क्या भारत अफ़ग़ानिस्तान को अस्थिर कर रहा है?

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विदेशी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की तैयारी में हैं, भारत उसे सैनिक साजो-सामान की आपूर्ति करने के लिए सहमत हो गया है. अतिथि स्तंभकार अहमद राशिद का मानना है कि इस क़दम से तनाव और बढ़ सकता है.

भारत ने पिछले हफ़्ते अफ़ग़ान नेशनल आर्मी (एएनए) की मज़बूती के लिए हथियारों और साज़ो-सामान के बदले रूस को पैसे का भुगतान करने का फ़ैसला किया था.

यह क़दम इस इलाक़े में नाटकीय बदलाव लाने वाला साबित हो सकता है. इससे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता बढ़ सकती है.

यह बात लगभग तय है कि इस सौदे को लेकर पाकिस्तान अपने प्रतिद्वंद्वी पर आक्रामकता का आरोप लगाएगा.

भारत की ना

भारत पिछले कुछ सालों से अफ़ग़ान राष्ट्रपति हामिद करज़ई के एएनए को बार-बार भारी हथियारों, जैसे भारी तोपखाने, टैंकों और विमानों की आपूर्ति के लिए बड़ी चतुराई से हां कहने से बचता रहा है.

पिछले एक दशक में अरबों डॉलर ख़र्च कर अमरीका ने एएनए का पुनर्गठन किया है, लेकिन इसमें इस बात का ख़्याल रखा गया है कि वो हल्का लड़ाकू बल ही बना रहे और उसके पास आक्रामक हथियार होने की जगह रक्षात्मक हथियार रहें.

अमरीका और भारत दोनों पाकिस्तान को परेशान न करने को लेकर सावधान लगते हैं, जो एएनए के आकार को लेकर काफी आलोचनात्मक रुख़ रखता है और घातक हथियारों के दिए जाने पर निश्चय ही कड़ी प्रतिक्रिया देगा.

अभी हाल तक पाकिस्तान की सेना और एएनए के बीच विवादित और अस्पष्ट सीमा को लेकर बहुत अधिक तनाव था. अफ़ग़ान बार-बार पाकिस्तान पर ये आरोप लगाते रहे हैं कि वो अमरीकियों और एएनए से लड़ने के लिए तालिबान को जानबूझ कर अपनी सीमा पार करने देता है.

पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान का अपनी साझा सीमा के एक बड़े हिस्से पर कोई नियंत्रण नहीं है.

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भारत की ओर से करज़ई के अनुरोध को अस्वीकार किए जाने को पाकिस्तान में सकारात्मक तरीके से लिया गया है और दोनों के बीच अच्छे रिश्ते बने रहे हैं, जब तक कि अफ़ग़ानिस्तान में उनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता के बारे में कोई उकसावे वाला बयान न दिया जाए.

दूतावास पर हमला

क़ाबुल में भारतीय दूतावास और उसके कर्मचारियों पर अफ़ग़ान तालिबान के हक्कानी नेटवर्क की ओर से कुछ साल पहले किए गए हमले के बाद दोनों के बीच संबंधों में कुछ तनाव आया था.

भारत और अमरीका पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) पर बार-बार आरोप लगाते रहे हैं, जिसने 1970 के दशक से ही हक्कानी नेटवर्क के साथ मिलकर काम किया है.

जब से ये हमले बंद हुए हैं, दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी कम हुई है. अफ़गान राष्ट्रपति, अफ़ग़ान सेना के जनरलों, रूस और ईरान के उकसावे के बावजूद ऐसा हुआ है, जो कि चाहते थे कि भारत एएनए की और मदद करे.

भारत ने यह कहते हुए इनकार कर दिया है कि वह अफ़ग़ानिस्तान के गृहयुद्ध में नहीं फंसना चाहता है, हालांकि वह वहां की सरकार का मज़बूती से समर्थन करता है.

अब जबकि इस साल के अंत तक अमरीकी अफ़ग़ानिस्तान छोड़कर जा रहे हैं, ऐसा लगता है कि भारत ने अपना सुर बदल लिया है.

फ़िलहाल, रूस के साथ जो समझौता हुआ है उसका अर्थ है कि अफ़ग़ानिस्तान को दिए जाने वाले हल्के तोपखानों और मोर्टार जैसे रूसी हथियारों के लिए भारत भुगतान करेगा. हालांकि दोनों देशों का कहना है कि भविष्य में भारी हथियारों की आपूर्ति भी हो सकती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, भारत अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल के पास स्थित एक पुराने आयुध कारखाने को शुरू करने, सोवियत काल के पुराने हथियारों की मरम्मत करने और अफ़ग़ानिस्तान के अधिकारियों और विशेष सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण में भी मदद दे सकता है. प्रशिक्षण कार्यक्रम वो पहले से छोटे पैमाने पर करता रहा है.

सोवियत काल के समय से ही अफ़ग़ान रूसी या सोवियत हथियारों के साथ लड़ते रहे हैं, इसलिए वो इन्हें पश्चिमी देशों के हथियारों की तुलना में अधिक प्राथमिकता देते हैं.

तालिबान के ख़िलाफ़ लड़ाई

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अमरीका की ओर से किए गए भुगतान और निगरानी के बाद रूस ने अभी हाल में ही अफ़ग़ानिस्तान की छोटी सी वायुसेना को रूस में बने एम-17 हेलिकॉप्टरों की आपूर्ति की थी, जिनका तालिबान के खिलाफ लड़ाई में नॉर्दर्न अलांयस के सुरक्षाबलों ने कई सालों तक इस्तेमाल किया था.

इन सबसे पाकिस्तान के झुंझलाने की काफी संभावना है, इससे भारत के साथ उसके संबंध और अफ़ग़ानिस्तान में उसके प्रभाव को लेकर तनाव बढ़ने की संभावना है.

पाकिस्तान की सेना एएनए को लेकर नकारात्मक राय रखती है, उसे इस बात का विश्वास नहीं है कि एएनए को मिल रहे रक्षात्मक हथियारों का उनकी साझा सीमा पर इस्तेमाल नहीं होगा.

अब पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान तालिबान और उनके नेता मुल्ला मोहम्मद उमर को अपनी ज़मीन पर शरण दे रहा है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान अपने यहां पाकिस्तान तालिबान और उनके नेता मुल्ला फ़ज़लुल्लाह को अपने यहां शरण दे रहा है. लेकिन दोनों पक्ष तालिबान को शरण देने पर आधिकारिक रूप से इनकार करते रहे हैं.

तनाव में ये बढ़ोतरी पहले ही झड़पों, गोलीबारी और तोप के हमलों में तब्दील हो चुकी है जिससे सीमा पर दोनों सेनाओं के सिपाही हताहत हो रहे हैं. पाकिस्तान को ये भी शक है कि सैद्धांतिक रूप से अब भारतीय सलाहकार अमरीकी सलाहकारों की जगह ले सकते हैं.

इसके अलावा यह हथियार समझौता 1990 जैसे ख़ूनी गृहयुद्ध को दोहराने में अपनी भूमिका अदा कर सकता है, जब पाकिस्तान ने तालिबान का और भारत, ईरान, रूस और मध्य एशिया के देशों ने नॉर्दर्न अलायंस का समर्थन किया था.

हालांकि एक देश इसमें संतुलित या स्थिरता की भूमिका निभा सकता है, वह है चीन. राष्ट्रपति करज़ई ने चीन से भी सैन्य सहायता के लिए अपील की है. लेकिन चीन अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर फंसने का इच्छुक नहीं है, ठीक उसी तरह जिस तरह उसने उत्तरी कोरिया जैसी अन्य विवादित जगहों में विवाद में शामिल होने से इनकार कर दिया था.

अब पाकिस्तान अपने क़रीबी सहयोगी चीन से कह सकता है कि वो एएनए को संभालने का काम करे. इससे भारत और रूस का प्रभाव संतुलित होगा.

अनसुलझा सवाल

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एक महत्वपूर्ण अनुत्तरित सवाल अब भी बना हुआ है, वह यह कि एएनए को कार्यशील बनाए रखने और वेतन-भत्ते के लिए हर साल ज़रूरी चार अरब डॉलर की सहायता कौन देने जा रहा है.

अमरीका और नाटो ने कहा है कि वे इसके आंशिक भुगतान के लिए इच्छुक तो हैं, लेकिन बहुत अधिक समय तक के लिए नहीं. अभी तक इस बात के संकेत नहीं हैं कि भारत, रूस या चीन ने एएनए को सीधी आर्थिक सहायता की पेशकश की है.

बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि एएनए को अगले साल तक किसी भी तरह अपने आकार को तेज़ी से घटाना होगा, क्योंकि कोई भी देश 320,000 से ज़्यादा जवानों और पुलिसकर्मियों की मदद करने का इच्छुक नहीं होगा.

अगर बाहरी देश सेना को मज़बूत बनाने के लिए बिना पैसों के हथियारों की आपूर्ति करते रहते हैं, तो इस बात का ख़तरा और बढ़ जाता है कि ये हथियार तालिबान के पास चले जाएं.

यह ठीक वैसा ही होगा जब 1989 में सोवियत सेना बहुत से हथियार छोड़कर अफ़ग़ानिस्तान से चली गई थी. बहुत जल्द ही ये हथियार कबीलों के मुखियाओं और तालिबान के हाथों में पहुंच गए थे और गृहयुद्ध शुरू हो गया था.

पाकिस्तान को इस बात का डर है कि अफ़ग़ानिस्तान पहुंच रहे भारी हथियार अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान तालिबान के हाथ में पहुंच सकते हैं.

अफ़ग़ानिस्तान को हथियारों से पहले शांति की ज़रूरत है. उसे तालिबान को लड़ाई से रोकने के लिए कूटनीतिक और राजनीतिक वार्ता की एक बड़े खुराक की ज़रूरत है.

अगर अफ़ग़ानिस्तान में एक बार फिर हथियारों की बाढ़ लाने की बजाय, ऐसा हो सके तो अफ़ग़ानिस्तान एक ख़ुशहाल जगह होगा.

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