100 साल पहलेः फ़ौजी पति को भेजे बच्चों के बाल

  • 12 मार्च 2014
विश्वयुद्ध के कब्रिस्तान Image copyright AP

पहले विश्व युद्ध की शताब्दी के मौक़े पर युद्ध में हिस्सा लेने वाले सैनिकों की व्यक्तिगत डायरियाँ, पत्र, तस्वीरें और यादें धूलभरी अटारियों और अरसों से बंद दराज़ों से निकलकर दुनिया के सामने आ रही हैं. ये विश्वयुद्ध के प्रति एक अलग ही नज़रिया पेश कर रही हैं.

राष्ट्रीय अभिलेखागार ने युद्ध डायरियों के 15 लाख पन्नों को डिजीटल करने का जटिल काम शुरू कर दिया है. इनमें से बहुत से अधिकारिक युद्ध डायरियों के पन्ने हैं जिनमें ब्रितानी सैनिकों की ज़िंदगियां दर्ज़ हैं.

इस प्रोजेक्ट के शुरू होने पर बीबीसी ने अपने पाठकों से अपने पास सुरक्षित दस्तावेज़ों के बारे में बताने का आग्रह किया था. बीबीसी को भारी मात्रा में सामग्री प्राप्त हुई जिसमें विविध युद्ध डायरियाँ, खाइयों में सैनिकों के मुश्किल जीवन की यादें, भावुक कर देने वाले पत्र और सैनिकों की कब्रों की तस्वीरें शामिल हैं.

इंपीरियल युद्ध संग्रहालय से जुड़े ल्यूक स्मिथ कहते हैं कि ऐसी सामग्री लोगों को सीधे उन लोगों से जोड़ देती है जो उस वक़्त युद्ध का हिस्सा थे. संग्रहालय की महत्वकांक्षी परियोजना 'लाइव्स ऑफ़ द फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर' के ज़रिए कोई भी उन लोगों से जुड़े दस्तावेज़ अपलोड कर सकता है जो युद्ध के दौरान सीमाओं पर थे या फिर देश में ही युद्ध संबंधी कार्यों में जुटे थे.

छोटी डायरी में बड़ी यादें

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Image caption इस बेहद छोटी डायरी के ज़रिए एक पोती ने अपने सैनिक दादा की ज़िंदगी के दर्द को समझा.

छोटे-छोटे दस्तावेज़ में भी बेहद गहरी यादें सिमटी हो सकती हैं. साल 2001 में मारिया मैकपार्टिन को अपने दादा जेम्स मैकपार्टिन की 1918 में लिखी गई डायरी मिली थी. मारिया अपने दादा से कभी नहीं मिली थीं. उन्हें ये डायरी एक बंद पड़े दराज़ में रखे बटुए से मिली थी.

मारिया कहती हैं कि इस बेहद छोटी डायरी में सिर्फ़ नौ ही लेख दर्ज़ थे. लेकिन इसे पढ़ने के बाद मैंने अपने दादा के साथ रिश्ता महसूस किया और उनके दर्द को समझा.

वह कहती हैं कि जेम्स को ज़हरीली गैस के कारण एक साल अस्पताल में बिताना पड़ा था. इस छोटी सी डायरी ने उनकी पूरी कहानी बयाँ कर दी.

केंट के सिडकप में रहने वाले माइक ओ ब्रायन उनकी 91 वर्षीय सास जर्माइन लुइस बीबीसी का एक कार्यक्रम देखने के बाद युद्ध की यादगारों को बाहर लाने के लिए प्रेरित हुईं. वह अपने बेडरूम में पिछले 60 सालों से रखी यादगारों को बाहर निकाल लाईं.

काग़ज़ों ने बचाई जान

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जर्माइन के ससुर जॉन वाल ने फ्रांस के नोव शैपेल के युद्ध में हिस्सा लिया था. वह युद्ध में घायल हो गए थे लेकिन उनकी शर्ट की जेब में रखी डायरी और काग़ज़ों ने उनकी जान बचा ली थी. जरमाइन के पास मौज़ूद डायरी में गोली से हुए छेद देखे जा सकते हैं.

दस्तावेज़ों में वॉल को क्रिसमस के मौक़े पर भेजा गया एक कार्ड भी शामिल है. इस कार्ड में उनकी पत्नी ने बच्चों के सिर के बाल भी रख भेजे हैं.

हैंपशायर के फेयरहैम में रहने वाले एंडी मार्शल को भी दस्तावेज़ों का ऐसा ही ख़जाना हाथ लगा. कुछ सालों पहले उन्होंने अपने परिवार के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की. उन्हें एक फ़ोल्डर मिला जो उनकी पत्नी की दादी का था.

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इसमें उनकी पत्नी के परदादा रॉबर्ट मॉरिस मैंस से जुड़े दस्तावेज़ मिले जो ऑर्मी सर्विस कॉर्प्स से जुड़े रहे थे. इसमें परिजनों को लिखे उनके पत्र के साथ उनकी मौत पर सेना की ओर से भेजी गई उनकी कब्र की तस्वीर भी थी.

उनकी कब्र के साथ भेजे गए पत्र में कब्र के स्थान के बारे में जानकारी दी गई है. एंडी कहते हैं कि इस पत्र को पढ़कर मैं सोच रहा था कि परिवार को जब यह मैंस की मौत की जानकारी मिली होगी तो उनपर क्या गुजरी होगी.

युद्ध की निरर्थकता

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बकिंघमशायर के इयान कारमैन ने जब अपनी माँ की मौत के बाद उनके दस्तावेज़ खंगाले तो उन्हें अपनी माँ के चाचा की डायरी मिली. फ़ैरल युद्ध विरोधी थे इसलिए वह ज़मीनी लड़ाई नहीं लड़ रहे थे. वह चिकित्सक थे और उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

उनकी डायरी 1915 में शुरू होती है और उसमें छह महीनों का विवरण दर्ज है. उत्तरी फ्रांस में पहुँचने के बाद जैक फ़ैरल को अस्पताल बनाने की ज़िम्मेदारी मिली थी. जैक जो अस्पताल बना रहे थे उस पर जर्मन सेनाओं ने बमबारी कर दी थी और उन्हें दोबारा अस्पताल बनाना पड़ा था.

जैक ने अपनी डायरी में युद्ध की निरर्थकता के बारे में लिखा है. अपनी डायरी में 20 अप्रैल 1915 को जैक फ़ैरल लिखते हैं, "यह कई दिनों जितना लंबा दिन है. जर्मन 17 इंच के बम गिरा रहे हैं. हम एक तैयार वॉर्ड में जा रहे हैं, लेकिन जैसे ही शुरू करते हैं नागरिकों के घायल होने की ख़बर आ जाती है और घायल नागरिक पैदल ही इलाज के लिए पहुँच रहे हैं. सारा दिन और सारी रात घायलों के आने का सिलसिला चलता रहा. हमने 30 बाहरी रोगी देखे और 12 मरीज़ों को भर्ती करना पड़ा. 17 इंच के बम हर 15 मिनट में गिर रहे हैं और बमों के छर्रे लगातार गिर रहे हैं."

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