प्रथम विश्व युद्धः बर्बादी के बीच जिंदगी की 10 नेमतें

  • 18 अप्रैल 2014
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प्रथम विश्व युद्ध आपसी अविश्वास और वैमनस्य की जमीन पर लड़ा गया था. मौत और विनाश का प्रतीक बन चुके इस युद्ध ने इंसानी जीवन को कुछ ऐसी नेमतें भी बख्शीं जिनसे जिंदगी ज्यादा सुगम और आरामदायक हो गई.

बीबीसी लाया है वो 10 आविष्कार जो प्रथम विश्व युद्ध की जरूरतों के कारण सामने आईं.

1. सेनिटरी टॉवल

सेनिटरी टॉवल वो पहला आविष्कार है जिसने बाद में औरतों की दुनिया में क्रांति ला दी. आइए जानते हैं सेनिटरी टॉवल से सेनेटरी नैपकिन तक के सफर के बारे में.

प्रथम विश्व युद्ध छिड़ने के पहले सेल्यूकॉटन का आविष्कार हो चुका था. लेकिन जब इसका आविष्कार करने वाली के-सी कंपनी के प्रमुख और उपाध्यक्ष दोनों साल 2014 में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्कैनडिनेविया के लुगदी और कागज बनाने वाले कारखानों के दौरे पर निकले तो उन्हें एक ऐसा प्रोडक्ट मिला जो सेल्यूकॉटन से पांच गुना ज्यादा तरल सोखता था, और कीमत में आधा था.

वे इसे अमरीका ले आए और अपना ट्रेडमार्क दिया. बाद में साल 1917 में अमरीका के युद्ध में शामिल होने पर इस कपड़े का इस्तेमाल ऑपरेशन के बाद मरहमपट्टी के लिए किया जाने लगा.

युद्ध के दौरान रेड क्रॉस की नर्सों ने पाया कि ये काफी हाईजीनिक है. फिर क्या था वे इसका अपने व्यक्तिगत जरूरत के लिए इस्तेमाल करने लगीं. इस इस्तेमाल ने ही कंपनी की कायापलट कर दी.

मोहब्बतें जो विश्व युद्ध के दौरान परवान चढ़ीं

आज के-सी कंपनी कहती है, "1918 में जब युद्ध खत्म हुआ तो कंपनी के कारोबार में थोड़ा ठहराव आ गया था, क्योंकि इस प्रोडक्ट का इस्तेमाल करने वाले प्रमुख उपभोक्ता, सेना और रेड क्रॉस को अब इसकी कोई जरूरत नहीं थी."

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Image caption युद्ध के दौरान नर्सों ने सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल किया जिसका नाम बाद में 'कोटेक्स' रखा गया.

इसलिए कंपनी ने बचे हुए माल को सेना से वापस खरीदा और इसे बाजार में ले आई.

कंपनी ने आगे बताया, "गहन अध्ययन, प्रयोग और बाजार में परीक्षण के बाद कंपनी ने सेल्यूकॉटन और फाइन गॉज को मिलाकर सेनिटरी नैपकीन का आविष्कार किया."

इस तरह एक नया प्रोडक्ट, 'कोटेक्स', सामने आया. कोटेक्स यानि 'कॉटन टेक्सचर'.

पहली बार कोटेक्स को सार्वजनिक तौर पर अक्टूबर 1920 में, युद्धविराम के बाद दो साल से भी कम समय के भीतर, बेचा जाने लगा.

2. पेपर हैंकिज (कागज के रूमाल)

सेनिटरी पैड की खरीद-बिक्री आसान नहीं थी क्योंकि महिलाएं इसे पुरुष विक्रेताओं से खरीदने में झिझकती थीं.

कंपनी ने दूकानदारों से अनुरोध किया कि वे ग्राहकों को पैसे एक बॉक्स में छोड़ देने के लिए कहें.

इससे कोटेक्स की बिक्री बढ़ी लेकिन वो के-सी कंपनी के लिए पर्याप्त नहीं थी. वे इस मेटिरियल के कुछ और इस्तेमाल के तरीके खोज रहे थे.

फिर 1920 के शुरूआत में सीए 'बर्ट' को आइडिया आया कि क्यों न इस सेल्यूलोज मेटिरियल को आयरन कर और ज्यादा हल्का और मुलायम बनाया जाए.

कुछ प्रयोगों से गुजरने के बाद साल 1924 में सेल्यूलोज मटेरियल ने चेहरा पोंछने वाले फेशियल टिश्यू का आकार ले लिया. इसका नाम रखा गया, 'क्लीनेक्स'.

3. सन लैंप

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साल 2018 की सर्दियां थीं. एक अनुमान के मुताबिक बर्लिन के आधे से ज्यादा बच्चों को रिकेट्स बीमारी, जिसमें हड्डियां मुलायम और टेढी-मेढी हो जाती हैं, ने पकड़ लिया.

हालांकि उस समय इस बीमारी के सही-सही कारणों का पता नहीं लगाया जा सका, मगर इसके पीछे गरीबी को प्रमुख कारण माना गया.

एक डॉक्टर ने पाया कि उसके मरीजों का रंग पीला पड़ गया है. उन्होंने एक प्रयोग किया और इस बीमारी से पीड़ित चार बच्चों को पराबैंगनी किरणें (अल्ट्रा-वायलेट) बिखेरने वाले मर्करी-क्वार्ट्ज लैंप के नीचे रखा.

विश्व युद्ध के आख़िरी सैनिक की विदाई

आश्चर्यजनक तरीके से बच्चों की हड्डियां मजबूत होने लगीं. फिर डॉक्टर ने उन्हीं बच्चों को गर्मी की धूप में छत पर रखा. उनके प्रयोग का लोगों ने खूब स्वागत किया.

शोधकर्ताओं ने बाद में पाया कि हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए उनमें मौजूद कैल्सियम को विटामिन डी की जरूरत होती है. और ये काम अल्ट्रा-वॉयलेट किरणें बखूबी करती हैं.

इस तरह जो युद्ध कुपोषण लेकर आया था उसी ने इससे निजात पाने की भी राह दिखाई.

4. डे लाइट सेविंग टाइम

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पहला विश्व युद्ध शुरू होने से पहले बसंत में घड़ियों को आगे करने और पतझड़ यानि शरद् ऋतु में घड़ी को पीछे ले जाने का चलन शुरू हो चुका था. बेंजामिन फ्रैंकलीन ने 1784 में एक चिट्ठी लिखकर इसके बारे में पेरिस के अखबार को बताया था. उन्होंने लिखा था कि गर्मियों में रात को सोने के लिए बिस्तर पर जाने के पहले कई मोमबत्तियां जलानी पड़ती हैं, और सुबह में वे जब सोए ही रहते हैं तभी सूरज निकल जाता है. इससे धूप काफी जा चुकी होती है.

इसी तरह का सुझाव 1895 में न्यूजीलैंड में और ब्रिटेन में 1909 में पेश किया गया. लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका.

प्रथम विश्वयुद्ध ये बदलाव लेकर आया. मगर कैसे?

किताब जो कहती है युद्ध की कहानी

हुआ यूं कि, जर्मनी को कोयले की भारी किल्लत का सामना करना पड़ा. जर्मनी के अधिकारियों ने कोयला बचाने के लिए तय किया कि 1916 के अप्रैल महीने की 30 तारीख को घड़ी को 23.00 बजे से बढ़ाकर आधी रात का समय कर दिया जाए. ऐसा करने से अगली सुबह दिन के ज्यादा घंटे मिले जिससे रोशनी करने और गर्मी लाने के लिए कम कोयले की जरूरत पड़ी और इसकी खपत घट गई.

जर्मनी में ये प्रयोग सफल होने के बाद दूसरे देशों में भी लोग इसे अपनाने लगे.

ब्रिटेन ने तीन महीने के बाद 21 मई, 1916 को ये प्रयोग किया. यूरोप के अन्य देशों ने भी इसका अनुसरण किया.

19 मार्च 1918 को अमरीकी कांग्रेस ने सात नए क्षेत्र बनाए और दिन के समय की बचत की.

जंग खत्म हो जाने के बाद 'डे लाईट सेविंग टाइम' को लोगों ने इस्तेमाल करना छोड़ दिया. मगर बाद में इसे फिर से अपना लिया गया.

5. टी बैग्स

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वैसे तो टी-बैग का इस्तेमाल युद्ध के दौरान किसी परेशानी का सामना करने के लिए नहीं शुरू किया गया था. बल्कि ऐसा हुआ कि साल 1908 में अमरीका के एक चाय व्यापारी ने चाय के नन्हें-नन्हें थैले बना कर अपने ग्राहकों को भेजना शुरू किया. अब इसे आप संयोग कहिए, या कुछ और, वो टी बैग्स एक बार पानी में गिर गए. फिर क्या, बाद में जो हुआ उसने इतिहास रच दिया.

बाद में एक जर्मन कंपनी, टीकाने, ने इसकी नकल की और टी बैग्स बना डाले. उन्होंने मिलते-जुलते कॉटन बैग का इस्तेमाल किया और इसका नाम रखा, "टी बॉम्ब्स".

6. कलाई घड़ी

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Image caption कलाई पर बांधी जाने वाली घड़ी युद्ध के दौरान बेहद उपयोगी साबित हुई.

यह सच नहीं है कि कलाई पर बांधी जाने वाली घड़ी खासतौर पर पहले विश्व युद्ध के लिए बनाई गई थी. हां, ये जरूर सच है कि युद्ध के बाद समय देखने के लिए इसको जरूरी उपकरण के रूप में देखा जाने लगा.

19वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20वीं सदी के पूर्वाद्ध में जब लोगों को समय देखना होता था, वे चेन लगी घड़ी अपनी जेब में रखा करते थे. महिलाएं इसमें आगे थीं. क्वीन एलिजाबेथ की छोटी सी घड़ी हमेशा उनकी बांह पर बंधी होती थी.

फिर युद्ध का समय आया. चूंकि लड़ाई में समय का बेहद महत्व होता है इसलिए ऐसी घड़ी चाहिए थी जिसको बार बार पकड़ना ना पड़े. जैसे कि तोप से गोलीबारी करते समय दोनों हाथों का खाली रहना जरूरी था. इसलिए उत्पादककर्ताओं ने कलाई घड़ी बनाई जिससे युद्ध की गहमागहमी के बीच हाथ फ्री रहें.

इसी तरह हवाई जहाज उड़ाने वाले को पैकेट गिराते वक्त हाथ खाली रखने की जरूरत होती थी.

इसीलिए पहले विश्व युद्ध में 'क्रीपिंग बैरेज' यानि 'समय ही सबकुछ है', को जोर शोर से प्रचारित किया गया.

कंपनी एच विलियम्सन, जो कोवेंट्री (इंग्लैंड का एक शहर) में घड़ियां बनाते थे, ने अपने 1916 की आम बैठक में रिपोर्ट रखी, "इस रिपोर्ट में कहा गया था कि प्रत्येक चार सैनिक में से एक कलाई पर घड़ी पहनें और थोड़े थोड़े समय पर चारों इसे आपस में बदलें."

7. वेजिटेरियन सॉसेज

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यदि आप ये सोचते हैं कि सोया सॉस का आविष्कार किसी हिप्पी ने 1960 के आस-पास किया होगा और वो भी संभवतः कैलिफोर्निया में, तो आपका अंदाजा गलत है.

सोया सॉस का आविष्कार किया था कोनरैड एडिनार ने. वे दूसरे विश्व युद्ध के बाद के पहले जर्मन चांसलर थे.

पहले विश्व युद्ध के दौरान एडिनार कोलोंग के मेयर थे. जब ब्रिटेन ने जर्मनी की नाकाबंदी कर दी तो शहर में भूखमरी की नौबत आ गई. एडिनार खोजी प्रवृति के थे. उन्होंने इन हालातों में दुर्लभ हो रही खाद्य वस्तुओं की जगह लेने वाली चीजों को खोजना शुरू किया.

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उन्होंने ब्रेड बनाने के लिए गेहूं के आटे की जगह चावल का आटा, बारली और रोमानिया के मकई के आटे (कॉर्न फ्लोर) का इस्तेमाल किया.

प्रयोग के बाद बने इस ब्रेड के लिए उन्होंने एक खास तरह का सॉस भी बनाया जो बाद में सोया सॉस कहलाया. इसे 'पीस सॉस' भी पुकारा जाता था. मगर बिना मीट वाले सॉस को लोग सॉस नहीं मानते थे.

संयोग ऐसा हुआ कि जर्मनी के दुश्मन ब्रिटेन के सम्राट जार्ज पंचम ने सोया सॉस को 26 जून 1918 को अपनी स्वीकृति दी जिसके बाद लोगों ने इसे खुले दिल से स्वीकार किया.

8. जिप

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19वीं शताब्दी के मध्य से ही लोग ठंड से बचने के लिए हुक, क्लास्प का इस्तेमाल करते थे. साथ ही वे खुद को गर्म रखने के लिए और आसान और सुविधाजनक तरीके भी ढूंढ़ते रहते थे.

स्वीडन मूल के प्रवासी अमरीकी जिडियोन संडबैक ने एक रास्ता निकाला. वे यूनिवर्सल फास्नर कंपनी के हेड डिजाइनर बन गए और हुकलेस फास्नर बना डाला. इसमें दांतों के दो सेट के बीच एक लॉक जैसा डिजाइन बना हुआ था.

बाद में अमरीकी सेना ने इनका इस्तेमाल खासकर नौसेना में, यूनिफार्म और बूट्स में करना शुरू किया. युद्ध खत्म होने के बाद इसे आम नागरिकों ने अपनाया.

9. स्टेनलेस स्टील

हमें इस स्टील के लिए हैरी ब्रेरले को धन्यवाद कहना चाहिए जिसमें न तो जंग लगता है और न ही जो टूटता है. जैसा कि शहर के अभिलेखागार में लिखा हुआ है, "1913 में हैरी ब्रेरले ने जंगमुक्त या धब्बे रहित प्रोडक्ट बनाकर धातु विज्ञान की दुनिया में क्रांति ला दी."

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ब्रितानी सेना बंदूक बनाने के लिए एक बेहतर धातु खोज रही थी. समस्या ये थी कि फायरिंग के दौरान गर्मी और गोलियों के घर्षण से बंदूकों की शक्लें बिगड़ रही थीं. धातुविज्ञानी ब्रेयली को मजबूत धातु खोजने को कहा गया.

उन्होंने स्टील पर थोड़ा ज्यादा क्रोमियम का इस्तेमाल कर एक प्रयोग किया. मगर यह प्रयोग सफल नहीं हुआ. नतीजा ये हुआ कि उन्होंने प्रयोग के दौरान इस्तेमाल की गई सारी चीजों को आंगन में फेंक दिया जो कतरनों की ढेर पर जा गिरीं. बाद में ब्रेयली ने देखा कि फेंकी गई चीजों में जंग नहीं लगे.

इस प्रकार स्टेनलेस स्टील की छिपी हुई ताकत का पता चला. इससे प्रथम विश्व युद्ध में नए फैशन का एयरो-इंजन बनाया गया. मगर वास्तव में इसका इस्तेमाल चाकू, चम्मच, कांटा और चिकित्सा के ढेरों उपकरण के रूप में सामने आया.

10. वायरलेस

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प्रथम विश्व युद्ध से ऐसा कोई साधन उपलब्ध नहीं था जिसके जरिए एक पायलट दूसरे पायलट से, या जमीन पर किसी व्यक्ति से संवाद कायम कर सके.

लड़ाई शुरू होने पर सेनाएं आपस में बातचीत के लिए तार पर निर्भर होती थीं. मगर समस्या ये थी कि ये तारें तोपों या टैंकों के कारण टूट जाती थीं.

एक खतरा ये भी था कि इन तारों को दुश्मन टैप कर लेते थें. जैसे जर्मनी ने ब्रिटेन के केबल संचार को खुफिया तरीके से सुनने या टैप करने का तरीका निकाल लिया था.

युद्ध के दौरान संवाद के अन्य माध्यम थे, धावक, झंडा, कबूतर, लैंप और संदेशवाहक. मगर ये सब काफी नहीं थे.

वायुयान चालक इशारों और तेज आवाजों पर भरोसा करते थे. ऐसे में वायरलेस काम आया.

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