क्या जूलिया गिलार्ड को अब ग़ुस्सा नहीं आता?

  • 27 फरवरी 2014
जूलिया गिलार्ड, ऑस्ट्रेलिया इमेज कॉपीरइट Getty

ऑस्ट्रेलिया की 27वीं प्रधानमंत्री बनने के बाद पद छोड़ते समय जूलिया गिलार्ड ने खुले तौर पर 'पागलपन की हद तक ग़ुस्से' का इज़हार किया था. वो इस बात को लेकर ग़ुस्सा थीं कि उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए तीखे लिंगभेद का सामना करना पड़ा था.

लेकिन अब पद छोड़ने के छह महीने बाद उनका ग़ुस्सा कम हुआ है या बढ़ा है?

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पिछले साल जून के बाद से गिलार्ड सार्वजनिक जगहों पर बहुत कम नज़र आईं हैं. जून में वो लेबर पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री का चुनाव हार गई थीं. वे उसी आदमी से चुनाव हार गईं जिसे तक़रीबन तीन साल पहले बुरी तरह हराया था.

जूलिया की जगह लेने वाले केविन रड उसके बाद हुए आम चुनावों में लिबरल पार्टी के टोनी एबट से चुनाव हार गए.

लैंगिक भेदभाव

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Image caption जूलिया गिलार्ड भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ.

कार्बन टैक्स पर नीति बदलने, बजट अधिभार और शरणार्थी नीति पर गिलार्ड की आलोचना होना स्वाभाविक था लेकिन जिस लिंगभेद से वो अपने कार्यकाल के दौरान परेशान रहीं वो सामान्य बात नहीं है.

जूलिया ने कहा था, "मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ कि अगली महिला प्रधानमंत्री और उससे अगली महिला प्रधानमंत्री के लिए इस पद की ज़िम्मेदारी संभालना आसान होगा."

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उन्होंने कहा था, "हाँ, हमारे देश में लिंगभेद के मुद्दे पर काम करने की ज़रूरत थी, ख़ुद मुझे इस पर काम करना था लेकिन मैं समझती हूँ कि यह सब एक यात्रा का हिस्सा है, जिसमें भविष्य में राजनीति में महिलाओं और पुरुषों के साथ ज़्यादा बराबरी का बर्ताव होगा."

यह सब सुनने में साफ़-सुथरा लगता है लेकिन जूलिया से और उसके बारे में जो ऊल-जुलूल बातें कहीं गईं उन्हें भी याद करना चाहिए.

नेता भी, महिला भी

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Image caption जूलिया गिलार्ड अब ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन के लिए काम कर रही हैं.

जूलिया गिलार्ड एक आम महत्वाकांक्षी नेता नहीं थीं जो बाद में प्रधानमंत्री बनीं. वो एक महिला भी थीं जिसका कोई बच्चा नहीं है. एक विपक्षी नेता के शब्दों में 'जानबूझकर बनी बांझ'. ऑस्ट्रेलियन एग्रीकल्चर कंपनी के प्रमुख के शब्दों में, 'एक अनुत्पादक बूढ़ी गाय'.

मैंने कई देशों में राजनीतिक पत्रकारिता की है लेकिन कहीं और इस स्तर के नेताओं के मुँह से ऐसे बयान नहीं सुने. लेकिन जूलिया गिलार्ड ऐसा नहीं मानतीं. वो मानती हैं, "आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के रूप में मेरे साथ जो हुआ, दुनिया के दूसरी महिला नेताओं के साथ भी वही होता है."

लेकिन गिलार्ड के साथ जो हुआ वो सीमा पार कर गया. याद करिए गिलार्ड का वो इंटरव्यू जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री से बार-बार पूछा जा रहा था कि क्या उनके पुरुष सहयोगी समलैंगिक हैं. वो मुस्करा कर इसका सामना करती रहीं.

जूलिया गिलार्ड से हमने वाशिंगटन डीसी में बात की. जूलिया ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजूकेशन (जीपीई) के निदेशक मंडल के प्रमुख की कु्र्सी संभालने जा रही है. उनका ऑफ़िस व्हाइट हाउस से ज़्यादा दूर नहीं है.

नई भूमिका

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Image caption जूलिया गिलार्ड मानती हैं कि विकासशील देशों में लड़कियों को लेकर जो 'सामाजिक मान्यताएँ' हैं उन्हें बदला जा सकता है.

जूलिया गिलार्ड की नई भूमिका जीपीई के मुख्य फ़ंड-रेज़र की होगी. यह संस्था अपने परिचय में कहती है, "दुनिया के सबसे ग़रीब देशों के बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए एकमात्र बहुमुखी साझेदारी." यह संस्था 60 विकासशील देशों में कई अरब डॉलर की सहायता उपलब्ध कराती है.

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लेकिन इस काम में कई मुश्किलें भी हैं. अभी पिछले ही महीने यूनेस्को ने चेतावनी दी कि अगले साल तक दुनिया के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा देने का संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा.

यूनेस्को के अनुसार वर्तमान दर से इस लक्ष्य को पाने में 70 से भी ज़्यादा साल लगेंगे.

लेकिन गिलार्ड इसे लेकर विचलित नहीं हैं. जिन देशों में भ्रष्टाचार की संस्कृति जड़ें जमा चुकी हैं और लड़कियों को स्कूल भेजने को लेकर काफ़ी भेदभाव है उन देशों के बारे में गिलार्ड काफ़ी आशावान हैं. वे कहती हैं, 'सामाजिक मान्यताओं' को बदला जा सकता है. वो कहती हैं एक उपाय यह हो सकता है कि उन्हीं परिवारों को पैसा दिया जाए जो अपने बच्चों को स्कूल जाने दें.

बजट का संकट

Image caption गिलार्ड के सामने फौरी संकट ग्लोबल एजुकेशन के लिए आर्थिक मदद जुटाने की है.

यह भी मुद्दा है कि इसके लिए पैसा आएगा कहाँ से. वे कहती हैं, शिक्षा के लिए विदेशी सहायता राशि पाना मुश्किल हो रहा है.

उनकी पहली परीक्षा भी जल्द होने वाली है जब वो जीपीई के बजट सत्र में दानदाता देशों से साढ़े आठ अरब डॉलर की सालाना सहायता राशि की मांग करेंगी.

वो इस बात से इनकार करती हैं कि उनका उत्साह ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री के रूप में हुए अनुभव की वजह से ठंडा पड़ जाएगा.

प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की सहायता राशि को उम्मीद के मुताबिक़ नहीं बढ़ा पाई थीं. वे कहती हैं, "हमें बजट से जुड़े कुछ कड़े फ़ैसले लेने पड़े थे.."

गिलार्ड को सामने नई चुनौती है. उन्हें पाँच करोड़ सत्तर लाख ऐसे बच्चों तक शिक्षा पहुँचानी है जो स्कूल नहीं जाते. इसके अलावा 25 करोड़ ऐसे बच्चे भी हैं जिनकी थोड़ी बहुत पहुँच स्कूलों तक है लेकिन वे पढ़ना या गिनती करना नहीं सीख पाते.

और इसी से अब तय होगा कि वो कितनी सफल रही हैं ?

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