इसलिए मैं याद करता हूं टोनी बेन को..

  • 15 मार्च 2014
टोनी बेन Image copyright Getty

जब टोनी बेन के देहांत की ख़बर मिली तो 1987 से 1991 तक के अपने ब्रिटेन प्रवास की बहुत सी यादें कौंध उठीं जिनमें टोनी बेन की मौज़ूदगी एक प्रकाश स्तंभ जैसी थी.

प्रकाश स्तंभ यानी रोशनी की वो मीनार जो मेरे राजनीतिक मित्रों की ओर मुझे सदा प्रेरित करती रही और मारग्रेट थैचर के उस दौर में आक्रामक और कुटिल पूँजीवादी प्रभुत्व के सामने विरोध का बल देती रही.

टोनी बेन नाभिकीय निशस्त्रीकरण के समर्थक और युद्ध के विरोधी थे. पूरी पृथ्वी पर जहाँ कहीं भी स्वाधीनता, न्याय, समानता और अधिकारों के लिए मनुष्य का संघर्ष उन्हें दिखता था, उसके वे प्रबल समर्थक रहे.

उन्होंने निरंतर ब्रिटिश राजनीति की प्रखरतावादी नीतियों और अमरीकी साम्राज्यवाद के पिछलग्गूपन के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद की.

उन्होंने फॉकलैंड युद्ध का पुरजोर विरोध किया था और जीवन भर आयरलैंड की जनता के ब्रिटेन विरोधी संघर्ष को जायज़ मानते रहे. वे एकीकृत आयरलैंड के समर्थक थे.

उन्होंने पश्चिमी सेनाओं के प्रति इराक़ी और अफ़ग़ान जनता के हिंसक प्रतिरोध को जायज़ ठहराया था. उनके प्रतिरोध को वे आतंकवादी गतिविधियों की तरह नहीं बल्कि आत्मरक्षा के अधिकार के तौर पर देखते थे.

उनसे मेरी पहली मुलाक़ात ब्रिटिश संसद भवन, वेस्टमिंस्टर हाऊस के एक हॉल में हुई थी जहाँ एशियाई देशों के वामपंथी साथियों, आयरिश दोस्तों और प्रतिबद्ध बुद्धिजीवियों का एक समूह इकट्ठा हुआ था.

उनके व्यक्तित्व और वक्तता के ओज से मैं प्रभावित हुआ था. बाद में खाने-पीने के दौर में उनसे बातचीत हुई.

कुछ निजी प्रसंगों के साथ भारतीय राजनीति पर चर्चा हुई और उस सिलसिले की शुरूआत हुई जो 1991 में ब्रिटेन से मेरे विदाई समारोह तक चला.

लोकप्रिय राजनेता

बीबीसी विश्व सेवा ने बुश हाऊस में मेरी विदाई की पार्टी उस समारोह के कुछ दिन बाद की थी.

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टोनी बेन जिस समारोह में आए थे वहां उनके अलावा कुछ समाजवादी देशों के राजनयिकों और बीबीसी के साथियों के अलावा लेबर पार्टी के वामपंथी धड़े के लोग भी थे जिनके सर्वमान्य नेता और श्रेष्ठ प्रतिनिधि के रूप में टोनी बेन ने अपार चर्चा और लोकप्रियता हासिल की.

मैंने जब बीबीसी विश्व सेवा में अपने अनुबंध के पूरा होने के बाद भारत वापस लौटने का फ़ैसला किया तो बीबीसी के कई सहकर्मियों के लिए या मेरे कई नाते-रिश्ते वालों के लिए मेरा फ़ैसला अव्यवहारिक और ग़लत था.

वे सब ऐसे लोग थे जो मेरे ब्रिटेन में बस जाने के पक्ष में मुझ पर नसीहतों की बौछार कर रहे थे, लेकिन टोनी बेन ने मेरे निर्णय को सही माना था.

उन्होंने उस समारोह में बोलते हुए कहा था कि एक बुद्धिजीवी और रचनाकार को अपनी जनता के बीच होना चाहिए.

उन्होंने अपनी ओर से शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद ज़ाहिर की थी कि भारत लौटकर मैं अपने लोगों के सारे ज़रूरी संघर्षों में शिरकत करूंगा और एक सार्थक सामाजिक बुद्धिजीवी का जीवन बिताऊंगा.

अपने शुभकामना वाले वक्तव्य में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आने वाले वक़्त में एशिया के दो बड़े देश भारत और चीन ही मनुष्यता के भविष्य की दिशाएं तय करेंगे और पश्चिमी देशों के हित में यही होगा कि वे एशियाई अस्मिता की नेतृत्वकारी भूमिका को स्वीकार करें.

इसे नज़रअंदाज़ करना या किसी तरह की रार ठानना उनके लिए हितकारी नहीं होगा.

अपने 50 वर्षों के संसदीय जीवन में वे ब्रिटिश राजनीति में एक निर्भीक नैतिक आवाज़ की तरह उपस्थित रहे जिसकी गूँज-अनुगूँज लगातार विस्तार पाती रही.

वे एक समृद्ध परिवार में जन्मे थे. उनके पिता विलियम वेजवुड बेन सांसद और मंत्री रहे. विलियम लगभग तीन वर्ष तक 1929-31 तक भारत संबंधी मामलों के मंत्री भी रहे.

टोनी बेन और उनके बड़े भाई माइकेल ने ब्रिटिश वायुसेना में शामिल होकर जर्मनी के नाजीवादी युद्ध के ख़िलाफ़ शिरकत की. उस युद्ध में माइकल शहीद हुए थे जबकि टोनी बेन ने वहाँ से लौटकर ख़ुद को पिता की तरह राजनीतिक जीवन के लिए तैयार किया.

बढ़ा राजनीतिक क़द

ऐंथनी नील वेजवुड बेन नाम के इस युवा नेता ने सांसद बनने के बाद अपने प्रखर विचारों और प्रतिबद्ध चरित्र से लेबर पार्टी में अपने लिए विशेष जगह बनाई और दिनों-दिन उसका राजनीतिक क़द बढ़ता गया.

उनके पिता को ब्रिटिश हुक़ूमत ने वाइकाउन्ट की उपाधि से विभूषित किया था, जिसे लॉर्डशिप भी कहते हैं. नतीजतन एंथनी नील वेजवुड बेन को उत्तराधिकार में सर की उपाधि प्राप्त हुई थी.

टोनी बेन के लिए यह एक बोझ की तरह था और जनप्रतिनिधि होने के मार्ग में बाधा भी. इसलिए उन्होंने लॉर्डशिप से मुक्ति पाने के लिए अथक संघर्ष किया और 1963 में पीरेज एक्ट में संशोधन करवा कर ही दम लिया. फिर उन्होंने भारी भरकम नाम से छुटकारा पाने के लिए विधिवत घोषणा की कि उन्हें टोनी बेन कहा जाए.

प्रधानमंत्री हैरॉल्ड विल्सन ने उन्हें पोस्टमास्टर जनरल बनाया. वह पद हालांकि मंत्री स्तर का नहीं था लेकिन टोनी बेन कैबिनेट की बैठकों में शामिल होते थे. उसी कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रयत्न किया था कि डाक टिकटों से रानी की छवि हटा दी जाए. वैसा नहीं हो पाया.

बाद में जब टोनी बेन को टेक्नोलॉजी का मंत्री बनाया गया तो रानी एलिजाबेथ ने चुटकी लेते हुए कहा था कि अब टोनी बेन को डाक टिकटों की याद सताएगी.

अपने लंबे राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने उद्योग और फिर ऊर्जा मंत्रालयों का दायित्व निभाया. सितंबर 1971 से सितम्बर 1972 तक लेबर पार्टी के चेयरमैन रहे और अपने विचारों के ऐसे अनुयायी पैदा किए जिन्हें 'बेनाइट' की संज्ञा से जाना गया.

कई सर्वेक्षणों में उन्हें ब्रिटेन के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता के तौर पर सराहा गया. संसद से विदा लेने के बाद टोनी बेन ने जनप्रदर्शनों और जनसभाओं की राजनीति आरंभ की और 2003 में एरॉय द वॉर कओलिशन के अध्यक्ष बनने के बाद से अपनी मृत्यु तक उस पद पर बने रहे.

टोनी बेन को व्यक्तिगत रूप से जानने का अवसर जिन्हें मिला, उन्होंने सदा अनुभव किया कि टोनी बेन एक बेहद संवेदनशील इंसान थे जिनमें अपने आसपास के लोगों को अपार स्नेह और सम्मान देने की क्षमता थी लेकिन इसके साथ ही वे अपने विचारों की दृढ़ता के मामले में बेहद अभिमानी और ज़िद्दी भी थे.

वे कार्ल मार्क्स के अनुयायी थे और माओत्से तुंग को पिछली सदी के महानतम व्यक्तियों में से एक मानते थे.

कहना न होगा कि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से अब तक ब्रिटिश राजनीति में टोनी बेन सरीखा राजनेता कोई नहीं था. उनके न होने पर जो लोग उनकी बहुचर्चित डायरियों, पत्रों और व्याख्यानों के माध्यम से उन्हें जानेंगे उनके लिए टोनी बेन का व्यक्तित्व उत्तरोत्तर अधिकाधिक मूधराकार होता रहेगा.

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