पाकिस्तान: अपनी जान गवां कर स्कूल को बचाया उसने

  • 9 जनवरी 2014

पाकिस्तान के शहर हंगू में एक आत्मघाती हमलावर को रोकने की कोशिश में मारे गए नौवीं कक्षा के छात्र एतज़ाज़ हसन को श्रद्धांजलि देने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

पाकिस्तान के सोशल मीडिया पर उनका दर्जा एक हीरो की तरह हो गया है और उन्हें असाधारण बहादुरी के लिए देश के सबसे बड़े सैन्य सम्मान 'निशान-ए-हैदर' दिए जाने की मांग जोर पकड़ रही है.

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि किसी नागरिक को सैन्य सम्मान दिया जा सकता है या नहीं.

एतज़ाज़ हसन के परिवार ने सरकार से मांग की है कि वह एतज़ाज़ को सम्मानित करे.

एतज़ाज़ हसन के चचेरे भाई मुदस्सर बंगश एडवोकेट ने बीबीसी को बताया कि सोमवार की सुबह एतज़ाज़ स्कूल जा रहे थे, तभी रास्ते में स्कूल की वर्दी पहने हुए एक युवक ने उनसे सरकारी हाई स्कूल का पता पूछा.

मुदस्सर बंगश के अनुसार, ''एतज़ाज़ शायद यह भांप लिया था कि कार में यह कोई आत्मघाती हमलावर है, उसके दोस्तों ने उसे इस आत्मघाती हमलावर से ना उलझने की चेतावनी दी. लेकिन उसने उन्हें कहा कि आप पीछे हट जाएं और मैं इसे नियंत्रित करने की कोशिश करता हूँ, वरना यह स्कूल के अंदर जाकर तबाही मचा देगा.''

ख़ुद बन गए निशाना

सड़क पर जब 15 वर्षीय एतज़ाज़ हमलावर को रोकने जा रहा था, उस समय स्कूल में असेंबली चल रही थी, जिसमें एक हजार के करीब बच्चे मौजूद थे.

मुदस्सर बंगश के अनुसार, ''हमलावर का मकसद स्कूल में तबाही मचाना था, लेकिन एतज़ाज़ ने उसे रोक लिया और ख़ु्द हमलावार का निशाना बन गए.''

एतज़ाज़ हसन के पिता अबू धाबी में मज़दूरी करते हैं और उनका एतज़ाज़ के अलावा एक बेटा और दो बेटियां हैं.

मुदस्सर बंगश का कहना है कि एतज़ाज़ के पिता लोगों से कह रहे हैं कि उन्हें कोई संवेदना के लिए नहीं बल्कि 'शहादत' के बधाई देने आए.

एतज़ाज़ हसन के पिता का कहना था कि वह अपनी मां को रुला कर सैकड़ों माताओं रोने से बचा गया.

मुदस्सर बंगश का कहना है, ''अगर जनता उत्साह दिखाए और एतज़ाज़ जैसे उत्साह का प्रदर्शन करे, तभी कुछ हो सकेगा, मर्दों की तरह पड़े रहेंगे तो कुछ नहीं होगा.''

एडवोकेट मुदस्सर बनगश के अनुसार, परिवार और क्षेत्र के लोगों की मांग है कि हाई स्कूल का नाम एतज़ाज़ हसन बंगश के नाम से जोड़ा जाए और उसे बहादुरी से सम्मानित किया लेकिन लेकिन सरकार की ओर से एक बयान भी सामने नहीं आया.

वे कहते हैं, ''अगर हम अपने हीरो को सम्मानित नहीं करेंगे तो हमारी पीढ़ी को संदेश कैसे जाएगा कि एक नायक कैसा होता है? शहादत क्या होती है, आज के बच्चे और युवा कैसे शहीदों को जानेंगे, हमें इनकी पहचान करानी है.''

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