क्यों मोदी से गले लग रहा है अमरीका?

नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट AFP

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत में अमरीकी राजदूत नैंसी पॉवेल की प्रस्तावित भेंट को भारत में अमरीकी नीति में एक बड़े बदलाव की तरह देखा जा रहा है लेकिन वॉशिंगटन में विश्लेषक इसे भारत में चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण के आंकड़ों का कमाल मानते हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि अमरीका के लिए एक ऐसी स्थिति बनती नज़र आ रही थी, जिसमें उनके एक मित्र देश में एक ऐसा व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है जिसे वो लंबे समय तक अपने यहां आने देने से भी मना करते रहे.

मोदी के ख़िलाफ़ अमरीका में काफ़ी समय तक आवाज़ उठाने वाले जोसेफ़ ग्रिवोस्की ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि 'अमरीका में अब मोदी को भारत के भावी प्रधानमंत्री की तरह देखा जा रहा है.'

धर्म और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े एक थिंक टैंक के अध्यक्ष ग्रिवोस्की का ये भी कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता मौजूदा प्रशासन की विदेश नीति के लिए उस तरह की प्राथमिकताओं में नहीं है जैसा 2005 में था जब अमरीका ने मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था.

ग्रिवोस्की ने कहा कि वह यही उम्मीद करते हैं कि मोदी के साथ नैंसी पॉवेल की मुलाक़ात को मोदी की नीतियों के प्रति अमरीका की सहमति के तौर पर नहीं देखा जाएगा.

अमरीकी विदेश मंत्रालय का कहना है कि मोदी से मुलाक़ात का फ़ैसला एक सही फ़ैसला है और पूरे विचार-विमर्श के बाद लिया गया है.

विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का कहना था, “हमारी विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं है और ना ही पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए जो हमारी नीति है वो बदली है.”

'मोदी समर्थकों की ताक़त'

उनका कहना था कि अमरीकी राजदूत वरिष्ठ राजनेताओं और व्यापार जगत की हस्तियों से मुलाक़ातें करते रहते हैं और ये मुलाक़ात भी उसी का हिस्सा है.

पिछले कुछ महीनों से कई प्रभावशाली अमरीकी थिंक टैंक मोदी की जीत की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. अमरीकी व्यापार जगत भी उनकी तरफ़ रुझान दिखा रहा है.

अमरीका की बड़ी कार निर्माता कंपनी जनरल मोटर्स का एक कारखाना गुजरात में है और ख़बरें हैं कि इस साल फ़ोर्ड कार कंपनी भी एक कारखाने की नींव गुजरात में रखने जा रही है.

कार्नेगी इंस्टीट्यूट में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार मिलिंद वैष्णव का कहना है कि मोदी के मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर सभी चिंताएं खत्म हो गईं हों ऐसा नहीं है लेकिन अमरीका अब भारत के चुनाव परिणामों की ओर देख रहा है.

उनका कहना है कि ये फ़ैसला शायद पहले करना चाहिए था.

मिलिंद वैष्णव कहते हैं, “चुनाव के ठीक पहले ये फ़ैसला अमरीकी अवसरवादिता दर्शाता है और ये आरोप भी लग सकते हैं कि वो किसी देश के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है. या तो ये फ़ैसला पहले होना चाहिए था या फिर चुनाव परिणाम के बाद.”

इमेज कॉपीरइट Reuters

विश्लेषकों का ये भी मानना है कि मोदी समर्थक अब यहां पहले के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा ताक़तवर हैं और सुनियोजित तरीके से अपना पक्ष वॉशिंगटन में रखते हैं.

ज़हीर जान मोहम्मद अमरीकी कांग्रेस के लिए काम कर चुके हैं और उन्होंने मोदी पर प्रतिबंध लगाने के लिए कई प्रदर्शनों में भी भाग लिया है.

उनका कहना है, “पहले जब किसी सभा में हम मोदी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते थे तो शायद ही कहीं से उसका विरोध होता था. अब अमरीकी संसद और वॉशिंगटन में बहुत सारी आवाज़ें हैं जिनका कहना है कि दंगों में उनकी भूमिका को ग़लत तरीके से पेश किया गया और उन्हें अनावश्यक रूप से निशाना बनाया गया.”

माना जा रहा है कि अमरीकी कांग्रेस और विदेश मंत्रालय में अब भी कई आवाज़ें मोदी के ख़िलाफ़ हैं और रहेंगी लेकिन जब अमरीकी “राष्ट्रहित” की बात होगी तो शायद वो उतने मुखर नहीं होंगे जितना अब तक रहे हैं.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार