बांग्लादेश: मतदान के दौरान हिंसा, 12 की मौत

  • 5 जनवरी 2014
बांग्लादेश चुनाव

बांग्लादेश में आम चुनाव के लिए हो रहे मतदान के दौरान ढाका शहर में छिटपुट हिंसा हुई है. रविवार को अलग-अलग हिंसा की वारदात में कम से कम 12 लोगों की मौत हो चुकी है.

बांग्लादेश में आम चुनाव के लिए मतदान के दौरान आज सुबह ढाका के बीचोंबीच जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के पास एक धमाका भी हुआ. हालांकि इसी तरह के कुछ धमाकों की ख़बरें शहर के दूसरे इलाक़ों से मिली हैं.

पुलिस का कहना है कि यह धमाका कॉकटेल बम यानी देसी बम से किया गया. पुलिस के मुताबिक़ ये धमाके डराने के मक़सद से किए जा रहे हैं.

इन वारदात के बाद ढाका में सुरक्षा और कड़ी कर दी गई है. विपक्षी दलों ने आम चुनावों का बहिष्कार किया है, जिसकी वजह से इनकी वैधता पर सवाल खड़े हो गए हैं.

ढाका शहर का दौरा करने के बाद अभी तक 15 फ़ीसदी से ज़्यादा मतदान की ख़बर है.

ढाका में मतदान के लिए तमाम अपीलों और तैयारियों के बावजूद सड़कें एकदम सूनी हैं और मतदान केंद्रों पर भी लोगों की तादाद न के बराबर ही देखी गई है.

धमकी

मध्य ढाका में स्थित एक मतदान केंद्र के अधिकारी फ़ारुख़ हुसैन को नौ अज्ञात लोगों ने आकर इसलिए धमकाया कि वो मतदान का प्रतिशत बढ़ाएं. उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और सुरक्षा बलों ने उन लोगों को वहां से खदेड़ दिया.

लेकिन उसके बाद उनके मोबाइल फ़ोन पर उन्हें धमकी देने वाले तीन फोन आए. फ़ारुख़ इसके बाद से काफी डरे हुए हैं.

ढाका में यातायात पूरी तरह ठप है और सड़कों पर रिक्शे और ऑटो के अलावा वाहन नदारद हैं. हिंसा से निपटने के लिए पूरे देश में क़रीब साढ़े तीन लाख पुलिसकर्मियों को लगाया गया है.

सिर्फ़ 30% मतदान की आशंका

चुनाव पंडितों का कहना है कि उत्साह कम देखते हुए पूरे बांग्लादेश में अगर 30% भी मतदान हो सका, तो यह बड़ी बात होगी.

चुनाव से पहले क़रीब सौ मतदान केंद्रों पर आगज़नी की गई थी और हिंसक घटनाओं में कई लोग मारे गए थे.

ढाका में हर आधा किलोमीटर के बाद नाके लगाए गए हैं और पहचान पत्र के साथ ही सड़कों पर लोगों को निकलने की इजाज़त दी गई है.

इससे पहले बहिष्कार का आह्वान करने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेता शमशेर चौधरी ने कहा था कि उनकी पार्टी हिंसा नहीं चाहती और सिर्फ़ शांतिपूर्ण ढंग से चुनावों के बहिष्कार का ऐलान किया गया है. उनका कहना था कि जनता ने ही इन चुनावों का बायकॉट कर दिया है.

विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि अवामी लीग सरकार को इस्तीफ़ा देकर कार्यवाहक सरकार की निगरानी में चुनाव कराने चाहिए थे मगर सत्तारूढ़ अवामी लीग, विपक्ष की मांग को यह कहकर ख़ारिज़ कर चुकी है कि चुनाव एक संवैधानिक ज़रूरत है और पांच जनवरी को ही कराए जाएंगे.

विपक्ष की ग़ैर मौजूदगी के चलते चुनावों की वैधता पर सवाल खड़े हुए हैं और माना जा रहा है कि अवामी लीग पार्टी भारी बहुमत से चुनाव जीत सकती है और उन्हें कुल 300 सीटों में कम से कम 154 सीटों पर बिना किसी चुनौती के जीत मिल सकती है.

अमरीका और यूरोपीय यूनियन ने चुनाव-प्रक्रिया की निगरानी के लिए अपने पर्यवेक्षक बांग्लादेश नहीं भेजे हैं.

कार्यवाहक सरकार का पेंच

बांग्लादेश में आम चुनाव अक्सर कार्यवाहक सरकारों की निगरानी में होते आए हैं. हालांकि यह मुद्दा हमेशा विवादों में घिरा रहा है.

साल 1996 में मौजूदा सत्ताधारी पार्टी अवामी लीग ने चुनावों का बहिष्कार किया था जबकि साल 2007 में मौजूदा विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी नेता ख़ालिदा जिया ने भी इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की थी.

इस बार फिर यह मुद्दा गर्माया. पूर्व प्रधानमंत्री और बीएनपी प्रमुख ख़ालिदा ज़िया का कहना है कि इस तरह की सरकार के तहत होने वाले चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे.

शेख़ हसीना बनाम ख़ालिदा ज़िया

हाल के वर्षों में बांग्लादेश में राजनीति के दो ही ध्रुव रहे हैं- प्रधानमंत्री शेख़ हसीना और बीएनपी नेता ख़ालिदा ज़िया. दोनों के दरम्यान राजनीतिक शत्रुता रही है.

गुजरे वर्षों में देश में एक तीसरी राजनीतिक पार्टी भी उभरी है जिसका नाम जातीय पार्टी है जिसकी कमान पूर्व राष्ट्रपति हुसैन मोहम्मद इरशाद के हाथों में है. जातीय पार्टी भी इन चुनावों का बहिष्कार कर रही है.

मुख्य मुद्दे

बांग्लादेश में राजनीतिक स्थायित्व एक प्रमुख मुद्दा रहा है जहां चुनावी परिदृश्य में हड़ताल और हिंसा आम बात है.

बेरोज़गारी, ग़रीबी, भ्रष्टाचार, खाने-पीने की चीजों के बढ़ते दाम, औद्योगिक दुर्घटनाएं और मानव अधिकारों का हनन अन्य प्रमुख मुद्दे हैं.

बीते साल 24 अप्रैल ढ़ाका के निकट आठ मंज़िला कपड़ा फैक्टरी में आग लगने की वजह से एक हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे. बांग्लादेश कपड़ा बनाने वाले दुनिया के बड़े देशों में से एक रहा है लेकिन औद्योगिक सुरक्षा मापदंडों में नाक़ाम रहा है.

सुरक्षा और कपड़ा फैक्टरी में काम करने वाले मज़दूरों का मेहनताना भी इस चुनाव के प्रमुख मुद्दों में शामिल है.

देश की प्रमुख इस्लामी पार्टी जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया गया है. चुनाव में इस प्रतिबंध का असर भी देखने को मिल सकता है.

पार्टी के वरिष्ठ नेता अब्दुल कादिर मुल्ला को बीते साल 13 दिसंबर को फांसी दी गई थी. उन्हें वर्ष 1971 में युद्ध-अपराधों का दोषी पाया गया था.

अब्दुल कादिर को फांसी दिए जाने पर देश के लोगों की राय अलग-अलग थी जिसके नतीजे में पूरे देश में हिंसक झड़पें हुई थीं.

बांग्लादेश में साल 2008 के संसदीय चुनावों में पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 8.1 करोड़ से अधिक थी और तब 70 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ था.

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