प्रथम विश्वयुद्धः जांबाज़ नर्सों के नाम कई लड़ाईयां

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प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान नर्सिंग बेहद थकाऊ और सामान्य तौर पर ख़तरनाक़ काम था. इस काम में लगी महिलाओं ने इस विभीषिका को प्रत्यक्ष झेला और कुछ ने तो इसकी भारी क़ीमत अदा की. लेकिन उनकी कहानियां मिथकों से घिरी हुई हैं और उनका योगदान अक्सर भुला दिया जाता है.

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अमरीका के साहित्यिक आलोचक और इतिहासविद् पौल फूज़ेल की पुस्तक 'दि ग्रेट वॉर एंड मॉडर्न मेमोरी' 1975 में प्रकाशित हुई और बहुत सराही गई. पौल इसमें लिखते हैं कि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान साहसी लोगों के बारे में इतने मिथक फैल गए हैं कि इन्हें वास्तविकता की कसौटी पर कसना बेहद चुनौतीपूर्ण है.

लेकिन, आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने नर्सों के योगदान का मुश्किल से जिक्र किया है. एडिथ कैवेल का कहीं संदर्भ तक नहीं है और आधुनिक नर्सिंग के जन्मदाता फ्लोरेंस नाइटिंगेल को अकेला छोड़ दिया गया है.

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नर्सिंग के मिथक

हालांकि बिल्कुल सफेद वर्दी में रहने वाली स्वयंसेवी और अक्सर अप्रशिक्षित युवा वीएडी (वालंटरी एड डिटैचमेंट) नर्सों के मिथक को पूरी दुनिया में सराहा जाता है. सदियों से किंग आर्थर, राउंड टेबल से लेकर शेक्सपीयर तक की कहानियों में ये मौजूद रही हैं, जहां अस्तव्यस्त लेकिन बहादुर लड़ाकों का इन सभ्य नर्सों से सामना हुआ और जिन्होंने सबसे मुश्किल समय में इनका ख्याल रखा.

मेरी मां, वेरा ब्रिटेन भी, जिन्होंने युद्ध के दौरान अपने प्रत्यक्ष अनुभव को 'टेस्टामेंट ऑफ यूथ' पुस्तक में कलमबद्ध किया है, इस मिथक का हिस्सा बन गई हैं.

युद्ध के दौरान उन्होंने उन सभी युवाओं को खो दिया जो उनके लिए प्यारे थे. अपने भाई एडवर्ड, अपने प्यारे मित्रों विक्टर और जियोफ्रे को.

दुख को भुलाने के लिए उन्होंने युद्ध के सबसे भीषण जगहों में नर्सिंग के लिए खुद को समर्पित कर दिया. पाठकों के लिए उन्होंने उन पात्रों को अपनी लेखनी में उतारा है.

पहली बार प्रकाशित अपनी कविता की पुस्तक 'वर्सेस ऑफ ए वीएडी (1920)' में उन घटनाओं को जीवंत बनाने में वो सफल रही हैं.

हालांकि उनसे पहले भी युद्ध के दौरान काम कर चुकीं कुछ महिलाओं ने नर्सिंग इतिहास को सुधारने में योगदान किया है, फिर भी चिकित्सकों के बराबर ही उनके योगदान की स्वीकार्यता अभी शेष है.

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मोर्चे पर

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1914 में अपने परिजनों की तरह ही युवा एवं युवतियों को लगता था यह युद्ध बहुत छोटे अंतराल के लिए है. सामूहिक आयोजन आशावाद और राष्ट्रवाद की भावनाओं से ओतप्रोत हुआ करते थे. महिलाओं से अपेक्षा की जाती थी कि वो घर पर इंतज़ार करें या यदि वो कामकाजी हैं तो हथियार की फैक्टरी में काम करें.

उनसे कहा जाता कि घर को संभालें रखें. हालांकि लड़के मोर्चे पर गए हैं लेकिन वो जल्दी ही लौट आएंगे.

सेना की मुख्य नर्स टुकड़ी थी क्वीन एलेक्जेंडर्स इंपीरियल मिलिटरी नर्सिंग सर्विस (क्यूएआईएमएनएस). इसकी स्थापना 1902 में बोअर युद्ध के दौरान हुई थी और 1914 में 300 सदस्यों की मजबूत टुकड़ी थी.

चार साल तक चले इस युद्ध के अंत तक इसमें सदस्यों की संख्या 10,000 तक पहुंच गई थी.

इसके अलावा शताब्दी की शुरुआत में सेना में नर्सिंग की कुछ अन्य संस्थाओं की भी शुरुआत हो चुकी थी. जैसे 1907 में स्थापित फर्स्ट एड नर्सिंग येओमैनरी.

इनके अतिरिक्त हजारों अप्रशिक्षित महिलाएं मोर्चे के पीछे परिचारिका के काम में लगी थीं, लेकिन उन्हें सैनिकों के उपचार का अनुभव नहीं था.

क्यूएआईएमएनएस के अलावा सभी महिला सैनिक नर्सों को मोर्चे पर भेजने का ब्रितानी सेना ने विरोध किया था इसलिए ब्रिटेन की शुरुआती स्वयंसेविकाओं को फ्रांस और बेल्जियम की सेना के साथ काम करने का मौका मिला.

चूंकि ये महिलाएं संभ्रांत परिवारों से आती थीं इसलिए उन्हें एक सैन्य अस्पताल का प्रबंधन करने में कोई समस्या नहीं थी.

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मुश्किलें

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इन महिलाओं में सबसे मशहूर महिला थीं डचेज़ ऑफ सदरलैंड, जिन्हें मेडेलसम मिली के नाम से भी जाना जाता था.

युद्ध घोषित होने के साथ ही मिली और उनके जैसी अन्य महिलाएं चिकित्सकों और नर्सों को लेकर फ्रांस और बेल्जियम चली गईं. उन्होंने यात्रा और उपकरणों का खुद इंतजाम किया.

नौकरशाही की तरफ से जो थोड़ी बहुत रुकावटें आ रही थीं वो 1915 के बसंत में भारी संख्या में हताहतों के आने के बाद समाप्त हो गईं.

यहां तक कि ब्रितानी सेना के उच्च अधिकारियों ने भी उनके योगदान को सराहा.

युद्ध के इस चरण में महिला नर्सों को विभिन्न सेवाओं के लिए आमंत्रित किया जाने लगा. मध्य वर्ग की हजारों महिलाएं, जिन्हें घरेलू काम करने का भी बहुत कम अनुभव था, बहुत शिक्षित नहीं थीं और पुरुष शरीर का उन्हें बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था, उन्होंने नर्सिंग के लिए खुद को समर्पित किया और अंततः सैन्य अस्पतालों में उन्हें काम का मौका मिला.

बहुत कम मेहनाता पाने वाली वीएड परिचारिकाओं से अधिकांशतः घरेलू नौकरों वाले काम लिए जाते थे. लेकिन बहुत कम नर्सों को मरहम-पट्टी और दवाएं देने की इजाजत मिल पाई.

अनुशासन

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Image caption वेरा ब्रिटेन उन्हें सम्मान दिलाने की कोशिश कर रही हैं जिन्होंने युद्ध में जान गंवाई.

रेड क्रास की छवि और वर्दी रोमांटिक थे लेकिन अपने आप में इसका काम बहुत थकाऊ, कभी न खत्म होने वाला और कभी कभी तो बहुत घिनौना होता था.

पेशेवर नर्सों से इनके रिश्ते बहुत औपचारिक और कड़े अनुशासन में बंधे होते थे और जरा भी चूक से उनके अनुबंध निरस्त कर दिए जाते थे.

अक्सर उन्हें अग्रिम मोर्चे से काफी पीछे बहुत दूर दराज इलाके में इनकी तैनाती होती थी जहां रेडियो और टेलीविजन नहीं होता था और समाचारपत्र भी बहुत देर से पहुंचते थे.

जर्मन सेनाओं की बमबारी की जद में आने वाली जगह पर स्थित एक सैन्य अस्पताल में तैनात मेरी मां को 1918 बसंत में उनके पिता का एक पत्र मिला जिसमें उन्हें तत्काल घर लौटने को कहा गया था. लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि यह ''मेरा कर्तव्य'' है.

युद्ध ने ऐसे मामलों को बढ़ा दिया जिनसे निपटने के उपाय चिकित्सा विज्ञान के पास तत्काल उपलब्ध नहीं थे.

अधिकांश मामले घावों में संक्रमण के थे या खाईयों का पानी पेट में चले जाने के संक्रमण के थे. उस समय एंटीबायटिक दवाएं और संक्रमण निवारक नहीं होते थे.

प्रथम विश्वयुद्ध में नर्सिंग को लेकर बहुत शोध के बाद क्रिस्टाइन हैलेट द्वारा लिखी गई पुस्तक 'वेल्ड वॉरियर्स' में उन्होंने लिखा है कि रूसी मोर्चे में स्थितियां बहुत अलग थीं.

पहचान

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Image caption युद्ध समाप्त हो जाने के बाद भी नर्सों को वाजिब सम्मान नहीं मिला.

वहां आयोडाइज़्ड या साल्ट की संक्रमण निवारक दवाएं होती थीं और पीड़ित सैनिक के शरीर को व्यवस्थित तरीके से पट्टी बांध कर हजारों मील दूर सैन्य अस्पताल तक ले जाया जाता था.

ब्रिटेन में संक्रमण से निपटने के लिए बहुत कुछ किया गया, लेकिन कई मामलों में टिटनेस और गैंग्रीन से मौतें हुईं.

युद्ध के अंत में जाकर सीधे रक्त दान का तरीका विकसित हो पाया, जिसमें दाता और मरीज को सीधे ट्यूब से जोड़ दिया जाता है.

युद्ध खत्म होने के बाद अधिकांश वीएडी परिचारिकाओं ने इस पेशे को छोड़ दिया. पुरुषों की कमी के चलते बहुतों ने वाणिज्यिक और क्लर्की की नौकरी कर ली. लेकिन पेशेवर नर्सें इस पेशे को छोड़ने के प्रति अनिच्छुक थीं. उन्हें 1943 तक मान्यता नहीं मिली. इनमें से कुछ को सार्वजनिक स्वास्थ्यकर्मी के रूप में या मिडवाईफ की नौकरी मिल गई.

विगत सालों में काफी कुछ बदल गया लेकिन चिकित्सकों के बराबर ही नर्सों के योगदान को वो पहचान नहीं मिली जो उन्हें मिलनी चाहिए थी.

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