भारतीय मूल के कवि ने जीता पुलित्ज़र

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भारतीय मूल के कवि विजय सेशाद्रि ने 2014 का प्रतिष्ठित पुलित्ज़र पुरस्कार जीता है.

यह पुरस्कार कविता श्रेणी में उनके कविता संग्रह ''थ्री सेक्शन्स'' के लिए दिया गया.

पत्रकारिता, पत्र, नाटक और संगीत के लिए दिए जाने वाले पुलित्ज़र पुरस्कार के 98वें संस्करण की घोषणा कोलंबिया विश्वविद्यालय ने सोमवार को की.

कोलंबिया विश्वविद्यालय के एलुमिनी रहे सेशाद्रि को पुरस्कार स्वरूप 10,000 डॉलर (क़रीब छह लाख रुपए) दिए जाएंगे.

यह पुरस्कार एक अमरीकी कवि द्वारा लिखी गई आसाधारण कविताओं की श्रेणी के लिए दिया गया है.

पुलित्ज़र की वेबसाइट पर प्रकाशित सेशाद्रि की जीवनी के अनुसार वो न्यूयॉर्क के सारा लॉरेंस कॉलेज में कविता और नॉन फ़िक्श्न पढ़ाते हैं.

1954 में बेंगलुरू में जन्मे सेशाद्रि पांच वर्ष की उम्र में ही अमरीका आ गए थे और ओहियो के कोलंबस में बड़े हुए.

पांचवें भारतीय मूल के विजेता

उनके कविता संग्रह में जेम्स लाफ़िंग पुरस्कार से नवाज़ी गई कविताएं 'द लांग मिडो' और 'वाइल्ड किंगडम (1996)' काफ़ी चर्चित रहीं.

उनकी कविताएं, लेख और विश्लेषण अमेरिकन स्कॉलर, द नेशन, दि न्यूयॉर्कर, द पेरिस रिव्यू, येल रिव्यू, द टाइम्स बुक रिव्यू, द फ़िलाडेल्फ़िया एंक्वायरर समेत अमरीका के अन्य कई प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित होते रहे हैं.

इसके अलावा 1997 में 'अंडर 35-दि न्यू जेनेरेशन ऑफ अमरीकन पोएट्स' और 2003 में 'दि बेस्ट अमरिकन पोइट्री' में भी उनका नाम शामिल रहा है.

सेशाद्रि को कला के लिए न्यूयॉर्क फाउंडेशन और नेशनल एंडाउमेंट फॉर आर्ट्स से भी अनुदान मिल चुका है.

कविता में असाधारण उपलब्धि के लिए उन्हें पेरिस रिव्यू के 'बर्नार्ड एफ़ कोनर्स लांग पोएम' पुरस्कार और 'मैकडॉवेल कोलोनी' की फ़ेलोशिप भी मिल चुकी है.

वो पुलित्ज़र पुरस्कार पाने वाले भारतीय मूल के पांचवें व्यक्ति हैं. 1937 में गोविंद बिहारी लाल को पहली बार यह पुरस्कार मिला था.

लाल एक विज्ञान संपादक थे और हॉवर्ड विश्वविद्यालय की 300वीं वर्षगांठ के दौरान विज्ञान के कवरेज के लिए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया था. 1992 में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई थी.

भारतीय-अमरीकी लेखिका झुंपा लाहिरी को 2000 में उनके कहानी संग्रह 'इंटरप्रीटर्स ऑफ़ मेलोडीज़'' के लिए पुलित्ज़र पुरस्कार दिया गया था.

यह पुरस्कार पाने वालों में तीसरा नाम भारतीय मूल की पत्रकार-लेखिका गीता आनंद का है.

आनंद वॉल स्ट्रीट जर्नल के लिए खोजी पत्रकार और फ़ीचर लेखिका थीं.

2003 में उन्हें यह पुरस्कार स्पष्ट, सटीक और विषद वर्णन वाली ख़बरों के लिए दिया गया जो अमरीका में कारपोरेट घोटालों के कारणों, महत्व और प्रभाव से संबंधित थे.

2011 में भारतीय अमरीकी चिकित्सक सिद्धार्थ मुखर्जी को कैंसर पर लिखी गई किताब 'द एम्परर ऑफ ऑल मेलोडीज़ः ए बॉयोग्राफ़ी ऑफ कैंसर' के लिए सामान्य नॉन फिक्शन श्रेणी के लिए दिया गया.

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