विदेशों में बैठे एनआरआई कर रहे जमकर प्रचार

लंदन में प्रवासी भारतीय

ब्रिटेन में बसे कई अप्रवासी भारतीय चुनाव अभियान में पैसे से योगदान देते हैं.

लेकिन तकनीक और सोशल मीडिया ने इस बार उनके योगदान का दायरा पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ा दिया है. अपनी-अपनी पार्टियों के लिए चुनाव प्रचार करने में ये लोग कोई कसर नहीं छोड़ रहे. ऐसे ही कुछ लोगों से मिलने मैं पहुँची अलग-अलग पार्टियों के समर्थकों के बीच.

(पंजाबः 64 एनआरआई वोटर ही क्यों?)

आम आदमी पार्टी के समर्थक रविंदर रोज़ाना लंदन से अपने फ़ोन से भारतीय मतदाताओं को फ़ोन करते हैं और उन्हें पार्टी के बारे में बताते हैं. मेरे सामने उन्होंने कई लोगों को फ़ोन लगाए. लोग उनकी बात से सहमत हों या न हों लेकिन शायद ही किसी ने रविंदर का फ़ोन काटा. एक व्यक्ति ने तो वाराणसी से पलट कर उन्हें फ़ोन भी किया.

लंदन में बैठे रविंदर और उनके दोस्तों को भारतीय मतदाताओं का डाटाबेस मुहैया कराने का काम तकनीक ने आसान कर दिया है. फ़ेसबुक और टि्वटर जैसे माध्यम चुनावी हथियार बन गए हैं- फिर चाहे विदेश में बैठकर पार्टी के लिए पैसा जुटाना हो या समर्थन.

वर्चुअल चुनाव

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अप्रवासी 'आप' समर्थकों ने भारत के कुछ राज्यों को चुनाव के लिए अपना लिया है और भारत में हो रही गतिविधियों पर व्हाट्स ऐप के ज़रिए ही नज़र रख लेते है. गुरमीत सिंह लंदन में डॉक्टर हैं और प्रचार के नए तरीक़े को काफ़ी फ़ायदेमंद मानते हैं.

(मंदी अमरीका में, असर पंजाब चुनाव पर)

उनका कहना है, "सोशल मीडिया पर दुनिया भर में हमारे लोग एक्टिव रहते हैं. भारत में अपनी पार्टी के लिए इंटरनेट पर पोस्टर वगैरह डिज़ाइन करने का काम हमने ले लिया ताकि ज़मीनी स्तर पर काम करने के लिए हमारे कार्यकर्ताओं के पास ज़्यादा समय रहे. हम लोग 'कॉल इंडिया' अभियान भी चलाते हैं. दरअसल जब हम मतदाताओं को यहाँ से कॉल करते हैं तो उन्हें भी लगता है कि अरे वाह! लंदन से फ़ोन आया है. उन्हें एहसास होता है कि ये एक ग्लोबल अभियान है."

मीडिया कंसल्टेंसी फ़र्म में काम करने वाले आम आदमी पार्टी समर्थक हरप्रीत सिंह के शब्दों में कहें तो इस वर्चुअल चुनाव अभियान में सूरज कभी अस्त नहीं होता क्योंकि दुनिया के किसी न किसी देश से पार्टी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं.

पैसे और समय दोनों की बचत

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आम आदमी पार्टी समर्थकों से मिलने के बाद रविवार की एक सुबह मैं पहुँची लंदन के साउथहॉल इलाक़े में, एक योग शिविर में. कहने को तो एक योग शिविर था लेकिन ये ब्रिटेन में नरेंद्र मोदी के समर्थकों के लिए चुनाव प्रचार का एक ज़रिया है.

(अपनी ज़मीन के लिए लड़ते परदेसी)

साथ ही साथ लंदन की ठंड में चाय की चुस्कियों पर भारतीय जनता पार्टी के समर्थक चाय पर चर्चा भी करवा रहे हैं. लेकिन प्रचार के इन पारंपरिक तरीकों में वक़्त लगता है. इसी शिविर में बैठे युवा एनआरआई इस बार अलग ही अंदाज़ में चुनाव प्रचार कर रहे हैं.

सोशल मीडिया पर इनका पूरा ज़ोर है जहाँ चंद मिनटों में ये लाखों लोगों तक अपनी बात पहुँचा देते हैं. मोदी समर्थक नाचिकेत जोशी मानते हैं कि इससे पैसे और वक़्त दोनों की बचत होती है.

नाचिकेत जोशी कहते हैं, "सोशल मीडिया ऐसा माध्यम है जहाँ हम पैसा भी ख़र्च नहीं करते और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँच जाते हैं. इस चुनाव में युवाओं की अहम भूमिका है और आज तो कम उम्र से ही लोग सोशल मीडिया इस्तेमाल करने लगते हैं. हम मोदी समर्थकों ने ब्रिटेन से एक तरह का हेड ऑफ़िस बना लिया है जहाँ से भारत, यूके, जापान, कनाडा, दुबई, अमरीका... इन देश के लोगों के साथ मिलकर हमने एक अभियान चलाया हुआ है."

कांग्रेस को कम भाया सोशल मीडिया

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उधर ब्रिटेन में कांग्रेस समर्थक सोशल मीडिया से ज़्यादा अब भी पारंपरिक तरीक़ों पर ज़ोर देते नज़र आ रहे हैं.

(प्रवासी भारतीय सम्मेलन)

कांग्रेस का समर्थन करने वाले आबशार कहते हैं, "हम आज भी यही मानते हैं कि चुनाव सोशल मीडिया पर नहीं ज़मीन पर लड़े जाते हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव में मैं ख़ुद भारत गया था और चुनाव प्रचार किया था. इस बार भी मेरे कई दोस्त भारत गए हैं और प्रचार में मदद कर रहे हैं. सोशल मीडिया का काम भारत से होता है पर मुख्य काम तो ज़मीनी स्तर पर ही है."

भारत के बाहर बसे भारतीयों के लिए वोट डालने या प्रचार करने के लिए ख़ास तौर पर भारत आना मुश्किल होता है, कोई नौकरी छोड़कर नहीं आ सकता तो किसी के लिए इतना पैसा ख़र्च करना मुमकिन नहीं. लेकिन नई तकनीक और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों ने चुनावी अभियान में अप्रवासियों की भागेदारी को आसान कर दिया है.

अब ये लोग विदेशों में अपने घरों में बैठकर भी भारत की राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बन पा रहे हैं. ये नए ज़माने के राजनीतिक कार्यकर्ता हैं.

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