बच्चों को इच्छामृत्यु का हक़ मिले?

बेल्जियम ने साल 2002 में वयस्कों के लिए इच्छामृत्यु को वैध करार दिया था. अब सीनेट ने इस क़ानून के दायरे में बच्चों को भी लाने का फ़ैसला किया है, जिनकी बीमारी ठीक नहीं हो सकती और जो बहुत ज़्यादा शारीरिक दर्द का शिकार हैं.

इसके समर्थकों का विश्वास है कि यह एक तार्किक क़दम है जबकि विरोधियों की नज़र में यह पागलपन होगा.

लाइलाज बीमारी से पीड़ित एक बच्चा, मौत की मांग और मौत का इंजेक्शन. ऐसी स्थिति बहुत से लोगों के लिए कल्पना से भी परे, एक दुस्वप्न की तरह है.

हममें से बहुतों को शायद ऐसी सच्चाई का सामना न करना पड़े जिसमें किसी ख़तरनाक बीमारी की वजह से बच्चे की सेहत लगातार गिर रही हो. लेकिन बेल्जियम के कुछ बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को अपना जीवन ख़त्म करने की इजाज़त मिलनी चाहिए, अगर उन्हें उनकी शारीरिक परेशानी से निजात नहीं दिलाई जा सकती.

ब्रसेल्स के यूज़ेड अस्पताल में बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर गर्लांट वॉन बर्लाएर कहते हैं, "यह बहुत दुर्लभ है- मगर यह होता है- ऐसे बच्चों का हम इलाज करते हैं, लेकिन हम उन्हें ठीक करने के लिए कुछ नहीं कर सकते. ऐसे बच्चों को अपने जीवन का अंत करने का फ़ैसला लेने का हक़ मिलना चाहिए."

बर्लाएर और बेल्जियम के 16 और बालरोग विशेषज्ञों ने पिछले साल नवंबर में एक खुले पत्र पर दस्तख़त किए थे जिसे बाल इच्छामृत्यु विधेयक पर मुहर लगाने के लिए सीनेटरों को भेजा गया है.

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हम भगवान नहीं हैं

वॉन बर्लाएर का तर्क है, "हम भगवान नहीं हैं, लेकिन ये ज़िंदगियां वैसे भी ख़त्म होनी ही हैं. क़ुदरती अंत दर्दनाक होगा या बहुत भयानक होगा और शायद उन्होंने अलग-अलग जगहों या अस्पतालों में अपने दोस्तों को उसी बीमारी से मरते देखा हो.

और अगर वे कहते हैं, ‘मैं इस तरह नहीं मरना चाहता, मैं अपने ढंग से मरना चाहता हूं,’ और यह अकेली चीज़ है जो हम डॉक्टर उनके लिए कर सकते हैं. मुझे लगता है कि हमें यह करने योग्य होना चाहिए."

पिछले महीने सीनेट में 17 के मुक़ाबले 50 वोटों से पारित हुए विधेयक के ड्राफ़्ट में, बच्चों को यह समझना ज़रूरी होगा कि इच्छामृत्यु क्या है और उनके माता-पिता और मेडिकल टीमों को बच्चे की मौत की इच्छा का अनुमोदन करना ज़रूरी होगा.

बेल्जियम के उत्तर में पड़ोसी देश नीदरलैंड्स में 12 साल से ज़्यादा के बच्चों के लिए इच्छामृत्यु वैध है. शर्त यह है कि इसके लिए उनके माता-पिता की इजाज़त होनी चाहिए. लेकिन अगर संसद के निचले सदन में बेल्जियम का विधेयक पारित हो जाता है तो बेल्जियम दुनिया का पहला देश हो जाएगा, जहां इच्छामृत्यु के लिए उम्र की कोई बाध्यता नहीं होगी.

सीनेट में सोशलिस्ट ग्रुप के नेता और विधेयक को पेश करने वाले फ़िलिप माहो ने इसे ‘मानवता के लिए आख़िरी भाव’ की संज्ञा दी है.

वह कहते हैं, "ख़राब बात यह है कि बच्चे बीमारी से मरेंगे. ग़लत बात यह है कि उन्हें उस स्थिति में दर्द से बचाने की कोशिश न की जाए."

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अभी जारी है बहस

इस विधेयक के ख़िलाफ़ वोट देने वाली एक सीनेटर क्रिस्टियन डैमोक्रेट एल्स वान हूफ़ को लगता है कि यह ख़ुदमुख़्तारी के अनुपयुक्त विचार से प्रेरित हैं कि हर किसी को अपने जीने और मरने के बारे में फ़ैसला लेने का हक़ है. वह इससे असहमत हैं और दूसरे सीनेटरों के साथ इसके ख़िलाफ़ कामयाबी के साथ लड़ रही हैं. वह इस विधेयक के दायरे में उन बच्चों को लाने के ख़िलाफ़ हैं जो ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिनका कोई इलाज नहीं और वे असहनीय दर्द से परेशान हैं.

वह कहती हैं, "शुरुआत में उन्होंने एक ऐसा क़ानून पेश किया जिसमें मंदबुद्धि बच्चे शामिल थे. बहस के दौरान इच्छामृत्यु के समर्थकों ने ऐसे बच्चों की बात की, जो जीवन के प्रति निराश हैं या जो ज़िंदगी से तंग आ गए हैं, लेकिन यह मांग किस सीमा तक जाएगी."

वयस्कों के लिए इच्छामृत्यु के मामले में उन्हें डर है कि दुरुपयोग के सबूत पहले ही मिल रहा है. वर्ष 2002 के इच्छामृत्यु क़ानून में वयस्कों को अपनी मौत चुनने का हक़ दिया जा चुका है, अगर वे इस बारे में समझदार और जागरूक हैं, बार-बार दरख़्वास्त देते हैं या फिर ऐसी शारीरिक या मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं जिसका कोई इलाज नहीं है.

मगर इच्छामृत्यु के दो मामले जो 2013 में बेल्जियम और दुनियाभर में सुर्ख़ियां बने, उन्होंने वान हूफ़ को बेहद परेशानी में डाल दिया है.

जनवरी में 45 साल के दो ऐसे जुड़वां लोगों की मौत की ख़बर आई जो बहरे थे. मार्क और एडी वर्बेसेम ने इच्छामृत्यु की मांग की थी जब उन्हें पता चला कि वे आनुवांशिक गड़बड़ी के चलते अंधे हो जाएंगे- उन्हें डर था कि वे स्वतंत्र तौर पर रहने लायक नहीं रह पाएंगे.

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मानसिक तकलीफ़

महिला से पुरुष बने नैथन वरहेल्स्ट की मौत की ख़बर इसके नौ महीने बाद आई. उसने सेक्स में बदलाव के कई नाकाम ऑपरेशनों के बाद इच्छामृत्यु की मांग की थी.

एल्स वान हूफ़ को एक वकील ने समझाया था कि शायद जुड़वां लोगों का अंत वही लाइलाज बीमारी होती, जिसका उन्हें डर था, लेकिन नैथन वरहेल्स्ट केस को लेकर वे आज भी चिंतित रहती हैं.

यह कैंसर विशेषज्ञ और ब्रसेल्स यूनिवर्सिटी वीयूबी में प्रोफ़ेसर डॉक्टर विम डिस्टेलमांस ही थे, जिन्होंने तीनों के लिए इच्छामृत्यु का अनुमोदन किया था. इसका आधार उनकी मानसिक तकलीफ़ थी.

वह यूथेनेसिया कमीशन यानी इच्छामृत्यु आयोग में डॉक्टरों, वकीलों और क़ानून बनाने में रुचि रखने वाले लोगों के पैनल के सदस्य हैं. इसके बारे में आलोचकों का कहना है कि उन्होंने अभी तक बेल्जियम में हुईं उन 6945 पंजीकृत इच्छा मृत्युओं की जांच नहीं की है जो 2002 से 2012 के बीच अंजाम दी गईं. सभी मामलों को क़ानून के तहत लागू किया गया.

20 अप्रैल 2012 में कैमिस्ट्री के लेक्चरर टॉम मॉर्टियर ब्रसेल्स के एक अस्पताल में कॉल करने को कहा गया. उनकी मां की मृत्यु हो गई थी. गोदेलिएवा दि ट्रॉयेर 64 साल की थीं और तनाव का शिकार थीं. उन्होंने अपने बेटे को अपनी मौत से तीन महीने पहले एक ईमेल भेजा था और बताया था कि उन्होंने इच्छामृत्यु की मांग की है मगर उन्हें नहीं लगता था कि डॉक्टर इसकी इजाज़त देंगे.

वह नाराज़ हैं. उन्हें यह तर्क मंज़ूर नहीं कि उनकी मां को ‘मरने का हक़’ था.

वह कहते हैं, "मेरे ख़्याल से यह क़ानून मरीज़ों के लिए नहीं है. यह क़ानून डॉक्टरों के लिए है जिन्हें कभी सज़ा नहीं मिलेगी...इच्छामृत्यु देना अनैतिक है. यह अपने मरीज़ों की हत्या है, और अब वे इसे प्रेम के परम रूप के बतौर प्रोत्साहित कर रहे हैं. यहां बेल्जियम में हमें क्या हो गया है? मैं इसे समझ नहीं पा रहा हूं.. "

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"यह पागलपन है"

सीनेट में बच्चों और इच्छामृत्यु के सवाल पर उनकी प्रतिक्रिया है- "यह पागलपन है."

ल्यूवेन के यूनिवर्सिटी अस्पताल में बच्चों का उपचार करने वाले कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर मार्लीन रेनार्ड का यक़ीन है कि बच्चों के लिए इच्छामृत्यु पर क़ानून बनाने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि एक मरते हुए बच्चे की मुश्किलें कम करने के तरीक़े पहले से मौजूद हैं.

वे कहती हैं, "अगर हम दर्द से नहीं निपट सकते, तो हम बच्चों को बेहोशी की दवा दे सकते हैं. और अगर हमें लगता है कि स्थिति सचमुच अमानवीय है, तो हम एथिक्स कमेटी में जा सकते हैं और उनका जीवन ख़त्म करने की इजाज़त मांग सकते हैं. मगर यह करने के लिए हमारे पास बहुत से लोगों की सहमति होनी चाहिए."

रेनार्ड के लिए आलोचना का बिंदु यह है कि उनके अनुभव में ऐसा कोई मामला नहीं आया जिसमें बच्चों ने मौत देने की मांग की हो.

उन्होंने कहा, "मैंने दर्द से तड़पते और ऐसी बीमारी वाले बहुत से नौजवानों-किशोरों को देखा है. उन्हें हमेशा अगले दिन की उम्मीद होती है. मैंने किसी को नहीं देखा जिसने कहा हो, 'मैं अब और नहीं जी सकता, कृपा कर इसे रोक दें.' वे मरना नहीं चाहते. वे जीना चाहते हैं. "

मगर डॉक्टर गर्लैंट वान बर्लाएर का विचार है कि बच्चे इसलिए मरने की मांग नहीं करते क्योंकि यह अभी वैधानिक नहीं है.

वह कहते हैं, "जब भी किसी अस्पताल में कोई बच्चा मरता है, दूसरे बच्चे आपस में इस बारे में बात करेंगे. अक्सर एक बच्चा सीधे आपसे इस बारे में बात नहीं करेगा मगर दूसरे बच्चे कहेंगे, 'हम इस बारे में बात कर रहे हैं और हममें से कुछ सोचते हैं कि हमें दूसरे तरह से अपनी ज़िंदगी का अंत करना चाहिए, उस तरह जैसे हमने अपने दोस्तों को मरते देखा है.' एक बार अगर क़ानून बदलता है, तो वो सीधे हमसे पूछ पाएंगे."

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क्या बच्चे परिपक्व हैं ?

तो क्या बच्चे सचमुच इतने परिपक्व हैं कि वे अपने जीवन का अंत करने के बारे में फ़ैसला ले सकते हैं? वान बर्लाएर मानते हैं कि वयस्कों के बीच वक़्त बिता रहे लाइलाज बीमारी से पीड़ित बच्चों का अनुभव उन्हें अक्सर अपनी उम्र से ज़्यादा परिपक्व बना देता है.

ल्यूवेन के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के बच्चों के ऑन्कोलॉजी वार्ड में वॉलंटियर फ़िके वान डेन ऊवर इस बात से सहमत हैं कि जब बच्चे बेहद बीमार होते हैं तो वे परिपक्व हो जाते हैं. उनका बेटा लॉरेंस आठ साल का था जब उसकी कैंसर से मौत हुई थी.

वह कहते हैं, "उससे तब जो बातचीत हुई तो आप समझ सकते थे कि कैसे वह उस दिशा में सोचने लगा था जो उसकी उम्र के लिए सही नहीं था. बच्चे समझने की कोशिश करते हैं कि क्या चल रहा है. तो क्या इसका मतलब है कि वे इसके हल यानी इच्छामृत्यु के बारे में फ़ैसला लेने लायक हो गए हैं या इसकी अनुमति मांग सकते हैं. नहीं, मेरे ख़्याल से नहीं."

कोई नहीं बता सकता कि बेल्जियम अगर बच्चों को इच्छामृत्यु की इजाज़त देने वाला विधेयक पारित कर देता है तो कितने बच्चे इसकी मांग करेंगे. वयस्कों के लिए 2002 से अब तक यह दरख़्वास्त करने वालों की मांग यक़ीनन बढ़ती गई है. इनमें से 80 फ़ीसदी वे थे जिन्हें कैंसर था और जिन्होंने इच्छामृत्यु चुनी.

बेल्जियम में इच्छामृत्यु के शुरुआती पैरोकार कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर जान बर्नहाइम कहते हैं, "आंकड़ों के लिहाज़ से वो कैंसर मरीज़, जो इच्छामृत्यु से मरे, उनके मुक़ाबले लंबी उम्र जिए जो क़ुदरती तौर पर मरे. क्यों? क्योंकि जब इस पर सहमति बन गई कि वो इच्छामृत्यु मांग सकते हैं तो इससे उन्हें बेहद ढाढस बंधा. वे जानते हैं कि वे आराम से मरेंगे." वे कहते हैं कि उनकी बीमारी बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो जाती है.

बर्नहाइम बच्चों को इच्छामृत्यु का अधिकार देने के समर्थक हैं, और उन्होंने ऐसे वयस्कों को इच्छामृत्यु इंजेक्शन देने की प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं.

वह कहते हैं, "पीड़ा सभी तर्कों से बढ़कर है. और जिस तरह ये लोग मरते हैं, वह काफ़ी औपचारिक है और अक्सर इसमें कुछ भावपूर्ण सौंदर्य होता है. जबकि जो मरीज़ दो-तीन दिन तक तेज़ी से तड़पते और कराहते हुए मरते हैं, वह भयानक होता है…"

किसी बच्चे की मौत एक त्रासदी है. लेकिन क्या बेल्जियम के बच्चों को अपना जीवन ख़त्म करने का अधिकार है? बेल्जियम की संसद जल्द ही इस पर विचार करने वाली है.

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