कामयाब चुनाव का सेहरा अफ़ग़ान मीडिया के सिर भी

अफगानिस्तान में चुनाव इमेज कॉपीरइट AP

अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति चुनाव में प्रशासन, चुनाव आयोग और जनता तो शाबाशी की हक़दार है ही लेकिन इसके लिए मीडिया की पीठ थपथापाई जानी चाहिए.

एक ऐसा मीडिया जो 'ब्रेकिंग न्यूज़' की बीमारी से दूर है, जहां टिकर दिल को टुकुर टुकुर नहीं करते और जहां हर पांच मिनट बाद 'धमाके' की आवाज़ नहीं सुनाई देती.

काबुल में दो चार दिन रहने के दौरान जो अफ़ग़ान समाचार चैनल देखने को मिले, उन्हें काफ़ी परिपक्व, गंभीर और 'फ़ोकस्ड' पाया. न पाया तो तालिबान को नहीं पाया. न उनका कोई बयान और न कोई दावा.

(भारी मतदान से करज़ई गदगद)

पाकिस्तान में तो तहरीक-ए-तालिबान की ईद है. अब तो उन्होंने बाक़ायदा वेबसाइट भी बना ली है और सैकड़ों पत्रकारों को ईमेल के कष्ट से भी निजात दिला दी है. अफ़ग़ान तालिबान की धमकियों के साए में अगर शनिवार को अफ़ग़ान बड़ी संख्या में वोट देने निकले तो इसकी बड़ी अहम और मुख्य वजह मीडिया था.

सुबह मतदान का ज़ोर कम था लेकिन मीडिया ने कोई डर पैदा किए बग़ैर मतदान प्रक्रिया, कुछ स्थानों पर लंबी क़तारें दिखाकर लोगों का विश्वास बहाल किया जिसके बाद तो जैसे मतदाताओं का सैलाब उमड़ पड़ा. इस भारी हिस्सेदारी की एक बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों से मिली ट्रेनिंग को भी बताया जाता है.

चुनाव परिणाम

इमेज कॉपीरइट Getty

आज ज़्यादातर अफ़ग़ान पत्रकार नौजवान हैं, जिन्हें यूरोपीय गुणवत्ता वाली ट्रेनिंग हासिल है. स्वतंत्र अफ़ग़ान समाचार एजेंसी 'पज़वाक' के संपादक सैयद मुदस्सर शाह कहते हैं, "वह सनसनीखेज़ ख़बरों पर ध्यान नहीं देते हैं. फिर यहां लोकतंत्र उनके लिए एक रोमांस है. एक नया अफ़ेयर है तो वह दिलोजान लगा कर इसको बढ़ावा देने के लिए काम कर रहे हैं."

(राष्ट्रपति चुनाव में रिकॉर्ड मतदान)

चुनाव यहां हो चुके हैं, जो 'चैचवकी मलयाँ' के एक छोटे से मतदान बूथ का परिणाम भी मिल गया है लेकिन पाकिस्तानी मीडिया के रुझान के विपरीत उसे सबसे पहले दिखाने की कोई टेंशन नहीं है. हां, उम्मीदवारों के बयान हैं, जीत के दावे हैं लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं.

कुछ लोग इस पर नाराज़ भी हैं कि मीडिया ने चुनाव परिणाम जुटाने की कोशिश क्यों नहीं की. अफ़ग़ान मीडिया ने साल 2001 के बाद विदेशी सहायता से काफ़ी तेज़ तरक़्क़ी की है. इसे एक 'सफलता की कहानी' माना जा रहा है.

अफ़ग़ान मीडिया

इमेज कॉपीरइट AP

इसके आलोचकों बेशक उसे 'विदेशी एजेंडा' क़रार देंगे क्योंकि अक्सर चैनलों को धन बाहर से मिल रहा है लेकिन जिस देश की अर्थव्यवस्था को यूएनडीपी दुनिया की तीसरी सबसे ग़रीब अर्थव्यवस्था करार दे चुकी है वहाँ आत्मनिर्भर मीडिया एक सपना ही हो सकता है.

(पुलिसकर्मी ने महिला पत्रकार को गोली मोरी)

अगर बात माली मदद से हट कर ख़ुद बाज़ार से अपनी जगह बनाने की होती तो शायद फिर गला काट प्रतियोगिता यहां भी वैसा ही होती है जैसी पाकिस्तान में है.

सैयद मुदस्सर अली शाह भी इससे सहमत हैं, "यहाँ भी ये ख़तरा मौजूद है. कई अन्य संस्थाओं की तरह अफ़ग़ान मीडिया भी पूरी तरह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हुआ है. इसकी आर्थिक स्थिरता में अभी समय लगेगा. सिर्फ़ सब्सक्रिप्शन से मिले पैसे इसे नहीं चलाया जा सकता है. साल 2014 का नकारात्मक प्रभाव इस पर भी होगा लेकिन जिस पेशेवराना तरीक़े से कुछ संस्थान चलाए जा रहे हैं, वे बच जाएंगे."

तालिबान के बाद

मीडिया पर नस्लीय और क़बायली नियंत्रण भी एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है. राजनीतिक दलों को भी चैनल खोलने की अनुमति है. 'नूर' अगर जमीअत-ए-इस्लामी का टीवी है तो 'आईना' जनरल रशीद दोस्तम चला रहे हैं. इन चुनावों में उन चैनलों का झुकाव किस तरफ़ रहा होगा, ये समझाने की ज़रूरत नहीं है.

(प्रमुख उम्मीदवार और मुद्दे)

तालिबान के दौर में टीवी पर तो पूरी तरह से प्रतिबंध था लेकिन रेडियो प्रसारण सक्रिय रहा. तालिबान के जाने के बाद शुरू में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बलों ने अपना मीडिया भी क़ायम किया था जिसके बारे में कहा जाता था कि 'आईएसएएफ़' अख़बार कबाब पैक करने के लिए सबसे अच्छा है.

बहुत कम साक्षरता वाले इस देश में अख़बारों का स्तर कभी भी बहुत अच्छा नहीं रहा लेकिन टीवी और रेडियो का ज़बरदस्त विस्तार देखा गया. एक समस्या 'दरी' भाषा वाली मीडिया का दबदबा भी है. पश्तो मीडिया की कमी इसीलिए शायद तालिबान मीडिया पूरी कर रहा है.

अहम किरदार

इमेज कॉपीरइट Reuters

'रीज़नल स्टडीज़ सेंटर ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान' के अब्दुल गफ़ूर लीवाल ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा कि निश्चित रूप से अफ़ग़ान मीडिया की समस्याएं बहुत हैं लेकिन इसके बावजूद इसका महत्व भी बहुत है. ज़्यादातर पत्रकार अभी भी शौक़िया काम करते हैं, मीडिया के कुछ तबक़े निष्पक्ष नहीं होंगे, सामाजिक समस्याएँ होंगी, कुछ चैनल कुछ उम्मीदवारों के समर्थक भी होंगे लेकिन इसके बावजूद इसका किरदार अहम रहा है.

(काबुल में आत्मघाती हमला)

पत्रकारों को ख़तरे और मिलने वाली धौंस धमकी के मामले में अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में शायद कोई ज़्यादा अंतर नहीं है. यहां भी पत्रकारों ने अपने करियर की ख़ातिर जीवन गंवाई हैं.

बीबीसी से जुड़े जो तीन पत्रकार मारे गए थे, उनकी तस्वीरें काबुल के दफ़्तर में लगी हैं. इससे पता चलता है कि पत्रकारिता में सुरक्षा की न पहले और न अब कोई संभावना है. हर देश के मीडिया की तरह अफ़ग़ान मीडिया भी समस्याओं से मुक्त नहीं है लेकिन फ़िलहाल उनकी साख और झुकाव बहुत हद तक स्पष्ट है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार