पाकिस्तानः तालिबान वार्ता पर सेना में खलबली

  • 26 अप्रैल 2014
पाकिस्तान, उत्तरी वज़ीरिस्तान Image copyright

अपनी स्थापना के समय, 2007, से ही पाकिस्तानी तालिबान एक दुर्जेय शक्ति सिद्ध हुआ है.

अपनी शक्ति के शिखर में इसके आत्मघाती दस्तों ने हज़ारों लोगों की जान ली है. 2008 में इसने पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी में एक बड़े इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया और पेशावर तक पर ख़तरा पैदा कर दिया था.

इनकी घुसपैठ को रोकने के लिए तैनात 1,56,000 सैनिकों के कमांडर जनरल ख़ालिद रब्बानी कहते हैं, "सरकार ख़तरे में थी. वहां हर ओर तालिबानी थे."

एक वक़्त तो ऐसा आ गया था कि सरकार ने पेशावर स्थित प्रांतीय प्रशासन को किसी सुरक्षित स्थान पर भेजने का विचार भी किया था.

जब जेहादियों ने स्वात घाटी पर क़ब्ज़ा कर लिया और अपने विरोधियों के सिर काटने शुरू किए तो तालिबान का आगे बढ़ना अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियां बनीं.

तब तालिबान राजधानी इस्लामाबाद से सिर्फ़ 100 किलोमीटर दूर रह गया था.

फिर लंबे समय की हिचकिचाहट और युद्धविराम की कोशिशों के बाद अंततः सेना ने निर्णायक फ़ैसला लिया. 2009 में उसने तालिबान को स्वात से खदेड़ दिया और क़ानून का राज क़ायम किया.

वार्ता का रास्ता

यह लंबे, ख़ूनी संघर्ष की शुरुआत थी जिसमें अब तक 5,000 पाकिस्तानी सैनिकों की जान जा चुकी है. आज तालिबान को वापस उसके शुरुआती बिंदु तक धकेला जा चुका है और उसका नियंत्रण सिर्फ़ उत्तरी वज़ीरिस्तान, और उसके दूसरे हिस्से ख़ैबर तक रह गया है.

लेकिन फिर भी पाकिस्तानी तालिबान एक दुर्जेय शक्ति बना हुआ है. अब भी इसके पास अनुमानतः 25,000 लड़ाके हैं और यह पाकिस्तान के मुख्य शहरों पर हमले और हत्याएं कर सकता है.

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यह सवाल बहुत विवादित है कि सेना उत्तरी वज़ीरिस्तान में तालिबान के बचे-खुचे गढ़ में आक्रामक हमला करने में नाकाम क्यों रही.

सेना के अलोचकों को यक़ीन है कि वह अफ़गान तालिबान की सुरक्षा करने में लगी है जो उत्तरी वज़ीरिस्तान को शरणगाह के रूप में इस्तेमाल करत हैं. पाकिस्तान का रक्षा तंत्र अफ़गान तालिबान को एक रणनीतिक संपत्ति के रूप में देखता है जो अफ़गानिस्तान में भारत के बढ़ते प्रभाव का मुक़ाबला करने के काम आ सकती है.

पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान की सरकारों के बीच अविश्वास का आलम यह है कि अफ़गान तालिबान के नेता पाकिस्तान में शरण लेते हैं तो पाकिस्तानी तालिबान के नेता अफ़गानिस्तान में.

एक ओर जहां यह लड़ाके सीमा के दोनों ओर आसानी से आ-जा सकते हैं अमरीकी, अफ़गानी और पाकिस्तानी सेनाएं नहीं. इस स्थिति का दोनों ओर के तालिबान संगठन खुलकर फ़ायदा उठाते हैं.

सेना उत्तरी वज़ीरिस्तान में अपनी नाकामी का यह कहकर बचाव करती है कि सैन्य अभियान के लिए उसे राजनेताओं और आम लोगों का समर्थन चाहिए होगा.

लेकिन सरकार ने एक मुश्किल राह चुन ली है. तालिबान का मुक़ाबला करने के बजाय वह इस लड़ाकू संगठन के वार्ता शुरू कर रही है.

संभावनाएं

अगर यह वार्ता नहीं टूटती है कि इसके दो परिणाम हो सकते हैं. एक तो जिससे तालिबान सबसे ज़्यादा डरता है- वह है कुछ लड़ाके जेल से रिहाई और सरकारी "मुआवज़े" के एवज़ में हथियार डाल सकते हैं.

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इसके बाद सेना बचे हुए कट्टर तालिबानियों से लड़ेगी. सेना को उम्मीद है कि उस स्थिति में पाकिस्तानी जनता भी उस तालिबान समूह के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई का समर्थन करेगी जिसने समझौते की संभावनाओं को नकार दिया था.

तालिबान गुटों में प्रतिद्वंद्विता के कारण यह योजना काम कर सकती है.

नवंबर 2013 में पाकिस्तान तालिबान के नेता हकीमुल्लाह महसूद जब एक ड्रोन हमले में मारे गए तो संगठन ने स्वात के एक जेहादी, मौलाना फ़ज़लुल्लाह, को उनके उत्तराधिकारी के रूप में चुना.

पाकिस्तानी तालिबान के निर्माण के बाद से ऐसा पहली बार हुआ थआ कि महसूत बिरादरी के किसी नेता को नेता नहीं चुना गया था और कई महसूद फ़ज़लुल्लाह के नेतृत्व में काम करने को लेकर नाराज़ थे.

सरकार को यक़ीन है कि अगर वह महसूदों को अलग कर पाई तो तालिबान उल्लेखनीय रूप से कमज़ोर हो जाएगा.

बातचीत का दूसरा परिणाम यह हो सकता है कि तालिबान पाकिस्तानी शहरों में आत्मघाती हमलावरों को भेजना बंद कर दे और इसके बदले सरकार उन्हें कबाइली इलाक़ों में अपनी गतिविधियां बिना हस्तक्षेप के चलाने की इजाज़त दे दे.

वार्ता प्रक्रिया में शामिल नवाज़ शरीफ़ के विश्वासपात्र और आईएसआई के पूर्व गुप्तचर अधिकारी मेजर आमिर कहते हैं, "(तालिबान की) मुख्य मांग पुरानी स्थिति को कायम करना है."

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वह कहते हैं कि इससे पहले सेना कबाइली इलाक़ों में मौजूद नहीं थी और अगर सेना को वहां से हटा लिया जाए तो तालिबना स्थाई युद्धविराम के लिए राज़ी हो सकता है.

लेकिन तालिबान के साथ जंग में इतनी सारी जानें गंवाने के बाद सेना इन सारे फ़ायदों को वार्ता की मेज़ पर गंवाने को तैयार नहीं है.

विकास कार्य

दक्षिणी वज़ीरिस्तान क़बाइली इलाक़े में जनरल ऑफ़िसर कमांडिंग, जनरल नदीम रज़ा, कहते हैं, "उनसे बिल्कुल कोई समझौता नहीं हो सकता, इसके सिवाय कि संविधान को मानो, सरकार के प्रभुत्व को मानो और शांत नागरिक बनो. यही समझौता है."

पिचले दो साल में सेना ने क़बाइली इलाक़ों में बड़े पैमाने पर विकास कार्यक्रम चलाए हैं. अमरीकी, सऊदी और यूएई पैसों से सेना के इंजीनियरों ने वहां सड़कें, सिंचाई प्रणाली और विद्युत तंत्र विकसित किए हैं.

यह कोशिश इतनी संजीदा रही है कि सामान्यतः पिछडा और दूर-दराज का माना जाने वाला दक्षिणी वज़ीरिस्तान के इलाक़े में अब पाकिस्तान के ज़्यादातर क्षेत्रों के मुकाबले बेहतर ढांचागत सुविधाएं हैं.

इन सारी प्रगति को तालिबान को सौंपने को लेकर सेना आसानी से तैयार नहीं होगी.

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इसके बजाय उसे उम्मीद है कि पिछले कुछ सालों में जारी संघर्ष के चलते हज़ारों लोगों के अपना घर छोड़कर जाने से एक नई प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलेगा, जिसमें कबाइली इलाक़ों का सामाजिक ढांचा टूट रहा है और क़बाइली लोग अन्य पाकिस्तानियों के साथ बेहतर ढंग से मिल-जुल रहे हैं.

लेकिन शांति वार्ता के कुछ समर्थकों का मानना है कि सेना ख़ुद की समस्या की एक वजह है. उनका तर्क है कि तालिबानी घुसपैठ वक्त के साथ खुद ही कम हो जाएगी.

विपक्ष के नेता इमरान ख़ान कहते हैं, "सेना को ज़रा भी अंदाज़ा नहीं है. सेना कोई समाधान नहीं है. एक बार अमरीकी इस इलाक़े से चले जाएं तो जेहाद ख़त्म हो जाएगा."

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