सीरिया संकट: जिनेवा शांति वार्ता आरोप-प्रत्यारोपों के साथ सम्पन्न

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सीरिया संकट के समाधान के लिए जिनेवा में आयोजित शांति-वार्ता सीरियाई सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोपों के साथ बिना किसी ठोस समझौते के सम्पन्न हो गई है.

सीरिया के विदेश मंत्री वालिद मुअल्लम ने वार्ता में विपक्ष की भूमिका को अपरिपक्व बताया, वहीं विपक्ष के प्रतिनिधि लॉय सफ़ी का कहना है कि ख़ून-ख़राबा रोकने की सरकार की कोई मंशा नहीं है.

बहरहाल, संयुक्त राष्ट्र के वार्ताकार लख़्दर ब्राहिमी का कहना है कि उन्हें दोनों पक्षों के बीच कुछ 'साझा' नज़र आया है और दस फ़रवरी को आगे की बातचीत हो सकती है.

विपक्ष इस पर राज़ी भी हो गया है लेकिन वालिद मुअल्लम ने पक्के तौर पर कुछ कहने से इंकार कर दिया.

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ''हम लोगों की चिंताओं और हितों के नुमाइंदे हैं. यदि फिर मिलने की मांग होती है तो हम वापस आएंगे.''

वालिद मुअल्लम ने विपक्ष पर यह कहकर निशाना साधा कि विपक्ष सम्मेलन में बस इसी बात पर ज़ोर देने की कोशिश करता रहा कि सरकार को सत्ता हस्तांतरित कर देना चाहिए.

वहीं विपक्ष के प्रतिनिधि सफ़ी ने कहा कि विपक्ष बातचीत के लिए हमेशा बैठा नहीं रहेगा.

उन्होंने कहा कि सरकार को सत्ता हस्तांतरण के बारे में गंभीरता से बातचीत करनी चाहिए.

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विपक्ष के नेता अहमद जाबरा ने कहा कि वह और उनके साथी ''उस शासन के ख़िलाफ़ खड़े हुए हैं जो केवल ख़ून और मौत समझता है.''

दोनों पक्षों ने मानवीय मुद्दों और हिंसा को ख़त्म करने के संभावित उपायों के बारे में भी विचार-विमर्श किया.

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राहतकर्मी, ज़रूरतमंदों तक पहुंच सकें, इसके लिए दोनों पक्ष स्थानीय संघर्षविराम पर कुछ समझौतों पर सहमत हुए हैं.

संयुक्त राष्ट्र की सहायता प्रकोष्ठ प्रमुख वलेरी एमोस ने कहा कि इससे हज़ारों पीड़ित परिवारों तक कुछ मदद पहुंच सकेगी.

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लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि हिंसा से बुरी तरह प्रभावित सीरियाई शहर होम्स पर संघर्षविराम के समझौते का कोई असर नहीं पड़ा है जहां किसी तरह की मदद नहीं पहुंचाई जा सकी है.

होम्स के कुछ स्थानीय लोगों ने बीबीसी को बताया है कि उन्हें ज़िदा रहने के लिए घास खानी पड़ रही है. होम्स के कुछ हिस्सों पर 18 महीनों से अधिक समय से सरकार का नियंत्रण हैं.

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सीरिया में मार्च 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद के ख़िलाफ़ बग़ावत शुरू हुई और तब से अब तक एक लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

'धीमी शुरुआत'

सीरिया के दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे संयुक्त राष्ट्र के वार्ताकार लख़्दर ब्राहिमी का कहना है, ''वैसे तो प्रगति बहुत धीमी है लेकिन दोनों पक्ष बहुत हद तक सम्बद्ध हुए हैं. यह बेहद धीमी शुरुआत है लेकिन इसे आगे बढ़ाया जा सकता है.''

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उन्होंने कहा, ''हालांकि दोनों पक्षों के दरम्यान खाई बहुत चौड़ी है लेकिन अब उन्हें एक ही कमरे में बैठने की आदत पड़ गई है.''

लख़्दर ब्राहिमी ने कहा, ''कई ऐसे क्षण भी आए जब एक पक्ष ने दूसरे पक्ष की चिंताओं और मुश्किलों को समझा.''

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ग़ौरतलब है कि सीरिया की सरकार और विपक्षी नेशनल कोएलिशन के बीच शांति-वार्ता का पहला दौर पिछले हफ़्ते आरंभ हुआ था.

दोनों पक्ष विचार-विमर्श के लिए वर्ष 2012 के उस दस्तावेज़ की बुनियाद पर राज़ी हुए जिसे 'जिनेवा कम्यूनके' कहा जाता है. इसी दस्तावेज़ के आधार पर दोनों पक्ष एक ही कमरे में बैठकर बातचीत के लिए राज़ी हुए.

लेकिन दोनों पक्षों में मोटे तौर पर कोई पुख़्ता सहमति नहीं बन पाई क्योंकि विपक्ष राजनीतिक हस्तांतरण और सरकार चरमपंथ के मुद्दे पर अड़ी रही.

वैसे शांति-वार्ता में मौजूद अन्य देशों के राजनयिकों का कहना है कि पूरे सम्मेलन के दौरान दोनों पक्षों के बीच चरम तनाव का माहौल था.

साथ ही विद्रोही लड़ाकू गुटों के प्रतिनिधियों की ग़ैर-मौज़ूदगी की वजह से शांति-वार्ता पर बुरा असर पड़ा. इन गुटों में अल-क़ायदा से संबंध रखने वाला समूह अल-नुसरा फ्रंट भी शामिल है.

राजनयिकों का कहना है कि जिनेवा में सबसे बड़ी प्राथमिकता यही रही कि बातचीत जारी रहे ताकि गुज़रते वक़्त के साथ सीरिया के दोनों पक्षों के कट्टर रवैये में थोड़ी नरमी आ सके.

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