टेक्नॉलॉजी के साथ हैं या वो आपसे आगे?

  • 5 फरवरी 2014
लंदन मेट्रो

टेक्नॉलॉजी रोज़गार के नए मौक़े पैदा करती है और कई बार रोज़गार छीन भी लेती है. सवाल बस इतना है कि आप टेक्नॉलॉजी के साथ हैं या वो आपसे आगे निकल गई है.

लंदन ट्रांसपोर्ट का इरादा मेट्रो स्टेशनों की सारी टिकट खिड़कियों को बंद करने का है, ऐसा होने पर एक ओर 750 लोगों की नौकरियाँ जाएँगीं, तो दूसरी ओर लाखों पाउंड बचेंगे.

लंदन ट्रांसपोर्ट का कहना है कि लोग ऑनलाइन, मोबाइल ऐप्स और ऑटोमेटेड मशीन से टिकट ख़रीद रहे हैं फिर खिड़की पर आदमी बिठाने का क्या काम?

इसके विरोध में होने वाली मेट्रो कर्मचारियों की दो दिन की हड़ताल से लाखों यात्री प्रभावित होंगे, लेकिन बहस ये नहीं है कि लाखों यात्रियों की दो दिन की दिक्कत बड़ी है या 750 परिवारों के गुज़र-बसर का सवाल.

बहस के केंद्र में भविष्य की दिशा है, यह बहस काफ़ी पुरानी हो चुकी है, कुछ वैसी ही बहस जैसी 1980 के दशक के अंत में, भारत में दफ़्तरों में कंप्यूटर लगाए जाने के वक़्त सुनाई देती थी.

मशीन और मज़दूर का रिश्ता हमेशा से बहुत जटिल रहा है, मज़दूर यही चाहता है कि मशीन उसका काम आसान करे, काम छीन न ले, मगर काम आसान होते ही नौकरी से हटाया जाना भी आसान हो जाता है.

मज़दूर यूनियन का कहना है कि यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में कर्मचारियों की संख्या में कटौती कैसे की जा सकती है, यह तर्क काफ़ी वज़नदार लगता है लेकिन लंदन मेट्रो का कहना है कि मॉर्डन टेक्नॉलॉजी की मदद से मेट्रो सस्ते में चल सकती है तो यात्रियों पर ख़र्च का बोझ क्यों डाला जाए.

टेक्नॉलॉजी

लंदन मेट्रो का इतिहास डेढ़ सौ साल पुराना है, बदलते वक़्त के साथ उसने अपने आपको लगातार बदला है.

लंदन ट्रांसपोर्ट ने ग्यारह साल पहले ऑयस्टर कार्ड शुरू किया था जिसमें बहुत आसानी से पैसे डाले जा सकते हैं, ये कार्ड मेट्रो, बस, ओवरग्राउंड, डॉकलैंड रेलवे और यहाँ तक कि टेम्स नदी में बोट पर भी चलते हैं.

अब तक चार करोड़ से अधिक ऑयस्टर कार्ड जारी हो चुके हैं और 80 फ़ीसदी से अधिक यात्राएँ इस कार्ड से होती हैं, ऑयस्टर कार्ड का इस्तेमाल करने वालों को स्टेशन पर मौजूद स्टाफ से किसी तरह की मदद लेने की ज़रूरत शायद ही कभी पड़ती है.

हाल में दिल्ली यात्रा के दौरान मुझे कुछ मेट्रो स्टेशनों पर ऑटोमेटेड मशीनें दिखाई दीं, जहाँ बिना किसी इंसानी मदद के मेट्रो कार्ड में पैसे डाले जा सकते हैं, कुछ साल बाद अगर दिल्ली मेट्रो में भी हड़ताल की ख़बर आएगी तो उसकी वजह टेक्नॉलॉजी ही होगी.

टिकट खिड़की पर बैठे क्लर्क की बात तो छोड़िए, रेल ड्राइवरों की नौकरी भी टेक्नॉलॉजी की वजह से ख़तरे में है, लंदन के मेयर बॉरिस जॉनसन लंबे समय से ड्राइवरलेस ट्रेन की वकालत कर रहे हैं.

ड्राइवरलेस ट्रेन कोई नया आइडिया नहीं है. पेरिस, बार्सीलोना, कोपहागन से लेकर इंस्ताबूल तक दुनिया के तकरीबन बीस शहरों में ऐसी मेट्रो लाइनें हैं जिनमें ड्राइवर नहीं होते, इन्हें अनअटेंडेड ट्रेन ऑपरेशन या यूटीओ कहा जाता है.

लंदन से छपने वाले एक अख़बार का अनुमान है कि जो लाखों लोग मेट्रो की हड़ताल से प्रभावित होंगे उनमें से एक तिहाई ऐसे हैं जो दफ़्तर गए बिना ही अपने सारे काम निबटा सकते हैं, और ये भी संभव है टेक्नॉलॉजी की ही वजह से.

सोचिए कि आपका टेक्नॉलॉजी से रिश्ता कैसा है, और भविष्य में कैसा होगा?

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