सिंगापुरः भारतीय, चीनियों को घर क्यों नहीं?

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सुनील पहले पहल जब सिंगापुर पहुंचे तो, उन्हें रहने के लिए घर खोजने में काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.

ब्रिटेन में आठ साल रहने के बाद सिंगापुर पहुंचे श्रीलंका के सुनील कहते हैं, ''मैंने किराए के कमरों के विज्ञापन देखकर कई लोगों को फ़ोन किया."

वो बताते हैं, ''बात ठीक-ठाक शुरू होती थी, हो सकता है कि ऐसा मेरे पश्चिमी उच्चारण की वज़ह से होता हो, लेकिन जब मैं उन्हें अपना नाम बताता था, सन्नाटा तैर जाता था. कइयों ने कहा, 'वो ऐसे लोगों को कमरे नहीं देते', या कहते, 'माफ़ कीजिएगा, भारतीयों के लिए कोई कमरा नहीं है'.''

पेशे से सिविल इंजीनियर सुनील कहते हैं कि 2012 में सिंगापुर आने के बाद कम से कम चार मकान मालिकों ने उन्हें मकान देने से इनकार कर दिया.

वह कहते हैं, ''मैंने उनसे कहा कि श्रीलंका, भारत नहीं है. यह भी कि, मैं कमरे में न खाना पकाऊंगा और न खाऊंगा, और यह भी कि मैं पूरे दिन घर से बाहर ही रहूंगा. इसके बाद भी उन्होंने मुझे कमरा नहीं दिया.''

सुनील कहते हैं, ''उस समय, मैं इस सबसे थक गया और तय किया कि केवल भारतीय मकान मालिकों के पास ही कोशिश करूं. मुझे तुरंत कुछ जगह कमरे देखने के लिए बुला लिया गया.''

मुश्किल

सुनील ऐसे अकेले व्यक्ति नहीं है. घर किराए पर देने के लिए दिए गए ऑनलाइन विज्ञापनों पर एक नज़र डालने से ही यह स्पष्ट हो जाता है. उनमें से कई में लिखा होता है,''भारतीयों और चीनियों के लिए नहीं.'' कई बार अंत में सॉरी (माफ़ कीजिएगा) भी लिखा होता है.

प्रॉपर्टी गुरू नाम की बेवसाइट पर 24 अप्रैल को देखे गए विज्ञापनों में से 160 से ज़्यादा में साफ़-साफ़ लिखा था कि उनके मकान मालिक भारतीयों और/या चीनियों को घर किराए पर नहीं देना चाहते.

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इस तरह के विज्ञापन गमट्री जैसी बेवसाइटों पर अधिक नज़र आए, जो अपेक्षाकृत सस्ते फ़्लैट या सीधे मकानों के विज्ञापन देती हैं और पाठकों को ही अपने विज्ञापन पोस्ट करने की सुविधा देती हैं.

फ़िलहाल यह साफ़ तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इससे कितने विदेशी कामगार प्रभावित हैं. हालांकि कई प्रवासियों ने अलग-अलग तरह से भेदभाव के अनुभवों के बारे में बताया है.

एक प्रवासी भारतीय ने कहा कि उनके एजेंट ने उन्हें बताया कि बहुत से मकान मालिक उन्हें मकान देने से सिर्फ़ इसलिए इनकार कर सकते हैं, क्योंकि "भारतीय हमेशा गंध वाला खाना पकाते रहते हैं."

दक्षिण एशियाई मूल के एक अन्य ब्रितानी नागरिक को तो सीधे कोई भेदभाव नहीं झेलना पड़ा, लेकिन उनके एजेंट ने उन्हें चेतावनी दे दी थी कि कुछ मकान मालिक मुश्किलें पैदा कर सकते हैं.

मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया था, हालांकि परोक्ष रूप से. मेरी महिला एजेंट से एक मकान मालिक ने फ़ोन कर चिंता जताई कि मैं चीनी हूं. शायद ऐसा तब हुआ जब उन्हें मेरे मूल रूप से चीनी होने का पता चला.

मैं उन्हें हद से ज़्यादा वक़्त तक अपनी पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए सुनती रही. बाद में मैंने उससे पूछा कि क्या उन्हें यह जानने से राहत मिलेगी कि मैं ब्रितानी हूं?

इस पर एजेंट ने कहा, "इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. वे तब भी ये सोच सकते हैं कि आप चीनी हैं और आपने ब्रितानी पासपोर्ट हासिल कर लिया है."

रूढ़िवादी धारणाएं

इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉलिसी रिसर्च के सीनियर रिसर्च फ़ेलो मैथ्यू मैथ्यूज़ कहते हैं, ''लोगों के मन में विभिन्न अप्रवासी समूहों को लेकर रूढ़िवादी धारणाएं बनी हुई हैं कि वो एक किराए के मकान की देखरेख करने को लेकर कितने ज़िम्मेदार हैं."

"ऐसी धारणाएं भी हैं कि कौन से लोग उनके घर की बेहतर देखभाल करते हैं और किस तरह का खाना संभवतः उनके घर में स्थाई गंध छोड़ देगा. लोगों का मानना है कि इससे उनकी संपत्ति की क़ीमत कम हो जाएगी.''

रियल इस्टेट एजेंट चार्लेन कहती हैं कि मकान मालिकों का भारतीयों और चीनियों को घर किराए पर न देना आम है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ऐसे किराएदार 'ऐसे लोग नहीं होते, जिन्हें अपने घर पर गर्व हो.'

''बहुत से लोग घरों की साप्ताहिक सफाई नहीं करते और वे लंबे समय तक खाना बनाते हैं, जिससे महीनों तक धूल और तेल जमा होता रहता है. फिर वो बहुत ज़्यादा मसालों का इस्तेमाल करते हैं जो ऐसी गंध छोड़ते हैं जो अन्य लोगों को पसंद नहीं है.''

वो कहती हैं कि इस बात का भी डर रहता है कि इस तरह के किराएदार ग़ैरक़ानूनी रूप से किराए के घर को आगे अन्य लोगों को किराए पर दे देंगे. उनके अनुसार, "यहां सफाई और संस्कृति बहुत महत्वपूर्ण कारक है.''

एक अन्य एजेंट ने भी इसी तरह की बातें कहीं. उनका कहना था कि मकान मालिक भारतीय और चीनी किराएदारों को मकान देने के इच्छुक इसलिए कम होते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि वे संपत्ति की ठीक से देखरेख नहीं करेंगे.

'निजी दायरा'

सिंगापुर जातीय विविधता वाला देश है, जहाँ 74 फ़ीसदी चीनी, 13 फ़ीसदी मलय, नौ फ़ीसदी भारतीय मूल के और तीन फ़ीसदी अन्य समूहों के लोग रहते हैं. क्योंकि सिंगापुर के 90 फ़ीसदी लोगों के पास अपने घर हैं, इसलिए किराएदारों का बड़ा हिस्सा विदेशियों का है.

अप्रवासन भी यहाँ एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है, क्योंकि रहन-सहन की बढ़ती कीमत और घरों के मूल्यों में वृद्धि को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, जिसके लिए स्थानीय लोग विदेशियों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

सिंगापुर प्रबंधन विश्वविद्यालय में क़ानून की एसोसिएट प्रोफ़ेसर यूजीन टैन कहते हैं, "सिंगापुर में अप्रवासन को लेकर आज की उभयवृत्ति की स्थिति को देखते हुए, मुझे लगता है कि मकान मालिकों के दिमाग़ में भारतीय और चीनी किराएदारों के बारे में मूल देश और जाति का महत्व काफ़ी बढ़ गया है."

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सिंगापुर की सरकार जातीय सद्भाव पर ख़ास ज़ोर देती है. अध्ययन बताते हैं कि तुलनात्मक रूप से सार्वजनिक जीवन में बहुत कम जातीय भेदभाव है, लेकिन निजी जीवन में चीजें अलग हो सकती हैं.

डॉ. मैथ्यूज़ कहते हैं, "सिंगापुर की सरकार ने सिंगापुरियों की ऐसे लोगों के साथ काम करने की इच्छा को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है, जो जातीय रूप से अलग हैं."

"सिंगापुरियों ने बहु-जातीय और बहुधर्मी समाज की वास्तविकता को स्वीकार करना सीख लिया है. हालांकि निजी दायरा ऐसी चीज़ है, जिसे सरकार ने प्रभावित करने की कोशिश नहीं की है."

किराएदारों को चुनने की मकान मालिक की इच्छा "संभवतः लोगों के निजी दायरे में आएगी क्योंकि यह उन पर है कि वह अपने घर के दायरे में किसे आने देना चाहते हैं."

पिछले साल दिसंबर में बस दुर्घटना में एक भारतीय की मौत के बाद सैकड़ों भारतीय और दक्षिण एशियाई कामगारों ने दंगे कर दिए. इसकी सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया हुई. बहुत से लोगों ने विदेशी कामगारों की निंदा की तो बहुत से अन्य लोग नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ भी बोले.

कानून में दरार?

यक़ीनन, किराए को लेकर भेदभाव कई देशों में होता है. बीबीसी की ओर से पिछले साल अक्तूबर में किए गए एक अध्ययन में पाया गया था कि लंदन में मकान मालिकों के अनुरोध पर बहुत सी इस्टेट एजेंसियां अफ्रीकी-कैरेबियाई लोगों को किराए पर घर देने से मना कर देती हैं.

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हालांकि ब्रिटेन का क़ानून जाति या राष्ट्र के आधार पर भेदभाव पर प्रतिबंध लगाता है, जिसमें "संपत्ति की ख़रीद या किराए पर लेना" भी शामिल है, लेकिन सिंगापुर में कानूनी सुरक्षा बहुत कम है.

प्रोफ़ेसर यूजीन टैन कहते हैं, ''यहां कोई ऐसा भेदभाव विरोधी क़ानून नहीं है, जिसका विदेशी नागरिक इस्तेमाल कर सकें.''

"अगर कोई भेदभाव-विरोधी कानून हो भी तो भेदभाव साबित करना बड़ी चुनौती है.... हो सकता है किराए के विज्ञापनों में ख़ास किराएदारों को प्राथमिकता के संकेत को भेदभाव न माना जाए."

प्रॉपर्टी गुरू ने अपने एक बयान में कहा है कि जाति या राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव कंपनी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक "बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं" है. बयान में कहा गया है कि आपत्तिजनक विज्ञापनों/बयानों को हटा दिया जाएगा.

इसमें कहा गया है, "दर्शकों के लिए एक आपत्ति दर्ज करने वाला फ़ीचर है... ताकि वह उस सामग्री की शिकायत कर सकें जो आपत्तिजनक या अपमानजनक है."

साइट का यह भी दावा है कि इसपर दिए गए एक फ़ीसदी विज्ञापनों में ही आपत्तिजनक तत्व हैं.

सिंगापुर में रियल इस्टेट एजेंसियों पर नज़र रखने वाली सरकारी संस्था द काउंसिल फॉर इस्टेट एजेंसीज (सीईए) ने अपने दिशा-निर्देशों में कहा है कि एजेंटों को "अपने ग्राहकों को इस बात की सलाह देनी चाहिए कि वे समाज की ख़ास जाति, धर्म या समूह को लेकर भेदभाव, अपमानजनक, रूढ़िवादी विज्ञापन न दें.''

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एक बयान में सीईए और राष्ट्रीय विकास मंत्रालय ने कहा है, ''नस्लीय भेदभाव को हम माफ़ नहीं कर सकते. विज्ञापन के लिए दिशा-निर्देश हैं.''

"कुछ मकान मालिकों का कहना है कि उन्हें अपनी संपत्ति को किराए पर देने में कुछ व्यावहारिक चीजों पर विचार करना पड़ता है, जिससे किराए के लेन-देन में कुछ प्रावधानों की ज़रूरत आ पड़ती है."

बयान में आगे कहा गया है, "जातीय सद्भाव के लिए आपसी सम्मान के महत्व पर सरकार अपने शैक्षणिक प्रयासों को जारी रखेगी."

प्रोफ़ेसर टैन का मानना है कि समय के साथ-साथ भेदभाव में कमी आएगी.

वो कहते हैं, ''अगले कुछ सालों में और अधिक अपार्टमेंट बनकर तैयार हो जाएंगे. ऐसे में मकान मालिक ज़्यादा मनमानी करने की स्थिति में नहीं रहेंगे.''

सुनील को भी लगता है कि आने वाले दशकों में विचार बदलेंगे.

वो कहते हैं, ''मुझे जिन मकान मालिकों ने घर देने से इकार किया, वे सब पुरानी पीढ़ी के थे, लेकिन कार्यस्थल पर मुझसे भेदभाव नहीं किया जाता है, जहां काम करने वाले युवा हैं. मुझे लगता है कि नज़रिया बदल रहा है, बस इसमें कुछ समय लगेगा.''

(कुछ लोगों के नाम बदल दिए गए हैं)

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