चीनः हिरासत में ले धर्मगुरू को 'राजनीतिक पाठ'

शेशान बासिलिक, बड़ा गिरजाघर, शंघाई, चीन

शंघाई के बाहरी इलाके में बेहद हरे-भरे और ख़ूबसूरत क्षेत्र में शेशान सेमिनरी (पादरियों की शिक्षा संस्था) है. कैदियों के लिहाज़ से यह काफ़ी अच्छी जगह लगती है.

यहां कांटेदार तार नहीं हैं और न ही पहरेदार हैं. बस मुख्य गेट पर एक दोस्त सरीखा चौकीदार है.

लेकिन फिर भी, हमारी तफ़्तीश के अनुसार यही चीन के लापता बिशप, थाडियस मा दाकिन, को रोके रखने वाला कैदखाना है.

बिशप मा के दोस्तों ने मुझे बताया कि उन्हें कुछ आज़ादी भी हासिल है.

उन्हें सेमिनरी से बाहर आने-जाने की इजाज़त मिल सकती है लेकिन वह शंघाई क्षेत्र को नहीं छोड़ सकते.

इसके साथ ही उन्हें अपना इंटरनेट ब्लॉग भी अपडेट करने की अनुमति है. हालांकि इसमें ज़्यादातर पोस्ट सामान्य ही होती हैं, जैसे कि बाइबल से लिए गए प्रसंग.

इस्तीफ़ा और हिरासत

भले ही उन्हें बिस्तर से बांधा न गया हो लेकिन उनका जबरन "आश्रयस्थल" अभी बना हुआ है. करीब 18 महीने बाद भी अधिकारी उनसे संतुष्ट नहीं हुए हैं.

हमें पता चला कि बिशप मा को राजनीतिक पाठ या दूसरे शब्दों में साम्यवाद को दिमाग में भरने की कोशिश, के लिए हफ़्ते में तीन बार भेजा जाता है.

पिछले साल जुलाई में बिशप मा ने एक बहुत अनूठा काम कियाः उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी के कैथोलिक चर्च को नियंत्रित करने के अधिकार को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी.

शंघाई के कैथोलिक गिरजाघर में, पार्टी अधिकारियों समेत भक्तों की बड़ी भीड़ के सामने, अपने दीक्षा संबोधन में उन्होंने कैथोलिक पेट्रियोटिक एसोसिएशन (सीपीए) से अपने इस्तीफ़े की घोषणा कर दी.

सीपीए 1957 से ही, सरकार के ढांचे के तहत, चीन में चर्चों का संचालन कर रहा है ताकि ये सत्ता का समानांतर केंद्र न बन जाएं.

हो सकता है कि किसी बाहरी व्यक्ति को बिशप मा की घोषणा ललकारने वाली न लगे.

उन्होंने कहा कि वह अपनी सारी ऊर्जा एक बिशप के काम में लगाना चाहते थे, इसलिए उनके लिए एक अफ़सरशाह के दोहरी भूमिका निभाना "सुविधाजनक" नहीं था.

लेकिन चीनी अधिकारियों की नज़र में यह स्वतंत्रता का एक असाधारण बयान था और इसलिए उन्होंने तत्काल पादरी के ख़िलाफ़ कदम उठाए.

कथित रूप से उन्हें सीधे शेशान ले जाया गया और उसके बाद से उन्हें सार्वजनिक रूप से नहीं देखा गया है.

इसके बाद की गई घोषणा की गई कि उनकी बिशप की पदवी छीन ली गई है. रोम ने इसका तीखा विरोध किया.

अघोषित समझौता

सेमिनरी के ऊपर पहाड़ी पर लाल पत्थरों वाला शेशान बासिलिक (विशेष अधिकार वाला गिरजाघर) है.

अपनी सुंदर घंटी वाली मीनार वाला बासिलिक 1935 में तैयार हुआ था और तबसे यह कैथोलिक चर्च और चीनी सरकार के संबंधों में कई तरह के बदलाव देख चुका है.

सबसे ख़राब वक़्त चेयरमैन माओ की सांस्कृतिक क्रांति के दौरान का था जब इसे लूट लिया गया और मूर्तियां, रंगीन गिलास वाली खिड़कियों को तोड़ दिया गया.

लेकिन वक्त के साथ बासिलिका पुनर्स्थापित हो गया और कुछ हद तक रोम और बीजिंग के बीच संबंध भी.

आधिकारिक कूटनीतिक संबंधों और लगातार जारी अविश्वास के बावजूद एक तरह सामंजस्य स्थापित हो गया था.

पूरे नब्बे और दो हज़ार के दशक के दौरान कैथोलिक पेट्रियोटिक एसोसिएशन के चुने गए बिशपों को वेटिकन ने भी स्वीकार कर लिया.

लेकिन हालिया सालों में यह अनकहा समझौता ख़त्म होने लगा और चीन ने ऐसे बिशपों को चुना जिन्हें रोम का समर्थन प्राप्त नहीं था.

कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है अब संबंध जितने ख़राब हैं उतने कई दशकों से नहीं रहे और शेशान सेमिनरी इस विवाद के केंद्र में है.

अपने दीक्षा भाषण से पहले तक बिशप थाडियस मा दाकिन उन बिशपों में से थे जिन्हें दोनों पक्ष स्वीकार करते थे लेकिन अब वह लगातार चौड़ी होती खाई के एक प्रतीक बन गए हैं.

दरख़्वास्त को भी रास्ता नहीं

चीन में कैथोलिक इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि पोप फ़्रांसिस क्या रणनीति अपनाते हैं.

चर्च में ऐसे बहुत से लोग लोगों जो चाहेंगे कि अनाधिकारिक या भूमिगत चीनी कैथोलिकों के पक्ष में खुलकर बोला जाए जिन्होंने सीपीए के बजाय रोम के प्रति निष्ठा दिखाई और उसके बदले कष्ट सहने का ख़तरा उठाया.

अन्य कहेंगे कि वार्ता ही आगे बढ़ने का एकमात्र ज़रिया है. इसका मतलब यह हुआ कि सीपीए से बात और सौदेबाज़ी की जाए.

लेकिन क्योंकि चीन राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से, दस वर्ष पहले के मुकाबले, ज़्यादा मजबूत है, पार्टी सौदेबाज़ी न करना चाहे.

उसके पास नियंत्रण है, जो वह चाहती है. और चाहे यह अजीब लगे लेकिन यह नास्तिक सरकार चर्च को चलाने, बिशपों की नियुक्ति और बर्ख़ास्तगी को अपने हाथ में रखने को पहले से भी ज़्यादा प्रतिबद्ध लगती है.

सेमिनरी में हमने पूछा कि क्या हम बिशप मा से बात कर सकते हैं.

इस पर हमें जवाब मिला, "आपकी दरख़्वास्त को आगे भेज भी नहीं जाएगा."

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