ताजिकिस्तान के निरंकुश नेता इमोमाली राख़मोनोव ने अपने नाम से स्लोवाकियाई –ओव- शब्द हटा दिया था और मध्य एशियाई लगने वाला राख़मोन नाम रख लिया था.

उस समय बड़े पैमाने पर शहर और कस्बों में यह चलन निकल पड़ा था. हो सकता है कि अयाची में भी ऐसा ही हुआ हो.

काफ़ी खोजबीन और भटकने के बाद दुशांबे के दक्षिण में एक पहाड़ी के किनारे अयाची गांव आखिर हमें मिल ही गया.

सड़क किनारे एक व्यक्ति मिला. उसे फ़िल्म की शूटिंग के बारे में याद था. लेकिन उसने बताया कि ज़्यादातर नौजवान ताजिक घुड़सवार रोज़गार की तलाश में रूस चले गए थे.

जब हमने पूछा कि कोई बचा रह गया है? उसने सिर खुजलाते हुए बताया कि दो घुड़सवार, एक नौजवान और 90 वर्ष के बुज़ुर्ग, अभी भी गांव में हैं.

पुरुषों ने गांव छोड़ा

Image caption अधिकतर ताजिक नौजवान नौकरी की खोज में रूस चले जाते हैं.

हम उनसे मिलने की उम्मीद में घाटी के पार उस पुराने गांव में पहुंचे जहां शूटिंग हुई थी.

लेकिन वहां हमें कोई निशान नहीं मिला यहां तक कि कोई पुरुष भी नहीं था.

एक महिला मिली जो कुछ गायों के साथ प्लास्टिक के चार खाली बर्तन घोड़ागाड़ी से ले जा रही थी.

कई सप्ताह पहले गांव की जलापूर्ति बंद हो गई थी और सबसे नज़दीकी पानी का स्रोत करीब 3 किलोमीटर दूर था.

महिला से बातचीत में पता चला कि गांव के सभी पुरुष एक अंत्येष्टि में गए हुए हैं. हमने वहां जाने का निश्चय किया.

वहां हमें सफ़ेद टोपी पहने कुछ किशोर लड़के, कुछ शर्मीली लड़कियां और घर के मालिक मौजूद थे.

पारंपरिक मध्य एशियाई भोज

Image caption अंतिम संस्कार में भी जो भोज दिया जाता है उसमें पारंपरिक मध्य एशियाई पकवान शामिल होते हैं

हाल ही में उनकी बेटी का निधन हो गया था. उन्होंने वो बहुत नरमी से लेकिन ज़ोर देकर हमें अंत्येष्टि का भोजन साझा करने को कहा.

ख़ास मध्य एशियाई पकवानों की तरह इस खास भोजन में नान रोटी, अंगूर, कलाकंद, चावल, मांस और सब्जियां थीं.

हालांकि उस शूटिंग के एक्सट्रा में से वो नहीं थे लेकिन उन्हें और उनकी बहन को वो घटना पूरी तरह याद थी.

क्या वो चाहते हैं कि गांव में फ़िल्म की शूटिंग फिर हो?

मेज़बानों ने कहा, ''क्यों नहीं, उन्होंने हर एक को 50 सोमोनी (करीब 600 रुपए) दिए थे. केवल घोड़े पर बैठने के लिए इतना धन कौन देगा.''

उन्होंने फ़िल्म पूरी होने के बाद उसे देखा था. उन्हें फ़िल्म में कोई स्थानीय व्यक्ति नहीं दिखा लेकिन वो जानते थे कि 90 वर्षीय वह व्यक्ति कहां है.

इतनी जानकारी हासिल करने के बाद हमने उन्हें अलविदा कहा और पहाड़ी की ओर चल पड़े.

और अचानक ही हमें वो मिल गया जिसकी तलाश में हम आए थे. वो घर के बाहर एक चारपाई पर बुद्ध की तरह बैठे हुए थे. उनके पास ही चाय का बर्तन था और पेड़ में लटका दवाओं से भरा बैग.

पहले तो झिझक के साथ लेकिन जल्द ही गर्मजोशी से उन्होंने अपनी दास्तां सुनाई.

उनका नाम कूकीपाल्वोन था और वह असल में 93 वर्ष के थे.

एक दिन के छह हज़ार

Image caption बॉलीवुड के लिए एक्ट्रा का काम कर चुके कूकीपाल्वोन 93 वर्ष की उम्र में भी फिट दिखते हैं.

ताजिकिस्तान लौटकर आग बुझाने का काम अपनाने से पहले उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत सेना के लिए लेनिनग्राद और यूक्रेन में लड़ाइयां लड़ी थीं.

इन सब में उनकी दो अंगुलियां चली गईं लेकिन उनकी प्रसिद्धि पहलवान के रूप में रही थी.

वो गर्व से बताते हैं, ''इन वर्षों में पहलवानी ने ही मुझे तंदुरुस्त रखने में मदद की और यही कारण है कि आस पास के लोग मुझे जानते हैं.''

बॉलीवुड शूटिंग के समय की कौन सी बात उन्हें याद है? जवाब में वो वो कहते हैं कि धन.

उन्होंने बताया, ''स्थानीय प्रशासन ने शूटिंग में हिस्सा लेने के लिए लोगों पर दबाव दिया था. लेकिन मुझे नहीं. वो मुझे 100 सोमोनी यानी करीब 6000 रुपए प्रतिदिन की दिहाड़ी देते थे.''

उस शूटिंग की यादें धुंधली पड़ गई थीं और बहुत कुछ स्पष्ट नहीं था.

हम चलने को हुए और कुछ तस्वीरें लेने की बारी आई तो तपाक से उन्होंने अपनी सबसे सहेज कर रखी गई काली टोपी निकाल ली.

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