क्या यूक्रेन में दखल क़ानूनी है?

  • 5 मार्च 2014
क्राईमिया में सेना Image copyright AP

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की यूक्रेन पर बुलाई बैठक में रूस ने यूक्रेन के अपदस्थ राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का ख़त पेश किया.

रूस का कहना है कि रूसी सैनिक यूक्रेन अपनी मर्ज़ी से नहीं बल्कि राष्ट्रपति के बुलावे पर गए हैं.

जबकि अमरीका सहित पश्चिमी देशों ने रूस के स्पष्टीकरण को बेकार करार दिया.

लेकिन क्या ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी देश ने किसी दूसरे में सैन्य हस्तक्षेप के लिए इस तरह का तर्क दिया है.

डेनवेर विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रोफ़ेसर वेद नंदा कहते हैं, "खुद अमरीका ग्रेनाडा, पनामा, डोमिनिकन रिपब्लिक में सैन्य हस्तक्षेप कर चुका है. इस तरह के सैन्य हस्तक्षेप के लिए अमरीका ने कहा कि हमें वहाँ की सरकार ने बुलाया है इसलिए हम गए हैं. या फिर अमरीका ने यह कहा कि वहाँ मौजूद हमारे नागरिकों को ख़तरा है और उन्हें बचाने के लिए हमने यह क़दम उठाया है."

क़ानून रूप से वैध नहीं

Image copyright REUTERS

लेकिन क्या किसी एक देश का किसी दूसरे देश में सैन्य हस्तक्षेप करना अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के हिसाब से सही है.

यही सवाल जब हमने प्रोफ़ेसर नंदा कहते हैं, "इस तरह के तर्कों के साथ सैन्य हस्तक्षेप करना अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अनुसार वैध नहीं है. किसी देश में सैन्य हस्तक्षेप करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति लेनी होगी.

प्रोफ़ेसर नंदा ने स्पष्ट किया कि अभी हाल में एक नया अंतरराष्ट्रीय क़ानून बना है, 'रक्षा की जिम्मेदारी' का क़ानून. अगर कोई सरकार या राज्य वहाँ के नागरिकों की रक्षा नहीं करती तो सुरक्षा परिषद वहाँ हस्तक्षेप करेगी. लेकिन यह हस्तक्षेप सुरक्षा परिषद ही कर सकती है न कि कोई एक देश.

सोवियत संघ का जब विघटन हुआ तो उसमें यह समझौता शामिल था कि जो देश रूस से अलग हुए उनके पास परमाणु हथियार नहीं होंगे. वो अपने परमाणु हथियार रूस को सौंप देंगे.

रूस और अमरीका यूक्रेन को लेकर जिस तरह से आमने-सामने आते दिख रहे हैं ऐसे में यह सवाल उठता है कि इस स्थिति से शांतिपूर्ण तरीके से कैसे निकला जा सकता है.

प्रोफ़ेसर नंदा कहते हैं, "यूक्रेन के मौजूदा हालात से जो कूटनीतिक संकट उत्पन्न हुआ है उससे निकलने के लिए यूरोप, रूस और नेटो की बातचीत से रास्ता निकल सकता है."

प्रोफ़ेसर नंदा कहते हैं, "इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका एंगेला मैर्केल की है. उनकी पुतिन से बात हुई है. उन्होंने कहा है कि एक आयोग बने जो इस समस्या से निकलने का रास्ता सुझाए और दोनों देशों के बीच समझौता हो सके."

वो बताते हैं कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जर्मन भाषा बोल लेते हैं. उन्हें लगता है कि इस समय मैर्केल ही ऐसी नेता जिसके साथ भरोसे के साथ बातचीत की जा सकती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार