ये हैं पाकिस्तान के 'शरलॉक होम्स'!

  • 6 मार्च 2014
जमील यूसुफ़, कराची, कारोबारी
Image caption यूसुफ़ के दौर में सिटीज़न पुलिस लायज़न कमेटी ने अपहरण के केस सुलझाने में अहम भूमिका निभाई.

पाकिस्तान के कराची के व्यापारी जमील यूसुफ़ अपहरण के मामले हल करने के विशेषज्ञ बन गए हैं. लगभग 25 साल पहले अपहरण के मामले हल करने में स्वेच्छा से पुलिस की मदद करने से यह सिलसिला शुरू हुआ.

जमील यूसुफ़ के अनुसार वह अब तक वह लगभग 100 से ज़्यादा अपहरण के बड़े मामले हल कर चुके हैं जबकि कुल मिलाकर उन्होंने अपहरण के 600 मामले हल करने में मदद की है.

उनका दावा है कि उन्होंने कराची के कोर कमांडर के भतीजे और भतीजी के अपहरण के मामले को भी सुलझाया था. और अमरीकी पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारों का भी पता लगाने में मदद की थी. डेनियल पर्ल की साल 2002 में कराची में हत्या हो गई थी.

'पुलिस में अधिक विश्वास नहीं'

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Image caption पाकिस्तान में 1980 के दशक के आखिर में अपहरण के मामलों में तेज़ी आई थी

लगभग 80 के दशक के आखिर में पाकिस्तान में फिरौती के लिए अपहरण के अपराध तेज़ी से बढ़ रहे थे.

इन अपहरणों से व्यापारी समुदाय सबसे अधिक परेशान था. क्योंकि सबसे अधिक अपहरण बड़े व्यापारियों और उनके बच्चों के हो रहे थे. कभी-कभी एक दिन में दो या तीन बड़े लोगों के अपहरण हो जाते थे.

जमील यूसुफ़ बताते हैं, "भारतीय उपमहाद्वीप में आम जनता का पुलिस में अधिक विश्वास नहीं है. दोनों में एक दूरी है. इसी दूरी को पाटने के लिए पाकिस्तान सरकार ने आम नागरिकों की एक संस्था, सिटीज़न पुलिस लायज़न कमेटी, बनाई थी. सिंध के गवर्नर ने मुझे इसका अध्यक्ष चुना था."

'संस्था सफल हुई'

इस संस्था का काम अपराध की शिकायत करने आए लोगों और पुलिस के बीच तालमेल बैठाना और दोनों पक्षों के लिए स्थिति की समीक्षा करना था. लगभग छह महीने में ही यह संस्था इतनी सफल हुई कि न केवल लोगों से बल्कि पुलिस से भी तारीफ़ मिलने लगी.

जमील यूसुफ़ बताते हैं कि अपहरण के मामले हल करने के लिए उन्होंने लोगों को फ़िरौती के लिए आए फ़ोन को रिकॉर्ड करने के लिए प्रोत्साहित किया. इसके लिए लोगों में रिकॉर्डर भी बांटे गए. इन रिकॉर्डिंग से अपहरण के मामलों को हल करने में बहुत मदद मिली.

जमील यूसुफ़ ने बताया, "हम फिरौती के लिए फोन करने वालों की आवाज़ का मिलान करते थे. वह कैसे बोलते हैं, कहां रुकते हैं, उनकी सांस की आवाज़ कैसी है, इन सब बातों से हम यह पता लगाते थे कि अपराधी क्या सोच रहा है और उसकी मानसिकता कैसी है."

वो कहते हैं, "इससे यह भी पता लगाने में मदद मिली कि अपहरण करने वालों के कितने गुट हैं? वो कितने समय तक लोगों को अपने कब्ज़े में रखते हैं और लगभग कितनी फिरौती मांगते हैं."

'परिवार को भी ख़तरे में डाला'

जमील यूसुफ़ बताते हैं, "हमने पुलिस स्टेशनों को अपराध की शिकायत करने आने वालों के लिए अधिक सुविधाजनक बनाया. हम लोग वहां बैठने लगे."

उन्होंने कहा, "उन दिनों लोग अपहरण के अपराध में नए थे. उन्हें यह नहीं पता था कि एक संगठन उनके कामों पर इतनी बारीकी से नज़र रखे हुए है. किसी का अपहरण करना उनके लिए आसान था लेकिन फ़िरौती की रकम लेने आते हुए वे बहुत चौकन्ने रहते थे."

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Image caption इन अपहरणों से व्यापारी समुदाय सबसे अधिक त्रस्त था

वह बताते हैं, "मुझे लगा कि उन पर निगरानी के लिए मेरे पास लोग नहीं हैं. मैंने इस काम के लिए अपने परिवार वालों की भी मदद ली."

यूसुफ़ कहते हैं, "मैंने अपनी पत्नी को भी इस काम में शामिल किया और कई बार मेरी बेटी एक मोटरसाइकल पर पीछे बैठ कर अपराधियों का पीछा कर रही होती थी. हिजाब के अंदर उसके पास एक माइक्रोफ़ोन रहता था, जिससे वह हमें बताती थी कि कितने अपराधी हैं, उनके पास कितने हथियार हैं, कार का नंबर क्या है, वो कहां जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं."

उनका कहना है, "मैंने धीरे-धीरे काम को भी छोड़ा. समाजसेवा ऐसी ही है. आप को चस्का लग जाए तो छूटना मुश्किल होता है. मैंने इस काम के लिए अपने परिवार को भी ख़तरे में डाला. "

यूसुफ़ बताते हैं, "डेनियल पर्ल का अपहरण इतना हाई प्रोफ़ाइल मामला था. एफ़बीआई भी शामिल थी. बाद में थोड़ी दिक्कत हुई लेकिन ये काम कर के मज़ा आया."

डेनियल पर्ल के हत्यारों को पकड़वाने में मदद करने के बाद उन्हें धन्यवाद देने अमरीका के सहायक विदेश मंत्री भी आए थे. इसके बाद यूसुफ़ को सिटीज़न पुलिस लायज़न कमेटी से हटा दिया गया.

वो बताते हैं, "एजेंसियों को लगा कि सिर्फ़ मुझे ही धन्यवाद क्यों दिया गया. उन्हें थोड़ी ईर्ष्या हुई. लेकिन आज भी पाकितान के पुलिस अधिकारियों से मेरे रिश्ते बहुत अच्छे हैं. वह मेरी बहुत इज़्ज़त करते हैं. मैं अब भी पुलिस सुधारों के लिए काम कर रहा हूं."

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