कहीं पाकिस्तान नाज़ुक दोराहे पर तो नहीं!

  • 27 जनवरी 2014
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ Image copyright afp

जाने क्यों ये किसी को समझ में नहीं आता कि किसी भी क़ानून के साथ सख़्त लिख देने से कुछ नहीं होता.

अन्यथा जगह-जगह बदबूदार दीवारों पर लिखी इबारत कि 'यहां पेशाब करना सख़्त मना है, इसका उल्लंघन करने वालों को पुलिस के हवाले कर दिया जाएगा' का ज़रूर असर होता. अब तक यही देखा गया है कि कड़े क़ानूनों से अपराध को जड़ से ख़त्म करने का काम भले हो ना हो लेकिन ये कमज़ोर नागरिकों की परेशानी का सबब ज़रूर बन जाते हैं.

(राहुल और मोदी का फर्क?)

जहां सख़्त क़ानून बनाने का उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा से अधिक कुछ हाथों में ज़रूरत से ज़्यादा ताक़त देना हो, वहाँ बड़े से बड़ा क़ानून भी बंदर के हाथ में उस्तरा बन सकता है. इसलिए कहा जाता है कि हथियार चलाने के लिए हाथ से अधिक दिल और अपराध पर नकेल डालने के लिए क़ानून बनाने से ज़्यादा उसे वाजिब तरीक़े से लागू करना ज़रूरी हो जाता है.

कागज़ पर केवल लोहे का हाथ बना देने से हाथ लोहे का नहीं हो जाता. छह सितंबर, 1965 को भारत से जंग शुरू होते ही अयूब सरकार ने आपात स्थिति लागू कर दी थी और डिफेंस ऑफ पाकिस्तान रूल (डीपीआर) के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकार को निलंबित कर दिए थे.

कैबिनेट बैठक

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कहा तो यह गया था कि डीपीआर दुश्मन से गठजोड़ कर देश की अखंडता को नुकसान पहुंचाने वालों के ख़िलाफ़ ही इस्तेमाल होगा और हालात बेहतर होते ही मौलिक अधिकारों को बहाल कर दिया जाएगा.

जब यह क़ानून लागू हुआ तो विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो इस कैबिनेट बैठक में शामिल थे जिसने डिफेंस ऑफ पाकिस्तान रूल लागू करने की मंज़ूरी दी थी.

(किसे बनाए आर्मी चीफ़?)

तीन साल बाद नवंबर, 1968 में अयूब हुकूमत ने इसी डीपीआर के तहत भुट्टो को गिरफ़्तार कर लिया और बेगम नुसरत भुट्टो ने फ़रवरी, 1969 में पश्चिमी पाकिस्तान के उच्च न्यायालय में अपने पति की गिरफ़्तारी को चुनौती देते हुए याचिका में कहा कि उनके शौहर को मियांवाली जेल की कोठरी में अकेले ज़ंजीर से बंधी चारपाई दी गई है.

चूहों और मच्छरों को रोकने का कोई इंतजाम नहीं है, टॉयलेट भी इसी कोठरी का हिस्सा है. लाल गेहूं के आटे की दो चपातियाँ और कंकड़ मिली दाल खाने में दी जाती है. कोठरी में दिन रात लगातार तेज़ रोशनी जली रहती है.

बाद में ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को साहीवाल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया जहां वह कोठरी में उड़ने वाले चमगादड़ की फड़फड़ाहट से बचने के लिए चेहरे पर तौलिया डाल कर सोने को मजबूर थे और वकील से न मिलने देने की शिकायत भी थी.

नकारात्मक प्रभाव

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डिफेंस ऑफ पाकिस्तान रूल का सताया यही क़ैदी जब प्रधानमंत्री बना तो उसने 14 अगस्त 1973 को संविधान लागू करने के कुछ ही घंटे बाद ही राष्ट्रपति फज़ल इलाही चौधरी से एक ऑर्डिनेंस जारी करवा कर आपातकाल का बढ़ा दिया और मौलिक अधिकारों को लगातार स्थगित रखे.

(अलग-अलग मारो!)

डीपीआर राजनीतिक विरोधियों और पार्टी के बागियों की गिरफ़्तारी, पिटाई और दर्जनों अख़बारों और पत्रिकाओं के डिक्लरेशंस को रद्द करने सहित 'बदतमीज मीडिया' के ख़िलाफ़ खुले दिल से इस्तेमाल किया गया.

मार्च, 1974 में क़ानून मंत्री अब्दुल हफ़ीज़ पीरज़ादा ने संसद से आपात स्थिति लागू करने की अवधि इस औचित्य के साथ बढ़वा ली कि चूंकि भारत में साल 1971 के युद्ध से पहले आपातकाल लागू है और अक्टूबर, 1973 के अरब-इसराइल युद्ध के नकारात्मक प्रभाव से पाकिस्तान संभवतः प्रभावित हो सकता है.

इसलिए डिफेंस ऑफ पाकिस्तान रूल बनाए रखना ज़रूरी है. संक्षेप में अयूब सरकार के द्वारा लागू किए गए आपातकाल को चार सरकारों ने 20 सालों तक लागू रखा और मोहम्मद ख़ान जुनेजो की सरकार ने साल 1985 में इससे जान छुड़वाई. हालांकि वह भी कह सकते थे कि अफ़ग़ान युद्ध के कारण आपातकाल को उस समय ख़त्म करना वाजिब नहीं होगा.

विशेष अदालत

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आज अयूब ख़ान की तरह की इमरजेंसी के ख़ात्मे को 29 साल बाद पाकिस्तान फिर नाज़ुक दोराहे पर है. लेकिन आज भी हालात से निपटने के लिए जनता को विश्वास में लेकर एकाग्रता के साथ आतंकवाद के ख़िलाफ़ मोर्चा बनाने और आधुनिक क़ानूनी, सैन्य और वैज्ञानिक रणनीति सीखने और अपनाने के बजाय उन्हीं घिसे पिटे बाप दादा के ज़माने से चले आ रहे औपनिवेशिक नुस्खे पर ज़ोर है.

(पाकिस्तान, पोलियो और यूट्यूब)

जैसे राष्ट्रपति ममनून के नाम से जारी प्रोटेक्शन ऑफ पाकिस्तान ऑर्डिनेंस पढ़ें तो ऐसा महसूस होता है कि साल 1965 के डीपीआर को साल 2014 के प्रोटेक्शन ऑफ पाकिस्तान ऑर्डिनेंस (पीपीओ) की चड्ढी पहना दी गई है.

पीपीओ के तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को बिना कारण बताए 90 दिन से अधिक समय तक किसी अदालत में पेश किए बिना हिरासत में लेकर अज्ञात जगह पर किसी भी एजेंसी की हिरासत में रखा जा सकता है जहां न किसी वारिस की और ना ही वकील की पहुँच हो सकेगी.

अभियुक्त पर विशेष अदालत के बंद कमरे में मुक़दमा चलाया जा सकता है और यदि आरोपी सज़ा से बचना चाहता है तो यह सरकार के बजाय उसकी ज़िम्मेदारी है कि वह अपनी बेगुनाही का सबूत पेश करे. इस अध्यादेश के तहत किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को क़ानून लागू करना वाला अधिकारी 'उचित संदेह' के तहत सड़क पर ही मौत दे दे तो पूछताछ नहीं होगी.

असाधारण परिस्थितियां

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कहा जा रहा है कि असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए असाधारण क़ानूनों की ज़रूरत होती है और यह क़ानून केवल आतंकवादियों और उनके सहायकों से निपटने के लिए उपयोग होगा. राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों को डरने की ज़रूरत नहीं है. बस यही आश्वासन दूध के जलों को सबसे ज़्यादा डराता है.

(पाकिस्तान के गुजरात में...)

अटक के क़िले में क़ैद-ए-तन्हाई के डसे मियां नवाज़ शरीफ की सरकार बड़े शौक से जो चाहे क़ानून लाए लेकिन इतना ध्यान रहे कि कल कलां बेगम कुलसुम नवाज लाहौर हाईकोर्ट में यही प्रोटेक्शन ऑफ पाकिस्तान ऑर्डिनेंस को चुनौती देते हुए ख़ुदा न करे कि ये याचिका दायर करनी पड़े, "मेरे शौहर को मियांवाली जेल की कोठरी में अकेले ज़ंजीर से बंधी चारपाई दी गई है. चूहों और मच्छरों को रोकने का कोई इंतजाम नहीं है, टॉयलेट भी इसी कोठरी का हिस्सा है. लाल गेहूं के आटे की दो चपातियाँ और कंकड़ मिली दाल खाने में दी जाती है. कोठरी में दिन रात लगातार तेज़ रोशनी जली रहती है."

ये वही तीर है जो लौटकर आता है.

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