अमरीका-जापान ने ज़ख़्म भुलाए, भारत-पाक क्यों नहीं?

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वाशिंगटन में इस हफ़्ते पड़ी बर्फ़ काफ़ी हद तक पिघल गई है लेकिन बिजली के तारों और पेड़ों में फंसे बेरंग होते पतंगों की तरह कुछ धब्बे, कुछ टुकड़े अभी भी न पिघलने की ज़िद पर अड़े हैं.

लेकिन इस ज़िद्दी बर्फ़ीले कचरे को मानो मुंह चिढ़ाते हुए वसंत ने अपने आने का औपचारिक एलान कर दिया है.

(डियर दुनिया)

जापान से सौ साल पहले लाए गए चेरी ब्लॉज़म के पेड़ अपनी गुलाबी चादर वाशिंगटन पर फैलाने के लिए बेताब हैं.

एक हफ़्ते में फिर से बर्फ़ पड़े या बर्फ़ीली बारिश हो, ये शहर गुलाबी हो उठेगा. चेरी ब्लॉज़म पार्टियां होंगी, परेड होंगी, निगोड़ी ठंड को झटकने की क़वायद होगी.

फूलों से ज़्यादा प्यारा तोहफ़ा शायद कुछ और नहीं होता. लेकिन ज़रा सोचिए जिस देश ने हज़ारों चेरी ब्लॉज़म के पेड़ अमरीका भेजे, उसी देश ने 1941 के दिसंबर में पर्ल हार्बर पर बम बरसाया और अमरीका को विश्व युद्ध में घसीट लिया.

निरपेक्ष राजनीति

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अमरीका में रह रहे एक लाख से ज़्यादा जापानी मूल के लोगों को राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के फ़रमान पर घरों से निकालकर कैंपों में क़ैद कर दिया गया. उनमें से दो तिहाई अमरीकी नागिरक बन चुके थे.

(दिवालिया होने की कहानी)

कहते हैं कुछ लोगों ने अपना ग़ुस्सा चेरी ब्लॉज़म पर भी उतारा और कुछ पेड़ काट दिए गए. लेकिन बाक़ी बचे पेड़ों में फूल फिर भी खिले. उनकी राजनीति हमेशा से निरपेक्ष रही है.

चार साल बाद अमरीका ने हिरोशिमा और नागासाकी पर एटम बम गिराया. वाशिंगटन में दो साल तक चेरी ब्लॉज़म फ़ेस्टिवल नहीं मनाया गया लेकिन ये मूक पेड़ फिर भी अपनी ज़िद पर अड़े रहे, फूल खिलाते रहे, गुलाबियत बिखेरते रहे.

एक ख़ास बात और हुई. युद्ध के बाद जब जापान के ही कई शहरों में इन पेड़ों का नामोनिशान मिट गया तो फिर अमरीका से भी कुछ डंठलें भेजी गईं जो अब फिर से वहां जड़ जमा चुकी हैं, फल-फूल रही हैं.

जापानी पीढ़ियां 1945 के उस ज़ख़्म को और कड़वाहट को भूल गई होंगी ऐसा तो नहीं है. लेकिन इतने वीभत्स अमरीकी हमले के बाद आज जापान और अमरीका निकटतम सहयोगियों में गिने जाते हैं.

भारत-पाक रिश्ते

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मुझे यक़ीन है कहीं न कहीं चेरी ब्लॉज़म की गुलाबियत ने आपसी घावों पर मरहम लगाने और सहलाने का काम ज़रूर किया होगा.

(वाशिंगटन में टैक्सी पॉलिटिक्स)

दो और देश भी हैं जिन्होंने 1947 से ही ज़ख़्म पाल रखे हैं, चार लड़ाइयां लड़ चुके हैं और आज भी एक दूसरे का गला काटने को तत्पर हैं.

सीमा पर अभी भी हर रोज़ पांव पटक-पटक कर धरती-फाड़ परेड होती है, अवाम को युद्ध गर्जना सुनाई जाती है. वहां कई लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर अमन तलाशने की कोशिशें की हैं लेकिन नाकामयाब रहे.

एक बार फूलों को आज़माने में क्या बुराई है? चेरी ब्लॉज़म न सही, गुलमोहर के ही पेड़ वहां लगा दिए जाएं तो उनकी लाली और छांव शायद कुछ कमाल दिखा दें.

एक आइडिया भर है. चुनावी मौसम में नागवार गुज़रे तो भूल-चूक माफ़.

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