इसरायली 'बुलडोज़र' फ़लस्तीनी 'कसाई' अरियल शेरॉन नहीं रहे

इसरायली के लोग अपने पूर्व प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन को उनकी नीतियों के कारण 'बुलडोज़र' कहते थे और फ़लस्तीनी लोग 'द बुचर' या 'कसाई'.

शेरॉन का शनिवार को निधन हो गया है. वे 85 वर्ष के थे. जनवरी 2006 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद से ही वे कोमा में थे. जिस समय उन्हें दिल का दौरा पड़ा उस समय वो अपने राजनीतिक जीवन के शीर्ष पर थे.

इसराइल के 'बुलडोज़र' अरियल शेरॉन नहीं रहे

अपनी शर्तों पर

शेरॉन के बारे में कहा जाता था कि वो ‘मोटी चमड़ी’ के आदमी हैं उन्होंने कभी इस बात की ज़रा भी परवाह नहीं दिखाई कि अरब हो या फिर इसराइली उन्हें किसी की पसंद या नापंसद की फ़िक्र है.

इसराइली सेना और राजनीति में उच्च पदों पर रहे राजनेता का सिर्फ़ एक ही मक़सद रहा - अपनी शर्तों पर इसराइल को पूरी सुरक्षा मुहैया कराना.

साल 1990 की शुरुआत में उन्होंने आवास मंत्री की हैसियत से पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी में बड़े पैमाने पर यहूदी बस्तियाँ बसाने की मुहिम सफलतापूर्वक चलाई. पूरी दुनिया के विरोध के बावजूद फ़लस्तीनी इलाकों में यहूदी बस्तियां बसाने के फ़ैसले से वो ज़रा भी नहीं डिगे.

बस्तियां बसाते वक्त उनका बयान था ''अरब जनसंख्या के हर केंद्र के इर्द गिर्द यहूदियों को रहना चाहिए. यहूदियों को ऐसी कोई जगह नहीं छोड़नी चाहिए जहाँ वे रह न सकें और स्वतंत्र न हों.''

जब वक़्त बदला तो शेरॉन ने इन्हीं बस्तियों को हटवाया, उन्होंने इसराइली सैनिकों को अधिकार दिए कि जो लोग वहाँ से हटने को तैयार नहीं हों उन्हें जबरन हटा दिया जाए.

शेरॉन ने कहा ''यह बहुत ही दुखदायी प्रक्रिया है लेकिन इसराइल के लिए ज़रूरी है.''

गज़ा पट्टी से वापसी की शेरॉन की योजना को लेकर उनकी लिकुद पार्टी में भारी असंतोष पैदा हो गया और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि शेरॉन को पार्टी से ही अलग होना पड़ा.

अरियल शेरॉन ने अपने सहयोगियों को साथ लेकर अपनी अलग पार्टी, कदिमा, का गठन किया.

अरियल शेरॉन अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी जैसे विशेषणों के साथ पुकारे जाते थे.

लेकिन राजनैतिक विरोध के बावजूद गज़ा पट्टी से यहूदी बस्तियों को हटाने के फ़ैसला करके उन्होंने राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया.

सेना में नौकरी

अरियल शेरॉन का जन्म फ़लस्तीन में 1928 में हुआ था. उस वक़्त फ़लस्तीन पर ब्रिटेन का अधिकार था.

जवानी में वह यहूदियों के भूमिगत सैनिक संगठन हगानाह में शामिल हो गए. यहूदी देश इसराइल बनने के बाद उन्होंने 1948-49 में अरब-इसराइल युद्ध में हिस्सा लिया.

1950 में उन्होंने ग़ज़ा पट्टी में तैनात मिस्र की सेना के ख़िलाफ़ कई सैनिक अभियानों में हिस्सा लिया.

शेरॉन हर मोर्चे पार सामने से नेतृत्व करते थे. जब उनके सैनिक मोर्चों पर लड़ रहे होते तो शेरॉन बरास्ते गोलों के बीच अपनी गाड़ी मे शराब और क़ाविय कर उनके बीच मे घूमते फिरते.

अरियल शेरॉन ने सेना में ब्रिगेडियर जनरल तक का रास्ता आसानी से तय किया.

1967 में छह दिन तक चले युद्ध में उन्होंने इसराइली सेना के एक डिवीज़न की अगुवाई की.

इस युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरूशलम, पश्चिमी तट और ग़ज़ा पट्टी पर कब्ज़ा किया था.

उस वक़्त उन्होंने इसराइली कब्ज़े को बनाए रखने के लिए जो तरीक़े इस्तेमाल किए उनसे फ़लस्तीनी लोगों को ये लगने लगा कि अरियल शेरॉन उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं.

अरियल शेरॉन 1973 में पहली बार संसद के लिए चुने गए और 1977 में पहली बार मंत्री बनाए गए. 1982 में लेबनान पर हुए इसराइली हमले के पीछे उन्हीं का दिमाग था.

इस हमले में बेरूत में इसराइली नियंत्रण वाले दो शरणार्थी शिविरों में सैंकड़ों फ़लस्तीनियों की हत्या कर दी गई थी.

इस हमले की जांच करने वाले एक ट्राइब्यूनल ने 1983 में अरियल शेरॉन को रक्षा मंत्री के पद से हटा दिया.

इस ट्राइब्यूनल ने पाया कि हत्याओं के लिए अरियल शेरॉन परोक्ष रुप से ज़िम्मेदार थे.

हर मोर्चे पर आगे

कई राजनेताओं पर इस तरह के आरोप साबित होने का मतलब होता है उनके राजनीतिक जीवन की समाप्ति.

लेकिन अरियल शेरॉन दक्षिणपंथी गुट में लोकप्रिय बने रहे.

अरियल शेरॉन ने अपने सहयोगियों को साथ लेकर अपनी अलग पार्टी, कदिमा, का गठन किया. कई इसराइलियों के लिए वे एक हीरो थे.

इसराइल के इतिहास में उन्होंने पहले एक जनरल और फिर राजनेता होने के नाते अहम भूमिका निभाई लेकिन हमेशा एक विवादास्पद व्यक्ति रहे.

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