यूक्रेन संकट: क्या रूस का कोई दावा बनता है?

  • 6 मार्च 2014
यूक्रेन, सैनिक

रूस का कहना है कि वह यूक्रेन में इसलिए है ताकि अपने नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा कर सके. लेकिन रूस के पास क्राईमिया में सैन्य बल भेजने का क्या स्पष्टीकरण है?

क्राईमिया पर रूस का क्या दावा है?

रूस और क्राईमिया के ऐतिहासिक संबंध 18वीं सदी में कैथरीन महान के वक़्त तक जाते हैं, तब रूस ने दक्षिणी यूक्रेन और क्राईमिया पर जीत हासिल की थी और इन हिस्सों को ऑटोमन साम्राज्य से छीन लिया था. साल 1954 में तब के सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने यूक्रेन को क्राईमिया तोहफ़े में दिया था, ख्रुश्चेव ख़ुद आधे यूक्रेनियाई थे.

इससे 10 साल पहले, जोसेफ़ स्तालिन ने क्राईमिया की पूरी तातार आबादी से करीब 300,000 लोगों को, हिटलर के जर्मनी के साथ सहयोग की वजह से निर्वासित कर दिया था.

ख़्रश्चेव के दौर में रूस ने यूक्रेन को क्राईमिया दिया था.

जब साल 1991 में यूक्रेन आज़ाद हुआ तो तब रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन इस बात पर राज़ी हो गए कि क्राईमिया यूक्रेन का हिस्सा बना रहे, रूस का ब्लैक सी फ़्लीट लीज़ के तहत सेवास्टोपोल में रहे. वह लीज़ कुछ साल पहले ही वर्ष 2042 तक बढ़ा दी गई है.

रूस की कार्रवाई का कोई क़ानूनी आधार है?

साल 1994 के बूडापेस्ट समझौते के तहत रूस, अमरीका, यूक्रेन और ब्रिटेन इस बात पर राज़ी हुए कि कोई भी देश यूक्रेन की क्षेत्रीय संप्रुभता और राजनीतिक स्वतंत्रता के ख़िलाफ़ ताकत का इस्तेमाल नहीं करेगा. ये देश इस बात पर भी राज़ी हुए थे कि यूक्रेन पर आर्थिक दबाव नहीं डाला जाएगा.

रूस का कहना है कि उसने रूसी नागरिकों की रक्षा के लिए सैन्य बल भेजे.

क्राईमिया में रूसी मूल के लोग बहुसंख्यक हैं. रूस का ब्लैक सी फ़्लीट सेवास्टोपोल में है, जहां कि ज़्यादातर आबादी के पास रूसी पासपोर्ट है. लेकिन अमरीका का कहना है कि रूस के क़दम का कोई क़ानूनी आधार नहीं है. जी-7 समूह के देश भी इससे सहमत हैं.

यूक्रेन से समझौते के तहत रूस अपने 25,000 नागरिक क्राईमियाई प्रायद्वीप पर रख सकता है, अभी उसके 16,000 नागरिक वहां हैं. लेकिन इन सैनिकों को अपने सैनिक अड्डे पर रहना होता है. जबकि अभी ये सैनिक पूरे क्राईमिया में फैले हुए हैं.

रूस का क्या जवाब है?

शुरुआत में रूस ने इस बात से इनकार किया कि उसने बूडापेस्ट समझौते का उल्लंघन किया. लेकिन अब रूस का कहना है कि 'उग्र चरमपंथियों' के सत्ता में आने के बाद से यूक्रेन में हालात बिगड़ते जा रहे हैं जिससे क्राईमिया और अन्य दक्षिण-पूर्वी इलाकों के नागरिकों के जीवन और सुरक्षा पर असर पड़ रहा है.

रूस का ये भी कहना है कि नई सरकार ने 21 फ़रवरी के उस समझौते को भी 'चल दिया' जिस पर पूर्व राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच ने दस्तख़त किए थे.

21 फ़रवरी के समझौते का क्या हुआ?

जब तत्कालीन राष्ट्रपति यानुकोविच राजधानी कीएफ़ से गए तब विपक्ष सत्ता पर काबिज़ हो गया. लेकिन उस हफ़्ते की शुरुआत में दोनों पक्ष संकट ख़त्म करने के लिए साल 2004 के संविधान को फिर से लागू करने और राष्ट्रपति की शक्तियां कम करने पर सहमत हो गए थे.

उस समझौते पर यानुकोविच और विपक्षी नेताओं के अलावा यूरोपीय संघ के तीन विदेश मंत्रियों ने भी दस्तख़त किए थे. लेकिन घटनाक्रम इतनी तेज़ी से बदला कि यह समझौता पुराना पड़ गया. इस समझौते पर तब वहां मौजूद रूसी अधिकारी ने दस्तख़त नहीं किए थे.

'उग्र चरमपंथियों' की क्या भूमिका है?

रूस लगातार ये शिकायत करता रहा है कि कीएफ़ में हो रहे प्रदर्शनों पर दक्षिणपंथी गुट हावी है, जो नई सरकार में हिस्सेदार हो गए हैं, जिसमें 'स्पष्ट नाज़ी' भी हैं.

दो समूहों, राइट सेक्टर और स्वोबोदा (स्वतंत्रता) का बार-बार ज़िक्र होता है और दूसरे विश्व युद्ध के वक़्त के राष्ट्रवादी स्टेपान बांडेरा का भी नाम लिया जाता है.

बांडेरा को कुछ लोग हीरो की तरह देखते हैं वहीं कुछ लोग उन पर नाज़ियों से सहयोग करने का आरोप लगाते हैं.

कीएफ़ और दूसरे शहरों से समर्थन हासिल करने वाले प्रदर्शनों में दक्षिणपंथियों का हिस्सा बहुत छोटा था. हालांकि वह बेहद हिंसक प्रदर्शनों में अक्सर शामिल पाए गए थे.

राष्ट्रवादी स्वोबोदा पार्टी को सरकार में चार पद मिले हैं. ओलेक्ज़ेंडर सिच उप प्रधानमंत्री हैं और ओलेह मखनित्स्की कार्यकारी मुख्य अभियोजक हैं. उनक पास कृषि और पर्यावरण मंत्रालय भी हैं. इसके नेता पर यहूदी विरोधी होने के आरोप लगते हैं और वो सरकार में नहीं हैं.

प्रदर्शनों की अगुवाई करने वाले आंद्री पारूबी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष बन गए हैं. स्वोबोदा के एक सह संस्थापक दिमेत्रो यारोश हैं जो पारूबी के सहायक हैं और जिन्हें यानुकोविच 'चरमपंथी' बताते थे.

क्या सरकार रूस विरोधी है?

कुछ हद तक समस्या इसमें भी है कि बीते हफ़्ते जिस सरकार ने शपथ ली, उसका यूक्रेन के पूर्वी तट से ज़्यादा संबंध नहीं है, इस इलाके को रूस समर्थक माना जाता है.

इस सरकार ने जो शुरुआती क़दम उठाए, उनमें से एक साल 2012 के उस क़ानून को हटाना था जिसके तहत रूसी को आधिकारिक क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था. इस क़दम की पूरे यूक्रेन में आलोचना हुई थी.

क्या क्राईमिया में रूसी नागरिक ख़तरे में थे?

बीते हफ़्ते क्राईमिया की राजधानी सिम्फ़ेरोपोल में रूस समर्थक और यूक्रेन के नए नेताओं के समर्थक संसद के बाहर भिड़ गए थे.

जब ख़बरें आईं कि रूसी सैन्य बल पूरे क्राईमिया में तैनात हो गए हैं, तब रूस ने यूक्रेन पर आरोप लगाया कि वो अस्थिरता पैदा करने के लिए क्राईमिया में सशस्त्र लोगों को भेज रहा है. हालांकि क्राईमिया रूस के हाथों में था.

क्या यूक्रेन के दूसरे शहरों पर असर पड़ेगा?

पूर्वी यूक्रेन के दोनेत्स्क और खारकिएफ़ में हालात की तुलना क्राईमिया की स्थिति से की जा सकती है. इन दोनों रूसी बहुल इलाकों में रूस के समर्थकों ने प्रदर्शन किए हैं. दोनेत्स्क में क्षेत्रीय प्रशासन की इमारत में सोमवार को करीब 100 लोग घुस गए.

संवाददाताओं ने बताया है कि किस तरह दोनेत्स्क में प्रदर्शनकारी नारे लगा रहे थे, "पुतिन, आओ". रूस के सैन्य बल सीमा के उस पार तैनात हैं और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सेना को 'यूक्रेन के क्षेत्र' में भेजने की बात कह चुके हैं, हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि कहां?

क्या कोई 'मानवीय संकट' है?

रूस के मीडिया में इस तरह की अपुष्ट ख़बरें आई हैं कि इस साल की शुरुआत से अब तक 675,000 यूक्रेनियाई सीमापार कर रूस में दाख़िल हुए हैं. लेकिन एक रूसी टीवी चैनल की ख़बर में कहा गया कि ये 'मानवीय संकट' पोलैंड की सीमा से जुड़ा है जिसका यूक्रेन के संकट से कोई लेना-देना नहीं है.

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