युगांडाः क्यों बिक रहे हैं फ़र्ज़ी एचआईवी सर्टिफिकेट?

  • 5 अप्रैल 2014
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युगांडा की राजधानी कंपाला में निजी क्लीनिक नौकरी तलाश करने वालों के लिए नक़ली एचआईवी निगेटिव सर्टिफिकेट बेच रहे हैं.

बीबीसी अफ्रीका की संवाददाता कैथरीन बारुहंगा की एक गुप्त छानबीन में ये बात सामने आई है.

नौकरी पाने, विदेश जाने या सेक्सुअल पार्टनर को अंधेरे में रखने के लिए फर्जी एचआईवी निगेटिव वाले प्रमाणपत्र बनवाए जाने के कई मामले सामने आ रहे हैं.

बीबीसी अफ्रीका की टीम सच्चाई का पता लगाने के लिए कंपाला के कई क्लीनिक में पहुंची. वे वहां नौकरी की तलाश कर रहे बेरोजगार के रूप में पहुंचे जो एचआईवी पॉजिटिव हैं.

सामाजिक कलंक

कैथरीन ने अपने सहयोगियों के साथ एचआईवी निगेटिव फर्जी सर्टिफिकेट की बिक्री के मामले की तह तक पहुंचने के लिए कई हफ्ते से यहां डेरा डाले हुए हैं और लोगों से पूछताछ कर रहे हैं.

अधिकांश लोग इस मामले में किसी तरह की बातचीत से बचते नजर आए क्योंकि युगांडा में एचआईवी को बहुत बड़े सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है.

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सराहा कंपाला के एक छोटे इलाके में रहती हैं. उन्होंने पहचान जाहिर नहीं करने का आश्वासन दिए जाने पर कैथरीन से बात की.

सराहा ने बीबीसी को बताया, "मुझे काम की सख्त जरूरत है. मैं 'सिंगल मदर' हूं. यदि मैंने कंपनी को एचआईवी पॉजिटिव रिजल्ट वाले सर्टिफिकेट दिखाए तो मुझे वे नौकरी नहीं देंगे. इसलिए मुझे फर्जी प्रमाण पत्र बनवाना पड़ा."

'वैश्विक अगुआ'

कंपाला के जिन क्लीनिकों में फर्जी एचआईवी निगेटिव सर्टिफिकेट बेचे जा रहे हैं वे यहां के छोटे-छोटे निजी क्लीनिक हैं. ऐसे क्लीनिकों की संख्या सैंकड़ों में हैं.

इन क्लीनिकों में मुट्ठी भर कर्मचारी होते हैं, जबकि डॉक्टर कभी-कभी नजर आते हैं. हां, जांच करने वाले नर्स और लेबोरेटरी इंचार्ज जरूर मौजूद होते हैं.

कैथरीन और उनकी टीम ने ऐसे 15 क्लीनिक का दौरा किया. इनमें से 12 क्लीनिक उन्हें फर्जी सर्टिफिकेट देने के लिए तैयार हो गए.

एक लेबोरेटरी टेक्नीशियन ने बताया कि इस तरह से फर्जी सर्टिफिकेट देना उनके लिए बेहद जोखिम भरा है और पकड़े जाने पर उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है.

थोड़ा मोलभाव करने के बाद वह लेबोरेटरी टेक्नीशियन 20 डॉलर में एक फर्जी सर्टिफिकेट देने के लिए राजी हो गया.

इस फर्जी सर्टिफिकेट को देख कर कोई नहीं कह सकता कि यह असली नहीं है. इसमें क्लीनिक की आधिकारिक मुहर और स्वास्थ्य कार्यकर्ता का हस्ताक्षर तक मौजूद था.

"जांच कराएं"

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फर्जी सर्टिफिकेट बनवाने वाले अधिकतर लोगों को युगांडा की एचआईवी नीति से शिकायत है.

पिछले कई सालों से युगांडा को एचआईवी से संघर्ष करने वाले एक अगुआ के रूप में देखा जाने लगा था.

20 साल पहले युगांडा में हर पांचवां व्यक्ति एचआईवी वायरस से संक्रमित था. सरकार ने तुरंत पहल की और जोर शोर से एड्स अभियान चलाया.

सरकार की पहल का असर कुछ यूं हुआ कि साल 2005 तक एड्स से संक्रमित रोगियों की संख्या में 6.3 फीसदी की गिरावट आ गई.

लेकिन हाल के कुछ वर्षों में एचआईवी के मामले फिर से बढ़ने शुरू हो गए और बढ़ते बढ़ते यह साल 2012 में 7.2 फीसदी के स्तर पर पहुंच गया.

एक बार फिर से सरकार और एड्स कार्यकर्ताओं ने एचआईवी संक्रमण के खिलाफ लड़ने के लिए कमर कस ली है.

एड्स के खिलाफ अभियान के तहत "जांच कराएं" की तख्तियां कंपाला में हर जगह लगा दी गई ताकि अधिक से अधिक लोगों के स्टेटस का पता चल सके.

यहां तक कि राष्ट्रपति योवेरी मुसेवेनी और उनकी पत्नी ने भी सार्वजनिक तौर पर अपनी जांच करवाई.

"जांच कराएं" के लिए चल रहे अभियान का मकसद है कि यदि कोई एचआईवी पॉजिटिव है तो उसे तुरंत इलाज के लिए एंटी-रेट्रोवायरल दवाइयां दी जा सकें ताकि इससे कोई और संक्रमित ना हो सके.

इस अभियान का साइड इफेक्ट ये हुआ कि कई लोग बेहद डर गए हैं कि उनके स्टेटस का पता कहीं दूसरों को न चल जाए.

'अनजान लोग'

पिछले साल एड्स से पीड़ित 1,000 से ज्यादा युगांडावासियों पर किए गए एक सर्वेक्षण में ये बात सामने आई कि उनमें से 60 फीसदी लोगों को अपने रिश्तेदारों, दोस्तों के बहिष्कार का सामना करना पड़ा, या उनकी नौकरी चली गई. यह सर्वेक्षण युगांडा के एचआईवी/एड्स नेटवर्क के साथ मिलकर नेशनल फोरम ऑफ पीपुल लिविंग की ओर से किया गया.

युगांडा के ज्यादातर लोग आज भी इस रोग को स्वच्छंद जीवन जीने वाले लोगों के अनैतिक संबंधों का परिणाम माना जाता है.

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जिन एड्स पीड़ितों से बात हुई उन्होंने आगे बताया कि उन्हें नौकरी ना देने के पीछे भय है कि ये बीमारी लोगों की कार्यक्षमता को घटा देती है.

नेफोफानु के प्रमुख स्टेल्ला केंतूत्सी का कहना है कि एडंस को सामाजिक कलंक के रूप में देखा जाता है इसलिए एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति अपना इलाज नहीं करवाता.

उन्होंने आगे बताया कि इलाज नहीं करवाने का नतीजा ये होता है कि इससे उनके सहयोगियों को भी ये बीमारी संक्रमित हो जाती है.

चरित्र पर उंगली

निकोलेत्त विमना एड्स पीडित हैं. उन्होंने अपने बारे में कुछ भी नहीं छिपाया लेकिन वे कहती हैं कि इसका उन्हें गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ा.

विमना जब दस साल की थीं तो उनके साथ बलात्कार हुआ था. उनके परिवार ने शुरू शुरू में तो उनका काफी ख्याल रखा लेकिन इलाज महंगा होने के कारण बाद में उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया.

आज उनकी हालत ये है कि वे चार दूसरे एड्स पीड़ितों के साथ दड़बानुमा कमरे में रहना पड़ रहा है.

एचआईवी पॉजिटिव निकोलेत्त बताती हैं, "मेरे दोस्त तक मुझसे कोई संबंध नहीं रखना चाहते."

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"जब मैं अपनी कहानी बताती हूं तो वे मेरे चरित्र पर ही उंगली उठाते हैं. वे उस दर्द और तकलीफ को महसूस ही नहीं कर सकते जिसमें हम जैसे लोगों को गुजरना पड़ता है."

बेईमानी को बढ़ावा

युगांडा के स्वास्थ्य मंत्री रुहाकना रुगुंडा स्वीकारते हैं कि निजी क्लीनिकों की ओर से जो नकली प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं, सरकार उस पर रोक लगाने के लिए और कदम उठा सकती है.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "लोगों का नकली सर्टिफिकेट खरीदना मुझे अचंभित नहीं करता. ये तो हमारी सरकार और इस देश के लिए एक चुनौती है कि हम इस समस्या के साथ कैसे निपटते हैं."

रुगुंडा आगे कहते हैं, बल्कि नौकरी देने वाली कंपनियों को एचआईवी पॉजिटिव लोगों को आतंकित करना बंद कर देना चाहिए.

वे बीबीसी को बताया, "ये बेहद भेदभावपूर्ण है. इससे फर्जी प्रमाणपत्र और बेईमानी को बढ़ावा मिल रहा है."

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