सेहत पर असर डालती है दफ़्तर की भागदौड़ !

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काम पर जाने के लिए रोज़ाना किए जाने वाले सफ़र का आनंद नहीं उठाया जाता बल्कि उसे किसी तरह सहन किया जाता है. हम दफ़्तर कैसे पहुंचते हैं और इसमें कितना वक़्त लगता है, इसका असर हमारी भावनाओं पर भी पड़ता है.

ब्रिटेन में औसत कर्मचारी हर रोज़ दफ़्तर आने-जाने पर 54 मिनट खर्च करता है. दफ़्तर आने जाने के लिए होने वाली इस मशक्कत की कीमत चुकानी पड़ती है जो केवल आर्थिक ही नहीं है.

ब्रिटेन के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (ओएनएस) के आंकड़ों के मुताबिक़ सुख की अनुभूति, जीवन की संतुष्टि और इस बात की भावना कि हर एक काम महत्वपूर्ण है, यह सब सफ़र में लगने वाले हर मिनट के साथ-साथ घटते जाते हैं.

एक से डेढ़ घंटे लंबी यात्राएं इंसान के सुख पर सबसे अधिक नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. ओएनएस के शोध में पाया गया कि काम के लिए बस से जाने में अगर आधे घंटे से अधिक का समय लगता है तो इससे इंसान में चिड़चिड़ापन आता है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक़ इंग्लैंड और वेल्स के 7.2 फ़ीसदी कामकाजी लोग काम पर जाने के लिए कोच या बस से यात्रा करते हैं. पांच फ़ीसदी लोग ट्रेन से काम पर जाते हैं तो 3.8 फ़ीसदी लोग काम पर जाने के लिए अंडरग्राउंड मैट्रो की सवारी करते हैं.

सबसे अधिक 59 फ़ीसदी लोग अपनी कार से या किसी कार या वैन से लिफ़्ट लेकर काम पर जाते हैं.

'सफ़र का सेहत पर असर'

आदर्श स्थिति में बस के सफ़र का इंसान के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए. बस से यात्रा बढ़ती जा रही है, क्योंकि लोग बेहतर घरबार, अधिक हरियाली और ऊंचे जीवन स्तर की तलाश में कस्बों और शहरों से निकल रहे हैं.

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शेफ़ील्ड विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर जेनी रॉबर्ट ने बस के सफ़र में लगने वाले समय और इसके इंसान के सुख पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया. इसमें 13 साल से अधिक समय तक सात हज़ार पुरुषों और सात हज़ार महिलाओं का अध्ययन किया गया.

वहीं इसके उलट ओएनएस की रिपोर्ट 60 हज़ार से ज़्यादा नौकरीपेशा लोगों पर 2012-2013 के बीच किए गए एक सर्वेक्षण पर आधारित है.

प्रोफ़ेसर जेनी रॉबर्ट के जर्नल ऑफ़ हेल्थ इकोनॉमिक्स में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक़ काम के लिए सफ़र करने का पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है, हालांकि आमतौर पर महिलाएं पुरुषों की तुलना में इस तरह की यात्राएं कम करती हैं और उनके काम के घंटे भी कम होते हैं.

इन अनुमानों में आय, नौकरी से संतुष्टि और रहन-सहन की स्थिति का ध्यान रखा गया.

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