'खिलौना' जो जर्मन सैनिकों को ख़ौफ़ज़दा कर गया

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जर्मन की 84वीं रिज़र्व रेजीमेंट के सैनिक विल्हेम स्पेक दहशत भरे उस दिन को कभी नहीं भूल पाए.

वे कहते हैं, "दहशत शुरू हो गई थी. पहली और तीसरी कंपनी के प्रत्येक व्यक्ति ने मोर्चा छोड़ दिया और तेज़ी से भागे. उनके पीछे निर्दयी टैंक और मशीन गन की गोलीबारी थी, जिसमें कई लोग मारे गए."

कुछ भाग गए. कुछ ने मुक़ाबला करने की कोशिश की. लेकिन टैंकों से उस पहली मुलाक़ात को कोई नहीं भूल पाया. ये एक ऐसा हथियार था जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी. 20वीं सदी के दौरान युद्ध के मैदानों पर इस हथियार का दबदबा बना रहा.

टैंक को केवल दो लोगों ने डिज़ाइन किया था. वो भी लिंकन के एक छोटे से होटल के कमरे में काम करते हुए लगभग दो महीनों के भीतर.

बोविंगटन टैंक म्यूज़ियम के क्यूरेटर डेविड विले ने बताया कि ब्रिटिश सेना के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि खाइयों में बने जर्मन सैनिकों के मोर्चे को कैसे पार किया जाए?

टैंक की तैयारी

ऐसे में वरिष्ठ अधिकारियों ने सोचा कि शायद तकनीक के इस्तेमाल से इसका समाधान हो सकता है. युद्ध के दौरान विशाल बख़्तरबंद मशीनों के इस्तेमाल की कल्पना अभी तक साइंस फ़िक्शन से बाहर नहीं निकली थी.

फ़रवरी 1915 में नौसेना की लैंडशिप कमेटी को एक उपाए सूझा. लेकिन इसका परीक्षण कहां किया जाए?

लिंकन में विलियम फ़ोस्टर एंड कंपनी लिमिटेड को थ्रेशिंग मशीन बनाने में महारत हासिल थी.

इतिहासकार रिचर्ड पुलेन बताते हैं, "फ़ोस्टर ने खेती के लिए शक्तिशाली मशीन बनाने पर काम किया था."

युद्ध के शुरुआती दिनों में उन्होंने ट्रैक्टर से बड़ी तोप बनाने में मदद की.

उन्होंने बताया, "इसलिए सेना को पता था कि उनके पास अनुभव है. वो ये काम कर सकते थे और लिंकन इसके लिए बेहतरीन जगह थी."

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इस काम के लिए दो ख़ास लोगों की ज़रूरत थी- विलियम ट्रिटन और लेफ़्टिनेंट वाल्टर विल्सन.

पुलेन बताते हैं, "ट्रिटन बेहतरीन इंजीनियर थे. और इनकी नेतृत्व क्षमता भी ग़ज़ब की थी." दोनों को एक ऐसी मशीन डिज़ाइन करने का काम सौंपा गया जो चार फ़िट चौड़ी खाई को पार कर सके.

पुलेन ने बताया, "उन्होंने ख़ुद को कमरे में बंद कर लिया और शायद उन्होंने लिफ़ाफ़ों और सिगरेट के पैकेट पर भी डिज़ाइन बनाएं."

जो डिज़ाइन उन्हें पसंद आता, उसे परीक्षण के लिए फ़ैक्टरी भेजा जाता था.

वो जानते थे कि उन्हें तेज़ी से काम करना है. सभी को डर था कि कहीं जर्मनी उनसे पहले ऐसी ही मशीन न बना ले. पहले डिज़ाइन का 19 सितंबर को परीक्षण किया गया, लेकिन ये असफल रहा.

इस बात के लिए ख़ास इंतज़ाम किए गए थे कि जर्मनी को इन तैयारियों की भनक न लगे. इसलिए मशीन का कोड नाम 'टैंक' रखा गया, जो इसके अजीब आकार से प्रेरित था. टैंक नाम होने से ठीक-ठीक पता नहीं चलता था कि ये क्या है.

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कुछ नई प्रणालियों के इस्तेमाल के साथ ही टैंक का प्रोटोटाइप 'लिटिल विली' चार फ़िट चौड़ी खाई पार करने में सक्षम हो गया, लेकिन अब सेना को आठ फ़िट चौड़ी खाइयों का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन विल्सन के पास इसका समाधान था.

दहशत

मशीन के निचले हिस्से को समतल बनाकर 25 फ़िट पांच इंच तक चौड़ाई नापी जा सकती थी. इस तरह टैंक के प्रसिद्ध "वांगकी बॉक्स" यानी टेढ़ेमेढ़े आकार का जन्म हुआ.

लेकिन इस मशीन के चलाने के लिए जो इंजन इस्तेमाल किया गया वो पर्याप्त शक्तिशाली नहीं था.

ख़ैर दिसंबर तक प्रोटोटाइप बनकर तैयार था. लिंकन में शुरुआती परीक्षण के बाद इस मशीन को एक 'मॉक बैटल' के लिए हर्टफ़ोर्डशायर लाया गया. टैंक के प्रदर्शन को देखने के लिए वरिष्ठ नेता और सैनिक मौजूद थे.

टैंक के प्रदर्शन को देखकर एक अधिकारी ने इसे स्लग यानी सुस्त बताया. युद्ध मंत्री लार्ड किचन को लगा कि ये एक "खिलौना" है, जिससे कोई बड़ा फ़ायदा नहीं होगा.

जनरल बुल्टर की तरफ़ से सबसे महत्वपूर्ण राय आई. उन्होंने कहा, "ये हमें कब तक मिल जाएगा?"

विले बताते हैं कि टैंक के इस्तेमाल पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना साफ़ है कि इस मशीन को देखकर जर्मन सैनिक दहशत से भर गए.

इस मशीन से ब्रिटेन में आम नागरिकों का हौसला भी बढ़ा और जल्द ही टैंकों को एक फ़िल्म स्टार का रुतबा मिल गया.

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