क्या अफ़ग़ानिस्तान को जीतना वाकई असंभव है?

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अफ़गानिस्तान से सोवियत सैनिकों को वापस गए 25 साल हो चुके हैं. इस साल के अंत तक अमरीका अपने अधिकांश सैनिकों को वहां से हटाने वाला है.

इसलिए अब सवाल यह उठता है कि अफ़ग़ानिस्तान में चले इस सैन्य अभियान और ऐसे ही दूसरे अभियानों से हमें क्या सीखने को मिला.

पिछले रमजान में मैं कंधार के बाहर उस घर को देखने गया था जिसमें राष्ट्रपति हामिद पले-बढ़े थे. मैं राष्ट्रपति के भाई महमूद करज़ई का मेहमान था.

उनके गाँव जिसका नाम कर्ज है, में घूमते वक़्त उन्होंने मुझसे कहा, "यह जगह अब पहचान में ही नहीं आती. इस मस्जिद के पास मैं हामिद के साथ खेला करता था. लेकिन हमारा घर कहाँ है.''

इस पर ड्राइवर ने गाड़ी रोकी और महमूद से पूछा, 'यह है क्या?' महमूद ने कहा, "यह नहीं हो सकता."

हम एक सूखे कीचड़ वाले समतल खेत में पहुँचते हैं, जो मिट्टी की ईंटों से बने घरों से घिरा हुआ है. महमूद जब एक छोटे से टीले पर चढ़ते हैं तो उनके सुरक्षाकर्मी आसपास फैल जाते हैं.

खाली जगह की ओर इशारा करते हुए वो कहते हैं, ''ड्राइवर सही कह रहा था. यही हमारा घर है.''

मैंने पूछा, "क्या हुआ था?" वो कहते हैं, "रूसियों ने ये किया."

मैंने पूछा, "क्यों?"

उन्होंने बताया, ''मुजाहिदीन के जो भी कबीले प्रभावशाली थे उनके घर ढहा दिए गए. ये वही घर है जहाँ हमारे चचरे भाई-बहन रहते थे. उस रात जब सोवियत गवर्नर ने हमारे घरों को ध्वस्त किया, उन लोगों ने सबको एक लाइन में खड़ा किया और गोली मार दी. हर एक की मौत हो गई.''

सोवियत सेनाएं

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अब अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेनाओं के जाने की 25वीं सालगिरह है. और शायद यह अमरीकी और सोवियत हस्तक्षेप की तुलना करने का अच्छा अवसर है.

ऊपरी तौर पर ये दोनों हस्तक्षेप पूरी तरह अलग थे. सोवियत सेनाएं अपने सोवियत साम्राज्य का विस्तार करने आई थीं. जबकि पश्चिमी सेनाएं, हमें बताया जाता है, 9/11 (सितंबर, 2011) के हमले के बाद चरमपंथ को जड़ से उखाड़ने और लोकतंत्र की बहाली के लिए आई थीं.

इसके बाद भी दोनों में कई असुविधाजनक समानताएं हैं. रूसी और अमरीकियों ने सोचा था कि वो आसानी से घुसेंगे, एक मित्रवत सरकार बनाएंगे और साल भर के अंदर लौट आएंगे. लेकिन दोनों देश एक लंबे और महंगे युद्ध के दलदल में फंस गए और अंत में दोनों वापस चले गए.

सोवियत युद्ध अधिक रक्तरंजित था, उसमें क़रीब 15 लाख लोग मारे गए थे. वहीं अमरीका और उसके सहयोगी देशों के हस्तक्षेप में अब तक क़रीब एक लाख लोगों के मारे जाने का अनुमान है.

लेकिन हालिया युद्ध अधिक खर्चीला है. युद्ध पर सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान में एक साल में क़रीब दो अरब डॉलर खर्च किए थे. वहीं अमरीका अब तक 700 अरब डॉलर खर्च कर चुका है.

हथियारों की आपूर्ति

यकीनन इस बार का हासिल थोड़ा कम है. आज से 25 साल पहले सोवियतों ने एक अपेक्षाकृत थोड़ी स्थिर और सोवियत समर्थक नजीबुल्लाह की सरकार बनवाकर देश छोड़ दिया था. लेकिन यह सरकार चार साल बाद तब गिर गई जब सोवियत संघ ने हथियारों की आपूर्ति बंद कर दी थी.

लेकिन अल-क़ायदा को ख़त्म करने और तालिबान को बाहर निकालने के लिए पश्चिमी देशों को अफ़ग़ानिस्तान गए 13 साल हो चुके हैं और अब अमरीका और उसके सहयोगी ख़ुद को वहां से बगैर कोई लक्ष्य हासिल किए बिना निकलते हुए पा रहे हैं.

अल-क़ायदा का बचा हुआ संगठन पाकिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में या कहीं और चला गया है. जबकि तालिबान का दक्षिणी अफ़गानिस्तान के क़रीब 70 फ़ीसदी हिस्से पर कब्ज़ा है.

इस साल के अंत में अमरीका और ब्रिटेन अफ़ग़ानिस्तान से जब अपने अधिकांश सैनिकों को वापस बुला लेंगे तो तालिबान का कब्ज़ा और बढ़ जाएगा.

इस तरह के युद्ध की एक और मिसाल है. पिछले पांच साल से मैं सन् 1839-1842 के बीच हुए पहले एंग्लो-अफ़ग़ान युद्ध का इतिहास लिख रहा हूं.

यह किताब पश्चिम के पूर्व में अब तक के सबसे बड़े सैनिक अपमान की कहानी कहती है. उस समय दुनिया के कथित रूप से सबसे शक्तिशाली देश की सेना को कबीलाई लड़ाकों ने बुरी तरह से हरा दिया था जबकि उनके पास ढंग के हथियार भी नहीं थे.

6 जनवरी 1842 को काबुल से पीछे हटते हुए 18,500 सैनिक, जो कि ब्रिटिश छावनी से निकले थे, उनमें से केवल एक सहायक चिकित्सक डॉक्टर ब्रायडन ही छह दिन बाद जलालाबाद पहुंच पाए थे.

दो युद्धों के बीच समानताएं

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इन दोनों युद्धों के बीच की समानताएं हैरान कर देने वालीं हैं. एक सी भाषा बोलने वाली विदेशी सेनाओं ने समान शहरों की घेराबंदी की थी. और उन पर एक ही तरह के पहाड़ों और दर्रों से हमला किया गया.

उस समय के कठपुतली शासक शाह शुजा भी उसी पोपलज़ई क़बीले से हैं जिससे वर्तमान राष्ट्रपति हामिद करज़ई हैं. उस समय उनके प्रमुख विपक्षी ग़िलज़ई क़बीले के लोग थे जो कि आज तालिबान के प्रमुख लड़ाके हैं.

कई बार यह कहा जाता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर विजय पाना असंभव है. हालांकि ऐसा कहना सही नहीं है, कई शासक इस पर विजय प्राप्त कर चुके हैं.

फारस के राजाओं से लेकर सिकंदर महान और मंगोलों से लेकर मुग़लों तक ने अफ़गानिस्तान पर जीत हासिल की है.

लेकिन ख़ुद अफ़ग़ानिस्तान के ख़र्च पर उस पर कब्ज़ा करना असंभव है. सन् 1839 में तत्कालीन अमीर ने ब्रितानियों के सामने आत्मसमर्पण करते हुए कहा था कि वो एक ऐसी ज़मीन सौंप रहे हैं 'जिसमें केवल पत्थर और इंसान हैं' और वो बिल्कुल सही थे.

यहाँ हमला करने वाली किसी भी सेना को भारी ख़ून-खराबे और पैसे की बर्बादी के सिवा कुछ हासिल होने वाला नहीं है. और आखिर में वो हताश हो जाएंगे, जैसा ब्रितानियों के साथ सन् 1842 में हुआ, रूसियों के साथ सन् 1988 में हुआ और इस साल के अंत तक नेटो की सेना के साथ होने वाला है.

अक्तूबर 1963 में जब हेरल्ड मैकमिलन एलेक डगलस-होम को प्रधानमंत्री पद का दायित्व सौंप रहे थे तो कहा जाता है कि उन्होंने उनसे कहा था, ''मेरे प्यारे बच्चे, जब तक तुम अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण नहीं करोगे, तब तक तुम पूरी तरह सुरक्षित रहोगे.''

लेकिन अफ़सोस कि टोनी ब्लेयर को गद्दी संभालते समय यह सलाह देने वाला कोई नहीं था.

इससे हेगल की वही पुरानी कहावत सही साबित होती है कि इतिहास से आप जो बात सीखते हैं वो यही है कि इतिहास से वाकई कोई कुछ नहीं सीखता.

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