सीरियाः हिंसा और त्रासदी की कहानी

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राष्ट्रपति बशर अल-असद के वफ़ादार सैनिकों और विद्रोहियों के बीच पिछले तीन साल से चल रहे संघर्ष में एक लाख से भी ज़्यादा सीरियाई नागरिक अपनी जान गंवा चुके हैं.

इस ख़ूनी संघर्ष ने पूरे देश को तबाह कर दिया है और क़रीब 90 लाख लोगों को अपना घर छोड़ कर पड़ोसी देशों में पनाह लेने पर मजबूर कर दिया है.

एक अनुमान के मुताबिक देश की क़रीब तीन चौथाई आबादी के सामने भोजन और दवाओं का भारी संकट खड़ा हो गया है.

संयुक्त राष्ट्र ने इसके लिए अंतरराष्ट्रीय जगत से मदद की अपील की है.

सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध की कहानी मूलतः आठ चरणों की कहानी है.

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1. प्रदर्शन

सीरिया का संकट मार्च 2011 में हुए प्रदर्शन के साथ ही शुरू हो गया. दक्षिणी शहर डेरा में एक स्कूल की दीवार पर पर क्रांतिकारी नारे लिखने के कारण कुछ किशोरों को गिरफ़्तार किए जाने और यातना दिए जाने के विरोध में ये प्रदर्शन हुए थे.

प्रदर्शन को दबाने के लिए सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई, जिसमें कई लोग मारे गए. इसके बाद राष्ट्रपति बशर अल-असद की इस्तीफ़े की मांग को लेकर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन फूट पड़ा.

जुलाई 2011 तक दसियों हज़ार लोग देश के कई शहरों और कस्बों में सड़क पर उतर आए.

2. हिंसा

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दमन से रक्षा के लिए विपक्ष के समर्थक हथियारबंद होने लगे और बाद में सुरक्षा बलों को अपने इलाकों से खदेड़ने लगे.

विद्रोही समूहों ने शहरों, कस्बों और देहातों पर कब्ज़े के लिए सरकारी सुरक्षाबलों से मुकाबला करना शुरू कर दिया और इसके साथ ही गृहयुद्ध की शुरुआत हो गई.

यह लड़ाई 2012 तक दमिश्क और अलेप्पो तक पहुंच गई.

जुलाई 2013 में संयुक्त राष्ट्र ने दावा किया कि इस संघर्ष में कुल एक लाख लोग मारे गए. हताहतों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि संयुक्त राष्ट्र ने गणना करना बंद कर दिया.

3. विपक्ष

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इस संघर्ष में विपक्ष पूरी तरह से खंडित और बंटा रहा. राष्ट्रपति को हटाने के अलावा उनके बीच अन्य किसी बात पर सहमति नहीं बन पाई.

अंतरराष्ट्रीय मान्यता हासिल करने के लिए राजनीतिक मोर्चे पर गठबंधन हुए लेकिन सत्ता संघर्ष, जमीनी कार्यकर्ताओं और विद्रोहियों का समर्थन न मिलने पर यह प्रभावी नहीं हो पाया.

इसके साथ ही हथियारबंद विद्रोहियों की संख्या बढ़ती गई. एक अनुमान के मुताबिक एक हजार लड़ाकू समूहों का एक लाख हथियारबंद लड़ाकों पर नियंत्रित है.

ये हथियारबंद समूह इस्लामी चरपंथियों के प्रभाव में आ गए, जिनके बारे में कहा गया कि उनके तार अल-क़ायदा से जुड़े हैं.

4. नरसंहार

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संयुक्त राष्ट्र द्वारा गठित एक आयोग गृहयुद्ध के दौरान मानवाधिकार हनन के मामलों की जांच कर रहा है. आयोग के मुताबिक दोनों ही पक्ष युद्ध अपराध को अंजाम देने में पीछे नहीं रहे.

दोनों ही पक्षों पर अपहरण, हत्या, फांसी और संरक्षित स्थलों को निशाना बनाने का आरोप है. आयोग को सीरिया में जाने की इजाज़त नहीं मिली लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों से बातचीत के आधार पर आयोग ने 27 ऐसी घटनाएं चिह्नित कीं, जिनमें सामूहिक नरसंहार को अंजाम दिया गया.

उनका मानना है कि इसमें नरसंहार की 17 घटनाएं सरकारी सुरक्षा बलों द्वारा अंजाम दी गईं. सरकारी सुरक्षाबलों पर मई 2012 में होला में और अगस्त 2013 में बानियाज़ में सैंकड़ों नागरिकों को मौत के घाट उतारने का आरोप है. जबकि विद्रोहियों पर आरोप है कि उन्होंने अगस्त 2013 में लताकिया इलाके में 190 लोगों की हत्या की थी.

5. रासायनिक हथियार

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जब जनउभार शुरू हुआ तो उस समय सीरियाई सरकार के पास 1000 टन रासायनिक हथियारों का जख़ीरा था. इसमें घातक मस्टर्ड गैस और सरीन भी शामिल है.

21 अगस्त 2013 में दमिश्क के बाहरी इलाके में सरीन से लैस रॉकेट हमलों में काफ़ी लोग मारे गए. यह आंकड़ा 300 से 1430 के बीच है. विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय जगत ने इसके लिए सरकारी फौजों को ज़िम्मेदार ठहराया, जबकि असद ने विद्रोहियों को इसका ज़िम्मेदार बताया.

इसके कुछ दिन बाद राष्ट्रपति असद अमरीका और रूस के साथ इस बात पर सहमत हो गए कि जून 2013 तक सारे रासायनिक हथियारों को सीरिया नष्ट कर देगा.

6. शरणार्थी

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हाल के इतिहास में पलायन का यह बहुत बड़ा मामला है. करीब 25 लाख से भी ज़्यादा लोगों ने सीरिया से पलायन कर पड़ोसी देशों- लेबनान, जॉर्डन और तुर्की में पनाह ली है. इसमें सबसे बड़ी संख्या महिलाओं और बच्चों की है.

2013 की शुरुआत में पलायन में नाटकीय रूप से बढ़ोतरी आ गई. संयुक्त राष्ट्र ने करीब 6.5 अरब डॉलर (करीब 409.5 अरब रुपए) की सहायता की अपील की है.

7. परोक्ष युद्ध

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दूसरे अरब स्प्रिंग के रूप हुआ यह जनउभार पहले क्षेत्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय महाशक्तियों के बीच परोक्ष युद्ध का अखाड़ा बन गया.

ईरान और रूस ने राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार का समर्थन किया जबकि तुर्की, सउदी अरब, क़तर और अमरीका, इंग्लैंड व फ्रांस समेत अन्य अरब देश सुन्नी बहुल विपक्ष के समर्थन में खड़े हो गए.

युद्ध के मैदान में लेबनान के शिया इस्लामी कट्टपंथी समूह हिज़बुल्ला और अल-क़ायदा से जुड़े जेहादी समूह भी सक्रिय हैं. दोनों ही अलग अलग पक्षों को समर्थन दे रहे हैं जिससे साम्प्रदायिकता बढ़ रही है.

8 वार्ता दर वार्ता

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गृहयुद्ध में दोनों हारना नहीं चाहते इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने बहुत पहले ही यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि सीरियाई संकट का समाधान केवल राजनीतिक वार्ता से ही संभव है. हालांकि अरब लीग और संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकल पाया.

इसके बाद 2012 जिनीवा प्रस्ताव पर सहमति बनाने के लिए मई 2013 में अमरीका और रूस ने प्रयास शुरू किया और स्विट्ज़रलैंड में वार्ता का दौर शुरू हुआ.

इसके तहत आपसी सहमति से सीरिया में एक अंतरिम कार्यकारी सरकार बनाने का प्रस्ताव था.

वार्ता का दूसरा दौर जनवरी 2014 तक नहीं शुरू हो पाया. बाद में यह वार्ता शुरू हुई लेकिन दो दौर के बाद ही फिर से गतिरोध क़ायम हो गया. संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत लख़दर इब्राहिम ने इसके लिए राष्ट्रपति बशर अल-असद को जिम्मेदार ठहराया क्योंकि वे विपक्ष मांगों पर बातचीत के लिए राज़ी नहीं हुए.

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