छात्रा ने क्यों चुना पॉर्न का रास्ता?

  • 14 मार्च 2014
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इंटरनेट पॉर्न की दुनिया में बेले नॉक्स के नाम से काम करने वाली एक 18 साल की छात्रा पिछले दिनों परदे से बाहर आ गई.

जाने-माने ड्यूक विश्वविद्यालय की इस छात्रा को जब पता चला कि उनके एक दोस्त ने कॉलेज में और लोगों को भी उनके वयस्क फिल्मों में काम करने की बात बता दी है तो फिर उन्होंने ख़ुद ही अमरीका को अपना असली नाम बताने का फ़ैसला किया.

उन्होंने कहा कि पॉर्न इंडस्ट्री तीन अरब डॉलर की है, करोड़ों लोग इसे देखते हैं और अगर उसमें किसी को शर्म नहीं आती तो फिर उसमें काम करने में उन्हें क्यों शर्म आए?

एक दूसरा मामला- न्यूयॉर्क की रेचेल कैनिंग ने 16 साल की उम्र में अपने मां-बाप का घर छोड़ दिया और अलग रहने का फ़ैसला किया.

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'मजबूरी का काम'

वो कभी-कभी शराब पीती थीं और जिस बॉयफ़्रेंड के साथ वक़्त गुजारती थीं वो उनके माता-पिता को पसंद नहीं था और कहासुनी के बाद उन्होंने घर छोड़ दिया. पिछले दिनों रेचेल कैनिंग ने अपने माता-पिता पर मुक़दमा दायर कर दिया.

इन दोनों मामलों का दूर-दूर तक आपस में कोई लेना-देना नहीं है लेकिन दोनों एक कड़ी से जुड़ते हैं और वो है उच्च शिक्षा.

बेले नॉक्स ने कहा है कि ड्यूक यूनिवर्सिटी में उनकी उच्च शिक्षा का ख़र्च है साल के 60 हज़ार डॉलर यानी लगभग चालीस लाख रूपए. क़र्ज़ उन्हें मिल नहीं रहा था, माता-पिता पर बोझ डालना नहीं चाहती थीं.

एक रेस्तरां में वेट्रेस की नौकरी मिली थी जहां पैसे बहुत कम थे और उनकी पढ़ाई पर असर पड़ रहा था तो उनके शब्दों में उन्होंने वो क्षेत्र चुना जो उन्हें पसंद था - सेक्स और पॉर्न.

उच्च शिक्षा

रेचेल कैनिंग ने माता-पिता को अदालत में इसलिए घसीटा क्योंकि वो उच्च शिक्षा के लिए उनसे पैसे मांग रही थीं लेकिन मां-बाप का कहना था कि अगर वो एक वयस्क की तरह अलग रह रही हैं तो फिर पैसे मांगने का क्या हक़ है उनको.

माता-पिता ने उनसे कहा कि अगर वो घर आ जाएं, घर के क़ायदे क़ानून का पालन करें तो वो उनकी पढ़ाई का ख़र्च वहन कर लेंगे. और आख़िर रेचेल घर लौट आई हैं.

इन दोनों मामलों के नैतिक और सामाजिक पहलुओं पर, सही और ग़लत पर, घंटों बहस हो सकती है और अमरीका में चटखारे ले लेकर हो रही है. लेकिन जो दूसरा पहलू है इतनी महंगी उच्च शिक्षा का, वो हाशिए में दबा पड़ा है.

(एक अमरीका जो सिर्फ़ पीछे की सोचता है)

पूरी दुनिया में अमरीकी उच्च शिक्षा की तूती बोलती है. दुनिया के 45 उच्चतम संस्थानों में से 30 अमरीका में हैं और इनमें अगर दाखिला मिल गया तो माना जाता है कि स्वर्ग की सीढ़ी लग गई.

लेकिन वो कितनी महंगी है इसका अंदाज़ा आपको इससे भी लग सकता है कि बराक ओबामा ने जब कांग्रेस के सीनेट में प्रवेश किया तब तक वो हार्वर्ड में क़ानून की पढ़ाई के क़र्ज़ की किस्तें चुकाने में लगे थे.

पिछले साल अमरीकी छात्रों पर कुल क़र्ज़ की राशि एक खरब डॉलर से भी कुछ ज़्यादा थी. यानी ये रकम पूरे अमरीका में क्रेडिट कार्ड के ज़रिए जो खरीदारी हुई उससे भी ज़्यादा थी.

महंगी पढ़ाई

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इतनी महंगी पढ़ाई के पीछे की सोच यहां ये है कि इसमें वही लोग आएं जो सही मायने में उच्च शिक्षा के लिए गंभीर हों और दूसरी बात कि उच्च शिक्षा एक निवेश की तरह है. आज लगाओ कल कई गुना पाओ.

यहां बड़ी तादाद है उन छात्रों की जो बारहवीं के बाद किसी काम में लग जाते हैं या फिर फ़ौज की नौकरी कर लेते हैं जिससे कि वो पैसे जमा कर सकें कुछ सालों के बाद कॉलेज की डिग्री के लिए.

लेकिन जो जुझारू नहीं होते, वो पहले ही रेस से बाहर हो लेते हैं. बाहर से आए छात्रों के लिए तो स्थानीय छात्रों से भी कहीं ज़्यादा महंगी है यहां की पढ़ाई. पिछले दिनों कुछ मध्यम वर्गीय भारतीय छात्रों से मिला तो उनका कहना था कि थोड़ी बहुत स्कॉलरशिप के बावजूद बाहर से एक कप चाय ख़रीदने से भी पहले सोचना पड़ता है.

कभी-कभी लगता है कि जो अमरीका दुनिया भर में अरबों डॉलर ख़र्च करके, हार्ड पावर का इस्तेमाल करके, जंगी विमान और मिसाइलों के ज़रिए दबदबा बनाने में लगा है, वही अमरीका उससे आधी से भी कम क़ीमत में अपनी उच्च शिक्षा को सॉफ़्ट पावर की तरह क्यों नहीं इस्तेमाल करता? जो साख और इज़्ज़त उससे मिलेगी वो कहीं ज़्यादा स्थायी होगी.

पढ़ाई मुफ़्त नहीं हो लेकिन इतनी महंगी भी तो नहीं हो कि एक आम नौजवान सपने देखना ही बंद कर दे या फिर उन्हें पूरे करने के लिए ऐसे क़दम उठाए जिससे उसके आज और कल दोनों ही ख़तरे में पड़ जाएं.

बेले नॉक्स शायद अपनी पढ़ाई ड्यूक यूनिवर्सिटी में पूरी कर लेंगी. उनका सपना है नागरिक अधिकारों की वकील बनने का. लेकिन जो क़ीमत उन्होंने चुकाई है क्या वो उन्हें अपना सपना पूरा करने देगी?

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