पाकः शादी से इनकार तेज़ाबी इंतक़ाम की वजह!

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पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में पश्तो फ़िल्मों की अभिनेत्री और डांसर शाज़िया बेगम पर तेज़ाब से हमला किया गया था जिसमें वे बुरी तरह झुलस गईं थीं.

एक स्टेज शो की फ़ीस को लेकर 18 वर्षीय शाज़िया का एक प्रोड्यूसर से विवाद हो गया था. इसी को तेज़ाबी हमले की वजह माना गया. बीस से ज़्यादा पश्तों फ़िल्मों में काम कर चुकीं शाज़िया अपनी अदाकारी के दम पर यहाँ की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार की जाती रही हैं.

पाकिस्तान में ज़ख़्म तेज़ाब के

लेकिन तेज़ाबी हमले के कारण चेहरा ख़राब होने से शाज़िया का फ़िल्मी करियर ख़त्म हो गया और उनकी ज़िंदगी बदहाल हो गई. शाज़िया अपने ख़ुशहाल दौर को याद करके उदास रहती हैं. शाज़िया ने बीबीसी को बताया, "हादसे से पहले जब मैं शोबिज़ में थी तब अपने पराए सब उनके दीवाने थे लेकिन इस हादसे के बाद से सभी ने मुझसे मुँह मोड़ लिया."

शाज़िया के पिता की मौत हो चुकी है और वे फ़िल्मों से होने वाली आमदनी के सहारे अपने परिवार का ख़र्च चलातीं थीं. अब उनका परिवार लोगों से मिलने वाली ख़ैरात पर गुज़ारा करने के लिए मजबूर है.

ज़िंदगी दुश्वार

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यही नहीं शाज़िया पर हमला करने वाले अपराधी भी अब तक क़ानूनी गिरफ़्त से आज़ाद हैं. ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह की 'महिला जिरगा' की अध्यक्ष तबस्सुम अदनान ने बताया कि तेज़ाब जैसे घिनौने हमले करके महिलाओं के चेहरे ख़राब कर देने के आपराधिक हादसों में बढ़ोत्तरी हो रही है लेकिन ऐसे बहुत कम मामले ही अदालत तक पहुँच पाते हैं.

(स्वर्ग में भी नहीं ले जा सकते...)

तबस्सुम के मुताबिक़ तेज़ाबी हमलों का शिकार होने वाली महिलाओं की ज़िंदगी बेहद ख़राब हालत में गुज़र होती है. पाकिस्तान में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में सबसे दर्दनाक और यातनाकारी तेज़ाबी हमले ही हैं. हालांकि सरकार की तरफ़ से इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ें नहीं जारी किए गए हैं. इसकी एक वजह शायद यह भी है कि तेज़ाब के दिए जख़्म पीड़ित महिलाओं के लिए हमेशा सवालिया निशान बने रहते हैं.

पाकिस्तान में 'इज़्ज़त' के नाम पर युवतियों की हत्या और शादी से इंकार पर तेज़ाबी हमलों में वृद्धि की एक वजह यह भी है कि अपराधियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई का ना होना है.

मानसिक पीड़ा

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मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि तेज़ाब से झुलसने के नतीजे के तौर पर न सिर्फ़ महिलाओं का चेहरा या जिस्म बदसूरत हो जाता है बल्कि पीड़ित महिलाएँ स्थायी तौर पर मानसिक पीड़ा का शिकार हो जातीं हैं.

(काबुल में लोकप्रिय हिंदी सिनेमा)

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर निज़ाम अली ने बीबीसी को बताया कि ऐसे हादसों की शिकार महिलाएं अवसाद का शिकार हो जाती हैं. इसकी बड़ी वजह ये होती है कि उनके परिजन, दोस्त और समाज के लोग उनसे दूरी बना लेते हैं. इसी वजह से ये महिलाएं लोगों से अपना चेहरा छुपाने लगती हैं.

वे जब भी इस हादसे के बारे में सोचती हैं उनमें 'स्ट्रेस रिएक्शन' हो जाता है और जब वे ज़िंदगी के बारे में सोचती हैं तो उनमें चिंता पैदा हो जाती है. डॉक्टर अली के अनुसार अगर समाज के लोगों, परिजनों और दोस्तों का साथ मिलें तो पीड़ित महिलाएं अवसाद और चिंता से निकल सकती हैं.

दहशतगर्दी

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स्वात की प्रमुख वकील साइमा अनवर ने तेज़ाब हमलों के बारे में कहा कि हमारे समाज में महिलाओं को बेहद कमज़ोर समझा जाता है और उनसे बदला लेने के लिए तेज़ाब से हमले एक संगीन इंतक़ाम है.

(पेशावर का अनोखा एफएम रेडियो)

पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं के ख़िलाफ़ आक्रामक रवैया आम होने और तेज़ाब से हमले करने के मामलों में इज़ाफ़ा होने पर सरकार ने साल 2011 में फ़ौजदारी क़ानून में संशोधन के लिए बिल मंज़ूर किया था जिसके तहत तेज़ाब से हमला करने की सज़ा चौदह साल या उम्रक़ैद और दस लाख रुपये जुर्माना है.

उनके मुताबिक़ तेज़ाब जैसे घिनौने हमले दहशतगर्दी की श्रेणी में आते हैं. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ पाकिस्तान में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा और दमन का इतिहास लंबा है. शादी के रिश्तों को ठुकराने वाली महिलाओं के ख़िलाफ़ तेज़ाब के हमले काफ़ी ज़्यादा हैं.

बताया जाता है कि दुनिया भर में तेज़ाब हमलों के सालाना लगभग पंद्रह सौ से ज़्यादा मामले रिपोर्ट किए जाते हैं.

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