कहाँ पहुँचेगा मुशर्रफ़ का मुक़दमा?

परवेज़ मुशर्रफ़

पाकिस्तान के पूर्व सैनिक शासक परवेज़ मुशर्रफ़ पर चल रहा देशद्रोह का मुक़दमा एक के बाद एक विवाद पैदा करता जा रहा है.

पहली बार मुशर्रफ़ ने यह कहकर विवाद पैदा कर दिया था कि उन पर मुक़दमा चलाने से पाकिस्तान की सेना में असंतोष पैदा होगा. हालांकि सेना ने अभी तक उनके बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

मुशर्रफ़ ने यह भी दावा किया है कि सेना उनके साथ है. लेकिन इस दावे के समर्थन में उनके पास कोई सबूत नहीं है.

राजधानी इस्लामाबाद के बाहरी इलाक़े में स्थित उनके आवास के बाहर दो बार विस्फोटक बरामद कर उन्हें नष्ट किया गया.

इसी आवास में उन्हें अभी हाल तक नज़रबंद रखा गया था. उनके विरोधियों, यहाँ तक कुछ स्वतंत्र पर्ववेक्षकों का भी मानना है कि यह ख़ुफ़िया एजेंसियों का काम है.

जान को ख़तरा

उन्हें लगता है कि इस तरह मुशर्रफ़ की जान को ख़तरा बताकर उन्हें अदालत में पेश होने से बचाया जा रहा है और उनकी विदेश यात्रा को आसान बनाया जा रहा है, जिससे मुक़दमे की कार्यवाही बाधित हो.

हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दो जनवरी को जब उन्हें देशद्रोह के मामले में पेश करने के लिए पहली बार अदालत जाया जा रहा था तो दिल की बीमारी की वजह से उन्हें सेना के एक अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा.

उनके आलोचक यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वह वास्तव में बीमार थे.

उन्हें लगता है कि यह उस नाटक का एक हिस्सा था, जो उन्हें इलाज़ के नाम पर विदेश भेजने के लिए खेला जा रहा है. यह उन्हें विशेष अदालत की कार्यवाही से बचाने का प्रयास था.

लंबे समय तक देश के सेना प्रमुख रहे ज़नरल अशफ़ाक परवेज़ कियानी से 29 नवंबर 2013 को कार्यभार ग्रहण करने वाले ज़नरल राहील शरीफ़ के नेतृत्व में सेना इस पूरे मामले पर नज़र रखे हुए है.

सेना सात महीने पुरानी नवाज़ शरीफ़ सरकार को परेशान नहीं करना चाहती है.

नवाज़ शरीफ़ का बदला

तीन नवंबर 2007 को 1973 के संविधान को पलट कर आपातकाल लागू करने के लिए नवाज़ शरीफ़ सरकार मुशर्रफ पर देशद्रोह का मुक़दमा चला रही है. इसके लिए तीन सदस्यीय अदालत बनाई गई है.

वहीं मुशर्रफ़ इस मुक़दमे को बदले की कार्रवाई बता रहे हैं. उन्हें लगता है कि नवाज़ शरीफ़ बदला ले रहे हैं, क्योंकि 12 अक्तूबर 1999 को उन्होंने उनकी सरकार का सैन्य तख्तापलट कर उन्हें जेल भेज दिया था.

एक सैनिक होने की वजह से वह चाहते हैं कि उनका मुक़दमा सैन्य अदालत में चले. उनके वकीलों की टीम, जिसमें विदेशी भी शामिल हैं ने केवल उनके लिए ही अदालत गठित करने पर आपत्ति जताई है.

वहीं नवाज़ शरीफ़ और उनके समर्थकों का कहना है कि मुशर्रफ़ के भाग्य का फ़ैसला अदालत करेगी.

सबसे बड़ा सबूत

शरीफ़ ने अभी हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से मुशर्रफ़ के आपातकाल लागू करने के लिए 2007 में जो अस्थायी संवैधानिक आदेश जारी किया था, वही उनके ख़िलाफ़ सबसे बड़ा सबूत है.

मार्च 2013 में चार साल के स्वनिर्वासन के बाद पाकिस्तान लौटे मुशर्रफ़ को उनके कार्यकाल के कई मामलों में आरोप लगाकर उन्हें ग़िरफ्तार कर घर में नज़रबंद कर दिया गया था.

इनमें शामिल था, पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो, बलूच नेता नवाब अक़बर बुगती और इस्लामाबाद की लाल मस्जिद के इमाम अब्दुर रशीद ग़ाज़ी की हत्या और तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस इफ़्तिख़ार मोहम्मद चौधरी और अन्य जजों को नज़रबंद करना.

बाद में उन पर देशद्रोह का भी आरोप लगाया गया.

यह पहली बार हो रहा था कि पाकिस्तान की ताक़तवर सेना के पूर्व प्रमुख और देश का राष्ट्रपति रह चुके किसी व्यक्ति पर संविधान पलटने के आरोप में मुक़दमा चलाया जा रहा था.

उतार-चढ़ाव

उनका मुक़दमा अभी शुरू ही हुआ है. लेकिन इस मामले में अभी तक कई उतार-चढ़ाव आ चुके हैं.

विशेष अदालत के मुख्य न्यायाधीश फ़ैसल अरब के आदेश के बाद भी वह एक जनवरी 2014 को अदालत में पेश नहीं हो सके.

अदालत की ओर से ग़िरफ़्तारी वारंट जारी करने की चेतावनी के बाद भी वह ख़ुद अदालत में पेश नहीं हो पाए और रास्ते में ही बीमार हो गए, उन्हें अस्पताल में दाखिल कराना पड़ा.

किसी को यह नहीं पता है कि आगे क्या होगा. लेकिन बहुत से पाकिस्तानियों का मानना है कि मुशर्रफ़ को देशद्रोह के आरोप में सज़ा-ए-मौत देना काफ़ी मुश्किल होगा.

यह भी कहा जा रहा है कि मुशर्रफ़ ने यह स्वीकार कर लिया है कि देश के बिगड़ते सुरक्षा हालात की वजह से नवंबर 2007 में आपातकाल लगाना उनकी ग़लती थी.

लेकिन कई पाकिस्तानी अभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि दोषी पाए जाने के बाद भी मुशर्रफ़ को सज़ा होगी, क्योंकि अतीत में किसी भी पूर्व सैन्य शासक को सज़ा नहीं हुई है.

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